युद्ध के महासंकट में भी भारत ‘अजेय’, मोदी और जयशंकर ने यूं बुना कूटनीति का जाल
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दुनिया इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां बारूद की गंध और ऊर्जा की कमी ने बड़े-बड़े देशों के पसीने छुड़ा दिए हैं. अमेरिका और इजरायल की संयुक्त सेनाओं का ईरान के साथ युद्ध अब ग्लोबल इकोनॉमी के लिए ‘ब्लैक होल’ बन गया है. ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने दुनिया की सबसे अहम तेल लाइफलाइन ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) को बंद रखने का ऐलान कर दिया है. जहां दुनिया इस संकट से कांप रही है, वहीं भारत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन और विदेश मंत्री एस. जयशंकर की धारदार कूटनीति से अपने हितों को सुरक्षित कर लिया है. भारत ने न केवल अपनी तेल सप्लाई को डाइवर्सिफाई किया, बल्कि पड़ोसियों की मदद कर ग्लोबल लीडर के रूप में भी उभरा है. (Photos : PTI)

प्रधानमंत्री मोदी ने गुरुवार को कहा कि भारत किसी भी दबाव में नहीं आएगा. उन्होंने उन लोगों को आड़े हाथों लिया जो देश में पैनिक या डर का माहौल पैदा कर रहे हैं. पीएम मोदी ने कहा कि भारत ने 2014 के बाद से अपनी ऊर्जा आत्मनिर्भरता पर इतना काम किया है कि आज हम किसी भी वैश्विक झटके को झेलने के लिए तैयार हैं. 2014 में जहां सिर्फ 14 करोड़ एलपीजी कनेक्शन थे, आज वे बढ़कर 33 करोड़ से अधिक हो चुके हैं. एलएनजी टर्मिनल्स की संख्या भी दोगुनी हो चुकी है. सरकार का पूरा फोकस इस बात पर है कि युद्ध का बोझ भारत के आम नागरिक और किसान पर न पड़े.

जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद हुआ, तो भारत की 55% एलपीजी सप्लाई पर संकट के बादल मंडराने लगे थे. ऐसे समय में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मोर्चा संभाला. उन्होंने ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची के साथ लगातार तीन बार लंबी बातचीत की. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के अनुसार, इन वार्ताओं का मुख्य केंद्र भारत के तेल जहाजों की सुरक्षा और एनर्जी सिक्योरिटी है. जयशंकर ने साफ कर दिया कि भारत अपने हितों से समझौता नहीं करेगा. तेहरान के साथ भारत के पुराने और मजबूत रिश्तों का नतीजा है कि भारत-गामी ईंधन जहाजों को रास्ता देने पर बातचीत सकारात्मक दिशा में बढ़ रही है.

पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने संसद में जो आंकड़े पेश किए, वे भारत की दूरदर्शिता की गवाही देते हैं. भारत ने अपनी तेल खरीद को होर्मुज के रास्ते से हटाकर ‘नॉन-होर्मुज’ सोर्सेज पर शिफ्ट कर दिया है. अब भारत की 70% क्रूड सप्लाई उन रास्तों से आ रही है जो युद्ध क्षेत्र से दूर हैं. पहले यह आंकड़ा 55% था. भारत अब 27 के बजाय 40 देशों से कच्चा तेल खरीद रहा है. रूस, अमेरिका, नॉर्वे, कनाडा और अल्जीरिया जैसे देशों से तेल मंगाकर भारत ने अपनी निर्भरता को डाइवर्सिफाई कर दिया है. (Photo : Reuters)
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विपक्ष के शोर-शराबे के बीच हरदीप पुरी ने लोकसभा में स्पष्ट किया कि देश में पेट्रोल, डीजल या एलपीजी की कोई कमी नहीं है. सरकार ने घरेलू एलपीजी उत्पादन को 28% तक बढ़ा दिया है. रिफाइनरीज को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपनी क्षमता से ज्यादा काम करें. इतना ही नहीं, सरकार ने जमाखोरी रोकने के लिए ‘डिलीवरी ऑथेंटिकेशन कोड’ (DAC) का दायरा 50% से बढ़ाकर 90% कर दिया है. इसका मतलब है कि अब गैस सिलेंडर की कालाबाजारी नामुमकिन होगी. भारत सरकार ने एलपीजी की कीमतों को भी ग्लोबल मार्केट के उतार-चढ़ाव से बचाकर रखा है. जहां पाकिस्तान और श्रीलंका में गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं, भारत में पीएमयूवाई लाभार्थियों को राहत दी जा रही है.

भारत की कूटनीति सिर्फ खुद तक सीमित नहीं है. संकट की इस घड़ी में बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों ने भारत से मदद मांगी है. बांग्लादेश ने डीजल की सप्लाई के लिए अनुरोध किया है, जिसे भारत ‘पीपल-सेंट्रिक’ अप्रोच के तहत पूरा करने पर विचार कर रहा है. नुमालीगढ़ रिफाइनरी और भारत-बांग्लादेश फ्रेंडशिप पाइपलाइन इस संकट में संजीवनी का काम कर रही हैं. यह दिखाता है कि भारत न केवल अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है, बल्कि दक्षिण एशिया के नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर और एनर्जी हब के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है.

एक तरफ अमेरिका के ऊर्जा सचिव क्रिस राइट कह रहे हैं कि उनकी नौसेना अभी तेल टैंकरों को सुरक्षा (Escort) देने की स्थिति में नहीं है, वहीं भारत ने अपने बैकअप प्लान पहले से ही तैयार रखे थे. अमेरिका अपने स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व से 172 मिलियन बैरल तेल निकाल रहा है, फिर भी बाजार में डर है. इसके उलट, भारत ने अपनी रिफाइनिंग कैपेसिटी और सोर्स डायवर्सिफिकेशन के जरिए बाजार में स्थिरता बनाए रखी है. भारतीय रिफाइनरीज 100% से अधिक क्षमता पर काम कर रही हैं, जो एक रिकॉर्ड है. (Photo : Reuters)

मिडिल ईस्ट का यह संकट भारत के लिए एक कड़ा इम्तिहान था. पीएम मोदी के ‘आत्मनिर्भर’ विजन और जयशंकर की ‘बैलेंस्ड’ विदेश नीति ने यह साबित कर दिया कि भारत अब ग्लोबल एजेंडा तय करने वाला देश है. युद्ध चाहे कहीं भी हो, भारत के हित सुरक्षित हैं.
