समुद्र के बीचों-बीच एक ऐसा जहाज जिसके न तो रेडार काम कर रहे थे और न ही जीपीएस. ऊपर से बरसती मिसाइलें और चारों तरफ ‘पर्ल हार्बर’ जैसा खौफनाक मंजर! यह किसी हॉलीवुड फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं बल्कि उन 5 भारतीय नाविकों की रोंगटे खड़े कर देने वाली दास्तां है जो ईरान-इजरायल और अमेरिका की जंग के बीच मौत के मुहाने पर फंस गए थे. वतन वापसी के बाद कैप्टन विनय कुमार ने नम आंखों से बताया कि कैसे पीएम मोदी और जयशंकर की कूटनीति ने उन्हें उस अंधेरे से बाहर निकाला जहां हर पल लगता था कि अब अगला नंबर हमारा ही है.
80 दिन बाद नर्क से लौटे
भारतीय नेवी के अफसरों को जंग शुरू होने से पहले ही ईरान में डिटेंशन (हिरासत) में रखा गया था. कैप्टन के बयान के अनुसार वे पिछले 80 दिनों से वहां फंसे हुए थे और ईरान की हिरासत में थे. जब उनकी हिरासत खत्म हुई और उन्हें रिलीज ऑर्डर मिला, ठीक उसी समय क्षेत्र में युद्ध (इजरायल-ईरान-अमेरिका तनाव) शुरू हो गया. इसीलिए कैप्टन ने कहा कि 80 दिन तो पैनफुल थे ही लेकिन रिहाई के तुरंत बाद जंग शुरू होने से स्थिति और भी जानलेवा हो गई क्योंकि उनके पास वहां से निकलने का समय नहीं बचा और जहाज भी खटारा हो चुका था.
खटारा जहाज और अंधेरे में सफर
न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत के दौरान नेवी के कप्टन विनय कुमार ने बताया कि जब उन्हें रिलीज करने का आदेश मिला तब तक जहाज की हालत खटारा हो चुकी थी. जहाज के जरूरी उपकरण जैसे जीपीएस, रेडार और नेविगेशन चार्ट्स पूरी तरह खराब कर दिए गए थे. कैप्टन ने इसकी तुलना बिना ब्रेक और बिना हेडलाइट के रात में गाड़ी चलाने से की. ऐसे में जहाज में सफर न केवल तकनीकी रूप से असंभव था बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत एक ‘क्राइम’ भी था.
पर्ल हार्बर जैसा मौत का मंजर
रिलीज होने के तुरंत बाद ही क्षेत्र में युद्ध छिड़ गया. कैप्टन बताते हैं कि शुरू में उन्हें समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है लेकिन जब वीएचएफ (VHF) रेडियो पर अमेरिकी और इजरायली हमलों की खबरें गूंजने लगीं तो पैरों तले जमीन खिसक गई. कैप्टन ने उस मंजर को बयां करते हुए कहा, “ऐसा लग रहा था जैसे हम ‘पर्ल हार्बर’ फिल्म देख रहे हों. मिसाइलें लैंड पर भी गिर रही थीं और जहाज के इतने करीब धमाके हो रहे थे कि लगा अब अगला नंबर हमारा ही है.” जहाज की हालत ऐसी थी कि अगर वहां छोटी सी आग भी लग जाती तो बुझाने के लिए कोई उपकरण मौजूद नहीं था.
युद्ध क्षेत्र में फंसी भारतीय जानों की कीमत
यह घटना केवल एक रेस्क्यू मिशन नहीं बल्कि भारत की प्रो-एक्टिव डिप्लोमेसी का एक बड़ा उदाहरण है. इसके तीन मुख्य पहलू गौर करने वाले हैं:
· डिप्लोमैटिक जीत: ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के बावजूद भारतीय विदेश मंत्रालय और तेहरान में भारतीय दूतावास ने जिस तरह से पांचों भारतीयों को सुरक्षित निकाला वह भारत के दोनों पक्षों से मजबूत संबंधों को दर्शाता है.
· नो सेफ हाउस: यह बयान साफ करता है कि आधुनिक युद्ध में केवल सेनाएं नहीं बल्कि निर्दोष सिविलियन और कमर्शियल शिपिंग भी कोलेटरल डैमेज का हिस्सा बन जाते हैं. ‘नो सेफ हाउस’ की स्थिति यह बताती है कि युद्ध क्षेत्र में कोई भी जगह सुरक्षित नहीं होती.
· मीडिया और सरकार का तालमेल: कैप्टन ने स्पष्ट रूप से पीएम मोदी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और भारतीय मीडिया का आभार जताया. यह दिखाता है कि जब कोई मुद्दा वैश्विक स्तर पर सुर्खियों में आता है तो संबंधित अथॉरिटीज पर दबाव बढ़ता है, जो अंततः सफल रेस्क्यू का कारण बनता है.
सवाल-जवाब
कैप्टन ने जहाज की स्थिति को “क्राइम” क्यों कहा?
अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार, बिना रेडार, जीपीएस और जरूरी नेविगेशन चार्ट्स के जहाज चलाना अवैध है. जहाज के ये सभी उपकरण खराब थे, जिससे उसे समुद्र में ले जाना जान जोखिम में डालने जैसा था.
भारतीय दूतावास ने ‘सेफ हाउस’ के लिए क्या जवाब दिया?
कैप्टन के संपर्क करने पर तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने स्पष्ट किया कि युद्ध की स्थिति में कोई भी ‘सेफ हाउस’ उपलब्ध नहीं था, केवल ‘इवाक्युएशन’ (वहां से सुरक्षित बाहर निकालना) ही एकमात्र विकल्प बचा था.
