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डिप्लोमेसी तार-तार… अर्थव्यवस्था बंटाधार, ईरान युद्ध के बीच पाकिस्तान पर पड़ी दोहरी मार – Pakistan Faces Diplomatic and Economic Strain as Mediation Gamble in US Iran War Fails ntc dpmx

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पाकिस्तान एक हफ्ते पहले तक वैश्विक सुर्खियों में था, जब उसने खुद को अमेरिका-ईरान युद्ध में प्रमुख मध्यस्थ के रूप में पेश किया. उसके अमेरिका और ईरान दोनों से अच्छे रिश्ते हैं और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए अपने तेल टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना उसके लिए बेहद अहम था. लेकिन यह दांव उल्टा पड़ता दिख रहा है. ईरान ने अमेरिका के उन 15 शर्तों को अस्वीकार्य बताया है, जिसके बिनाह पर दोनों देशों के बीच इस्लामाबाद में युद्धविराम के लिए वार्ता होनी थी.

ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने कहा, ‘हम पाकिस्तान के प्रयासों के लिए आभारी हैं और कभी इस्लामाबाद जाने से इनकार नहीं किया. हमें इस बात की चिंता है कि हम पर थोपे गए इस अवैध युद्ध का निर्णायक और स्थायी अंत किस तरह से हो.’ इतना ही नहीं, सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता होने के बावजूद मध्यस्थता में कूदने से पाकिस्तान ने दोनों पक्षों- ईरान और खाड़ी देशों को नाराज कर दिया है. इससे सऊदी अरब भी असहज हुआ है. 

वहीं संयुक्त अरब अमीरात, जिसके साथ पाकिस्तान के रिश्ते पहले से तनावपूर्ण हैं, उसने इस्लामाबाद से 3.5 अरब डॉलर (करीब 2.9 लाख करोड़ रुपये) का कर्ज तुरंत लौटाने को कह दिया है. इतने बड़े संघर्ष में सभी पक्षों को खुश करने की पाकिस्तान की कोशिश किसी को भी संतुष्ट नहीं कर पाई. जियो-पॉलिटिक्स के एक्सपर्ट डेनियल बॉर्डमैन ने कहा, ‘पाकिस्तान ने अपनी क्षमता से ज्यादा बड़ा दांव खेल दिया.’

Daniel Bordman

पाकिस्तान और अफगानिस्तान समेत पूरे मिडिल ईस्ट की राजनीति पर विशेष पकड़ रखने वाले जियो पॉलिटिकल एक्सपर्ट राजा मुनीब ने कहा, ‘पाकिस्तान ने अपनी हद से ज्यादा जोखिम उठा लिया और अब उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. यही होता है जब कोई सोचता है कि वैश्विक स्तर पर सनसनीखेज सुर्खियां बटोरने से उसे अपने आप ही फायदा मिल जाएगा. लेकिन इसके बजाय उसे भारी शर्मिंदगी ही झेलनी पड़ती है.’

Raja Muneeb

भारत ने अपनाया संतुलित रुख

इसके उलट भारत ने संतुलित रणनीति अपनाई. 28 फरवरी से युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने सावधानी बरतते हुए अपने ऊर्जा हितों को सुरक्षित रखने पर ध्यान दिया और कच्चे तेल के स्रोतों में विविधता लाई. विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सर्वदलीय बैठक में कहा था कि भारत जियो-पॉलिटिक्स में ‘दलाल देश’ नहीं बन सकता. जहां पाकिस्तान ने जरूरत से ज्यादा सक्रियता दिखाई, वहीं भारत ने किसी एक साझेदारी पर निर्भर होने से बचते हुए सतर्क रुख बनाए रखा.

मध्यस्थता की कोशिश नाकाम?

पाकिस्तान अब तक मुख्य रूप से अमेरिका और ईरान के बीच संदेशवाहक की भूमिका में रहा है. 25 मार्च को उसने अमेरिका का 15 पॉइंट वाला संघर्षविराम प्रस्ताव ईरान तक पहुंचाया, जिसमें परमाणु कार्यक्रम छोड़ने और होर्मुज खोलने जैसी शर्तें थीं. इसके जवाब में ईरान ने पांच बिंदुओं का प्रस्ताव दिया. पाकिस्तान अब तक अमेरिका और ईरान को बातचीत की टेबल पर लाने में विफल रहा है. बीते हफ्तों में इस्लामाबाद में ईरानी अधिकारियों और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के बीच संभावित बैठक की चर्चा थी, लेकिन तेहरान ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया. वेंस के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल की इस्लामाबाद यात्रा की योजना दो बार टल चुकी है.

इस गतिरोध के बाद शांति प्रयास ठप पड़ गए हैं. अब तुर्किये और मिस्र जैसे अन्य मध्यस्थ कतर या इस्तांबुल जैसे वैकल्पिक स्थानों पर दोनों देशों के बीच वार्ता कराने की कोशिश कर रहे हैं. यह घटनाक्रम कहीं न कहीं इस बात का संकेत है कि इस्लामाबाद के प्रति तेहरान का भरोसा कम हुआ है, जबकि दोनों देश 1000 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं.

Pakistan's Ishaq Dar with leaders of Turkey, Egypt and Saudi Arabia
पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार तुर्की, मिस्र और सऊदी अरब के विदेश मंत्रियों के साथ. (Photo: AFP)

यूएई ने कर्ज चुकाने को कहा

इस बीच पाकिस्तान को एक और बड़ा झटका संयुक्त अरब अमीरात की ओर से मिला, जिसने 3.5 अरब डॉलर का कर्ज तुरंत लौटाने को कहा है. माना जा रहा है कि यूएई, ईरान के साथ पाकिस्तान की नजदीकियों से असंतुष्ट है. संघर्ष के दौरान ईरान ने यूएई पर 2500 से ज्यादा मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं. यह मुद्दा पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर की अबू धाबी यात्रा के दौरान भी उठाया गया था. जियो न्यूज के मुताबिक पाकिस्तान ने यूएई को मई तक चरणबद्ध तरीके से कर्ज लौटाने का आश्वासन दिया है. पहले खाड़ी देश पाकिस्तान को ‘रोलओवर’ व्यवस्था के तहत कर्ज चुकाने से राहत देते थे, लेकिन मौजूदा हालात में रुख बदल गया है.

पाकिस्तान पर पड़ी दोहरी मार

इस फैसले से पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ेगा. पाकिस्तान की पहले से ही कमजोर अर्थव्यवस्था, जो इंटरनेशनल मोनेटरी फंड (IMF) और विश्व बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और खाड़ी देशों के कर्ज पर निर्भर है, अब और दबाव में है. वैश्विक ऊर्जा संकट के कारण पाकिस्तान को ईंधन की कीमतों में 40% तक बढ़ोतरी करनी पड़ी है, सरकारी खर्च घटाना पड़ा है, स्कूल बंद करने पड़े हैं और दफ्तरों में वर्क फ्रॉम होम लागू करना पड़ा है. अमेरिका-ईरान युद्ध में मध्यस्थ बनने की पाकिस्तान की कोशिश ने उसकी सीमित कूटनीतिक क्षमता को उजागर कर दिया है. खाड़ी देशों के साथ तनाव और ईरान की नाराजगी के बीच पाकिस्तान अब कूटनीतिक उलझनों और आर्थिक दबाव के दोहरे संकट में फंस गया है.

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By uttu

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