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Rajya Sabha Electio Bihar Politics Analysis : बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों के लिए होने जा रहे चुनाव ने राज्य के राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह गर्मा दिया है. संख्या बल के लिहाज से एनडीए भले ही खुद को मजबूत बता रहा हो, लेकिन पर्दे के पीछे चल रही ‘बार्गेनिंग’ और बैठकों के दौर ने महागठबंधन, खासकर राजद की नींद उड़ा दी है. खास बात यह है कि इस पूरी उठापटक के केंद्र में इस बार असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम खड़ी नजर आ रही है जो अब बिहार की राजनीति में ‘साइड प्लेयर’ नहीं बल्कि ‘डिसीजन मेकर’ की भूमिका में दिख रही है. साफ है कि सियासी जानकार इस पूरे घटनाक्रम को तेजस्वी यादव की आरजेडी के लिए खतरे की घंटी मान रहे हैं.

तेजस्वी की सियासत के लिए नया सिरदर्द, बिहार की राजनीति के केंद्र में आती दिख रही AIMIM (फोटो- ट्विटर)
पटना. राजधानी पटना के होटल पनाश में एआईएमआईएम के विधायक तौसीफ आलम जब पहुंचे तो राजनीतिक रूप से बड़े संकेत दे गए. ऐसा इसलिए कि इसी होटल में राजद के विधायकों को ठहराया गया है. राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले एक विपक्षी विधायक का विरोधी खेमे के ‘बेस कैंप’ में पहुंचना कई सवाल खड़े कर रहा है. दरअसल, बिहार की राजनीति के बारे में कहा जाता है कि यहां सत्ता का रास्ता ‘एम-वाई’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण से होकर गुजरता है. हालांकि, बाद के दौर में जब नीतीश कुमार 2005 में सत्ता में आए तो यह परिस्थिति बदलती गई. लेकिन, यह भी सत्य है कि सालों तक इस समीकरण पर लालू प्रसाद यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव का एकछत्र राज रहा है. लेकिन, हाल के दिनों में इसपर एक अन्य सियासी ताकत की भी नजर पड़ गई है और वह बड़ी तेजी से इस ‘एम-वाई’ समीकरण में से ‘एम’ में पैठ बढ़ाती जा रही है. अब जब बिहार में राज्यसभा चुनाव है और जब पांचवीं सीट के लिए सियासी जंग छिड़ी है तो तेजस्वी यादव की चिंता बढ़ रही है. दरअसल, रविवार को पटना के होटल पनाश में जब एआईएमआईएम (AIMIM) के विधायक तौसीफ आलम ने कदम रखा तो यह सिर्फ एक मुलाकात नहीं थी, बल्कि तेजस्वी यादव के उस राजनीतिक वर्चस्व के टूटने का संकेत की ओर कद था जिसे लालू यादव की आरजेडी ने बरसों से संजोया था.
‘वोट कटवा’ से ‘किंगमेकर’ तक का सफर
बता दें कि कल तक जिस असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी को तेजस्वी यादव और आरजेडी के नेता ‘बीजेपी की बी-टीम’ और ‘वोट कटवा’ कहकर खारिज करते थे, आज उसी पार्टी के पांच विधायकों के सामने तेजस्वी को झुकने पर मजबूर होना पड़ा है. राज्यसभा की पांचवीं सीट पर जीत सुनिश्चित करने के लिए राजद को अतिरिक्त 6 वोटों की दरकार है. ऐसे में ओवैसी के पांच विधायक और बसपा का एक विधायक निर्णायक भूमिका में आ गए हैं. तेजस्वी यादव जानते हैं कि अगर आज उन्होंने ओवैसी को तवज्जो नहीं दी तो न सिर्फ राज्यसभा की सीट हाथ से जाएगी, बल्कि मुस्लिम समाज में यह संदेश जाएगा कि राजद को उनकी परवाह सिर्फ वोट बैंक के रूप में है.
मुस्लिम राजनीति का नया कोण बनती AIMIM
बिहार की राजनीति के लिहाज से यह राजद के लिए सबसे बड़ा ‘खतरे का सिग्नल’ है. राजनीतिक के जानकार कहते हैं कि तेजस्वी यादव कभी नहीं चाहते थे कि सीमांचल से बाहर निकलकर एआईएमआईएम पूरे बिहार के मुस्लिम वोटरों की आवाज बने. लेकिन पहले 2020 और अब 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव परिणामों और अब राज्यसभा के इस समीकरण ने साबित कर दिया है कि मुस्लिम मतदाता अब विकल्प तलाश रहे हैं. तौसीफ आलम का राजद विधायकों के पास होटल पहुंचना यह बता रहा है कि अब एआईएमआईएम सौदेबाजी की स्थिति में है. ऐसे में साफ है कि यह राजद की उस पारंपरिक राजनीति के लिए बड़ा खतरा है, जहां मुस्लिम वोटों को सुरक्षित मानकर चुनाव लड़ा जाता था.
ओवैसी का पुराना हिसाब और तेजस्वी की बेचैनी
सत्ताधारी दल के नेता संजय सिंह दावा कर रहे हैं कि एआईएमआईएम महागठबंधन के साथ नहीं जाएगी, क्योंकि वह 2022 का ‘धोखा’ नहीं भूली है जब राजद ने उनके चार विधायकों को तोड़ लिया था. अब स्थिति ठीक उलट है. सूत्रों के हवाले से यह खबर भी है कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान ने खुलेआम राज्यसभा की सीट या विधान परिषद में हिस्सेदारी की मांग रख दी है. तेजस्वी के लिए मुश्किल यह है कि अगर वह झुकते हैं, तो ओवैसी का कद बढ़ता है, और अगर नहीं झुकते हैं, तो राज्यसभा में हार तय है. साफ है कि यही स्थिति अब राजद के बंद कमरों की बैठकों में बेचैनी पैदा कर रही है.
सीमांचल से बाहर निकलता ओवैसी का प्रभाव
एक बड़ा पहलू यह भी है कि बिहार के मुस्लिम बहुल इलाकों में अब युवा वोटर राजद की ‘सेकुलरिज्म’ वाली दलीलों के बजाय एआईएमआईएम की ‘नुमाइंदगी’ वाली राजनीति को पसंद कर रहे हैं. अब तेजस्वी यादव के लिए बड़ा खतरा यह है कि अगर राज्यसभा चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी ताकत दिखा दी तो आने वाले समय में उत्तर बिहार के अन्य जिलों में भी राजद का बड़ा आधार खिसकने का खतरा हो सकता है. जानकार भी कहते हैं कि एआईएमआईएम का बिहार की राजनीति के केंद्र में आना यह स्पष्ट करता है कि अब तेजस्वी यादव अकेले मुस्लिम वोटों के रहनुमा नहीं रह गए हैं.
16 मार्च को तय होगा किसका पलड़ा भारी
बिहार की राजनीति के जानकार जानकार इस मामले से जुड़े घटनाक्रम को ध्यान में रखकर बड़ी स्पष्ट राय रखते हुए कहते हैं कि अब 16 मार्च को राज्यसभा चुनाव मतदान सिर्फ उच्च सदन के सांसदों का चुनाव नहीं करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि बिहार की मुस्लिम राजनीति का नया ‘बॉस’ कौन है. अगर तेजस्वी यादव, असदुद्दी ओवैसी की शर्तों को मानकर समर्थन हासिल करते हैं तो यह उनकी रणनीतिक हार और ओवैसी की बड़ी जीत मानी जाएगी. वहीं, अगर एनडीए इन पांचों सीटों को जीतने में सफल रहता है तो तेजस्वी यादव के ‘एम-वाई’ समीकरण पर उठ रहे सवाल और भी तीखे हो जाएंगे.
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