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‘भारतीय होने का सबूत मांगने से अच्छा था मौत दे देते’, पश्चिम बंगाल के 6 लोगों ने राष्ट्रपति को लिखा खत

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कागजों में उलझ गई बेबस लोगों की जिंदगी, इच्छामृत्यु की गुहार ने सिस्टम को घेरा

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बीजेपी का दावा है कि पुख्ता प्रमाण पत्र न देने वालों के नाम ही काटे गए हैं. लेकिन इन पीड़ित लोगों के गले में लटके कागज प्रशासन के झूठ की पोल खोल रहे हैं. इस घटना ने इंसानियत और राजनीति के बीच एक बहुत बड़ी खाई पैदा कर दी है.

कागजों में उलझ गई बेबस लोगों की जिंदगी, इच्छामृत्यु की गुहार ने सिस्टम को घेराZoom

गले में पेंशन के कागज लटकाकर सभी लोग इच्छामृत्यु की गुहार लगा रहे हैं.

हुगली. पश्चिम बंगाल के हुगली से एक बहुत ही दर्दनाक और झकझोर देने वाली खबर सामने आई है. आरामबाग में छह बेबस लोगों ने सीधे राष्ट्रपति से अपनी इच्छामृत्यु की गुहार लगाई है. एसआईआर (SIR) की लिस्ट से नाम कटने के बाद ये लोग पूरी तरह से टूट चुके हैं. इन लोगों ने अपने गले में अपनी पूरी जिंदगी की कमाई यानी पेंशन के कागज, आधार और पासपोर्ट लटका रखे थे. सोमवार को ये सभी रोते हुए एसडीएम (SDO) आफिस पहुंचे. इनका दर्द देखकर वहां मौजूद हर इंसान की आंखें नम हो गईं. इनका साफ कहना है कि जब अपने ही देश में उन्हें अजनबी बना दिया गया, तो फिर जीने का क्या फायदा. यह कोई आम लोग एकदम नहीं हैं. इनमें एक रिटायर्ड हेडमिस्ट्रेस और कालेज के पूर्व प्रिंसिपल भी शामिल हैं. इस दर्दनाक घटना ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

‘डिटेंशन कैंप के डर से कांपे लोग’
यह नजारा देखकर किसी का भी दिल पसीज जाएगा. ये लोग अपनी पहचान साबित करने के लिए दर-दर भटक रहे हैं. प्रशासनिक जटिलता ने इन बुजुर्गों को मानसिक रूप से पूरी तरह मार दिया है. वार्ड 6 के करीब 200 लोगों के नाम इस लिस्ट से काट दिए गए हैं. लोग अपने गले में सारे पुख्ता डाक्यूमेंट्स लटकाकर अपना विरोध जता रहे हैं. उनका कहना है कि स्वतंत्र देश में पैदा होने के बाद भी उन्हें डिटेंशन कैंप का डर है. इन बेबस लोगों का कहना है कि रोज-रोज घुटकर मरने से एक बार की मौत ज्यादा भली है.

‘सिस्टम ने कर दिया पूरी तरह बेगाना’
जिन हाथों ने कभी देश का भविष्य गढ़ा था, आज वे हाथ अपनी नागरिकता की भीख मांग रहे हैं. यह बहुत ही ज्यादा शर्मनाक है. इनमें एक बुजुर्ग महिला शामिल हैं जिन्होंने जीवन भर एक सरकारी स्कूल में पढ़ाया है. वह एक हाई स्कूल की हेडमिस्ट्रेस भी रही हैं और उनके पति कॉलेज के प्रिंसिपल थे. समाज को दिशा देने वाले ये लोग आज सिस्टम की बेरुखी का भारी शिकार हो गए हैं. इतने सारे ठोस डॉक्यूमेंट्स होने के बाद भी लिस्ट से उनका नाम काट दिया गया है. जिंदगी के आखिरी पड़ाव में उन्हें इस तरह जलील किया जाना बहुत ही दर्दनाक है.

‘लापरवाही से टूट गई जीने की उम्मीद’
इस रुला देने वाली घटना पर भी अब भारी पॉलिटिक्स शुरू हो गई है. नेता लोग इस दर्द को समझने के बजाय बयानबाजी कर रहे हैं. आरामबाग के बीजेपी जिलाध्यक्ष सुशांत बेरा ने इस पूरे मामले पर अपनी बात रखी है. उनका कहना है कि यह पूरा मामला सीधे चुनाव आयोग के अंडर में आता है. बीजेपी का दावा है कि पुख्ता प्रमाण पत्र न देने वालों के नाम ही काटे गए हैं. लेकिन इन पीड़ित लोगों के गले में लटके कागज प्रशासन के झूठ की पोल खोल रहे हैं. इस घटना ने इंसानियत और राजनीति के बीच एक बड़ी खाई पैदा कर दी है.

By uttu

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