कोलकाता. पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले में बसा ‘डेबरा’ घाटल लोकसभा सीट का एक अहम हिस्सा है. खड़गपुर अनुमंडल का यह ब्लॉक-स्तरीय कस्बा लहलहाती खेती, सीधे-सादे ग्रामीण जीवन और कल-कल बहती नदियों के लिए जाना जाता है.
इस इलाके की भौगोलिक संरचना में जलोढ़ मैदानों की नरमी है और जिले के कुछ हिस्सों में पाई जाने वाली लेटराइट मिट्टी की सख्ती भी. कंगसाबाती, सिलाबती और सुवर्णरेखा जैसी प्रमुख नदियां इस इलाके के नजदीक से होकर गुजरती हैं. ये नदियां डेबरा के लिए वरदान भी हैं और अभिशाप भी. ये खेतों को तो सींचती हैं, लेकिन मानसून के दिनों में नदियों का उफान, टूटते तटबंध और बाढ़ यहां की दिनचर्या का हिस्सा बन जाते हैं.
यहां की 95.22 प्रतिशत आबादी गांवों में बसती है. खेतों में धान, जूट की फसलें, सरसों की पीली चादर और आम-अमरूद के बागान यहां की आत्मा हैं. पास ही मौजूद साल, सागौन और बबूल के जंगल इसकी प्राकृतिक सुंदरता में चार चांद लगाते हैं. किसानी, मछली पालन और छोटे ग्रामीण व्यापार यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं. कनेक्टिविटी के मामले में यह इलाका बेहद भाग्यशाली है. राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) पर बसे होने और बेहतरीन रेल सुविधा के कारण यह खड़गपुर, मेदिनीपुर और राज्य की राजधानी कोलकाता से सीधे जुड़ा हुआ है.
साल 2011 में यहां 92.67 प्रतिशत का बंपर मतदान हुआ था, जो 2021 में भी यह करीब 87.48 प्रतिशत के आसपास रहा. 1957 में अस्तित्व में आने के बाद से डेबरा का चुनावी इतिहास दिलचस्प बदलावों के तीन अलग-अलग दौर से गुजरा है. पहला युग (1957-1972) कांग्रेस के वर्चस्व का दौर था. पहले छह चुनावों में से चार में कांग्रेस ने जीत का परचम लहराया, जबकि बाकी दो बार उसकी ही शाखा ‘बांग्ला कांग्रेस’ ने जीत दर्ज की.
दूसरा युग (1977-2006) में लाल झंडे की ऐसी आंधी चली जिसने पुराने सारे गढ़ ढहा दिए. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीआई (एम) ने इस सीट पर एकछत्र राज कायम किया और लगातार सात चुनाव जीते. सीपीआई (एम) के कद्दावर नेता शेख जहांगीर करीम ने तो 1987 से 2006 तक लगातार पांच बार जीतकर डेबरा को वाम मोर्चे का अभेद्य किला बना दिया.
तीसरे युग (2011 से अब तक) में जब ममता बनर्जी की अगुवाई में बंगाल में सत्ता परिवर्तन की लहर चली, तो डेबरा भी ‘मां, माटी, मानुष’ के रंग में रंग गया. तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने यहां लगातार तीन विधानसभा चुनावों में तीन अलग-अलग चेहरों के साथ क्लीन स्वीप किया है. 2011 में राधाकांत मैती ने वाम मोर्चे के सोहराब हुसैन को 8,813 वोटों से हराया. 2016 में सेलिमा खातून ने सीपीआई (एम) के उसी अजेय योद्धा जहांगीर करीम को 11,908 वोटों से मात दी.
लेकिन, सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरीं 2021 के विधानसभा चुनाव ने. यह खाकी से खादी तक का सफर तय करने वाले दो पूर्व दिग्गज आईपीएस अधिकारियों की भिड़ंत थी. तृणमूल के टिकट पर उतरे पूर्व आईपीएस हुमायूं कबीर ने भाजपा की कद्दावर नेता और पूर्व आईपीएस भारती घोष को 11,226 वोटों के अंतर से शिकस्त देकर एक ऐतिहासिक जीत दर्ज की. सीपीआई (एम) इस चुनाव में खिसक कर तीसरे नंबर पर जा पहुंची.
असली चुनौती 2019 के लोकसभा चुनाव में सामने आई, जब भारतीय जनता पार्टी ने तीसरे स्थान से सीधी छलांग लगाकर तृणमूल कांग्रेस को चौंका दिया और विधानसभा क्षेत्र में 4,019 वोटों की बढ़त ले ली. हालांकि, तृणमूल कांग्रेस ने हार नहीं मानी और 2024 के लोकसभा चुनाव में जबरदस्त पलटवार करते हुए इस सेगमेंट में वापस 5,766 वोटों की लीड हासिल कर ली.
