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कपास की खेती कैसे करें

कपास की खेती में अपनाएं सही तरीका होगी बंपर पैदावार1.webp

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कपास की खेती में अपनाएं सही तरीका होगी बंपर पैदावार   

देश के कई हिस्सों में कपास की बुआई का समय शुरू हो चुका है, और ऐसे में सही तकनीक अपनाना किसानों के लिए बेहद जरूरी हो जाता है। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार ने किसानों के लिए महत्वपूर्ण दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिनका उद्देश्य कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त करना है। इन सलाहों में बुआई का सही समय, बीज का चयन, खाद एवं उर्वरक प्रबंधन, सिंचाई तकनीक और बीज उपचार जैसी अहम जानकारियाँ शामिल हैं। यदि किसान इन वैज्ञानिक तरीकों को अपनाते हैं, तो कपास की फसल से बेहतर उपज और गुणवत्ता प्राप्त की जा सकती है।

कपास की बुआई का सही समय

कपास की सफल खेती (Cotton Cultivation) के लिए बुआई का समय सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। देसी कपास की बुआई अप्रैल महीने में पूरी कर लेनी चाहिए, ताकि पौधों को अनुकूल मौसम मिल सके। वहीं, बीटी नरमा की बुआई मध्य मई तक समाप्त कर देना उचित माना गया है।

विश्वविद्यालय ने विशेष रूप से जून महीने में नरमा की बुआई करने से मना किया है, क्योंकि इस समय तापमान और कीटों का प्रकोप बढ़ जाता है, जिससे फसल को नुकसान होने की संभावना रहती है। सही समय पर बुआई करने से पौधों का विकास बेहतर होता है और उत्पादन में वृद्धि होती है।

बुआई की दिशा और सही तरीका

कपास की बुआई (Cotton Sowing) से पहले खेत में गहरा पलेवा देना जरूरी होता है, जिससे मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहती है और बीज का अंकुरण बेहतर होता है। बीजों को हमेशा पूर्व से पश्चिम दिशा में बोना चाहिए, ताकि पौधों को दिनभर पर्याप्त धूप मिल सके और उनका विकास संतुलित रूप से हो।

इसके अलावा, बुआई सुबह या शाम के समय करनी चाहिए, जब तापमान अपेक्षाकृत कम होता है। इससे बीजों का अंकुरण बेहतर होता है और पौधों पर गर्मी का दुष्प्रभाव नहीं पड़ता।

खरपतवार नियंत्रण के उपाय

कपास की फसल में खरपतवार नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि ये पौधों से पोषक तत्वों की प्रतिस्पर्धा करते हैं। इसके लिए बुआई के तुरंत बाद या अंकुरण से पहले स्टोम्प (लगभग 2 लीटर प्रति एकड़) का छिड़काव करना चाहिए।

यह उपाय शुरुआती अवस्था में खरपतवारों को नियंत्रित करता है, जिससे फसल को पोषक तत्वों की पर्याप्त उपलब्धता मिलती है और पौधों का विकास बेहतर होता है।

ड्रिप सिंचाई (टपका विधि) से बेहतर परिणाम

ड्रिप सिंचाई तकनीक कपास की खेती में पानी की बचत और बेहतर उत्पादन के लिए बेहद उपयोगी मानी जाती है। बुआई के बाद अंकुरण से पहले सुबह और शाम 10–15 मिनट तक ड्रिप सिस्टम चलाना चाहिए, जिससे मिट्टी में नमी बनी रहती है।

अंकुरण के बाद हर 4 दिन के अंतराल पर 30–35 मिनट तक सिंचाई करना उचित रहता है। यह विधि पानी के कुशल उपयोग के साथ पौधों की जड़ों तक सीधे नमी पहुंचाती है, जिससे फसल की वृद्धि में सुधार होता है।

खाद और उर्वरक प्रबंधन

कपास की अच्छी पैदावार के लिए मिट्टी की जांच करवाना बेहद जरूरी है, ताकि आवश्यक पोषक तत्वों की सही मात्रा निर्धारित की जा सके। बीटी नरमा के लिए प्रति एकड़ 1 बैग यूरिया, 1 बैग डीएपी, 30–40 किलोग्राम पोटाश और 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट (21%) का उपयोग करना चाहिए।

वहीं, देसी कपास के लिए प्रति एकड़ 15 किलोग्राम यूरिया और 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट पर्याप्त होता है। संतुलित उर्वरक प्रबंधन से पौधों को सभी आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं, जिससे उनकी वृद्धि और उत्पादन क्षमता बढ़ती है।

उन्नत किस्में और बीज की मात्रा

कपास की बेहतर पैदावार के लिए उन्नत किस्मों का चयन करना आवश्यक है। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित देसी किस्मों में HD 123 और HD 432 प्रमुख हैं, जो बेहतर उत्पादन देने के लिए जानी जाती हैं।

बीज की मात्रा भी फसल की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अमेरिकन कपास के लिए 6–8 किलोग्राम (रोंये उतारे बीज) और 8–10 किलोग्राम (रोंएदार बीज) प्रति एकड़ की आवश्यकता होती है। देसी कपास के लिए यह मात्रा क्रमशः 5 किलोग्राम और 6 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होती है। वहीं, बीटी नरमा के लिए 2 पैकेट प्रति एकड़ पर्याप्त होते हैं।

पौधों के बीच उचित दूरी (100×45 सेमी या 67.5×60 सेमी) बनाए रखना भी जरूरी है, जिससे पौधों को पर्याप्त जगह और पोषण मिल सके।

बीज उपचार से फसल सुरक्षा

बीज उपचार कपास की खेती का एक महत्वपूर्ण चरण है, जो फसल को शुरुआती 40–45 दिनों तक रोगों और कीटों से सुरक्षित रखता है। इसके लिए 10 लीटर पानी में एमिशन (5 ग्राम), स्ट्रेप्टोसाइक्लीन (1 ग्राम) और साक्सीनिक (1 ग्राम) मिलाकर घोल तैयार किया जाता है।

रोंएदार बीजों को 6–8 घंटे और रोंये उतारे बीजों को लगभग 2 घंटे तक इस घोल में भिगोना चाहिए। इसके बाद बीजों को छाया में सुखाकर बुआई करनी चाहिए, जिससे अंकुरण बेहतर होता है और रोगों का खतरा कम होता है।

दीमक से बचाव के उपाय 

कपास की फसल (kapas ki kheti) को दीमक से बचाने के लिए बीज उपचार के बाद अतिरिक्त सावधानी बरतना जरूरी है। बीजों को छाया में सुखाने के बाद प्रति किलो बीज में 10 मिली क्लोरपाइरीफॉस 20 EC और 10 मिली पानी मिलाकर छिड़काव करें।

इसके बाद बीजों को 30–40 मिनट तक छाया में सुखाकर बुआई करनी चाहिए। यह उपाय दीमक के प्रकोप को रोकता है और फसल की शुरुआती वृद्धि को सुरक्षित बनाता है।

कपास की सफल खेती के लिए सही समय पर बुआई, उन्नत किस्मों का चयन, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, उचित सिंचाई और बीज उपचार बेहद जरूरी हैं। Chaudhary Charan Singh Haryana Agricultural University द्वारा दी गई इन वैज्ञानिक सलाहों को अपनाकर किसान अपनी फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में सुधार कर सकते हैं। इससे न केवल लागत कम होगी, बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि होगी।

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By uttu

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