नई दिल्ली: केंद्र सरकार महिला आरक्षण कानून यानी ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पर एक ऐतिहासिक फैसला लेने की ओर कदम बढ़ा रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार इस कानून को जनगणना (Census) और परिसीमन (Delimitation) की अनिवार्य शर्तों से अलग करने की संभावना तलाश रही है. इसका मतलब यह है कि 33 प्रतिशत महिला आरक्षण के लिए अब दशकों का इंतजार नहीं करना होगा. सरकार का लक्ष्य है कि साल 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों में इसे पूरी तरह लागू कर दिया जाए. इस कदम से भारतीय राजनीति के समीकरण पूरी तरह बदलने की उम्मीद है.
लॉटरी सिस्टम से तय होंगी महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें?
महिला आरक्षण को जल्द लागू करने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा यह थी कि कौन सी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. पहले इसके लिए परिसीमन का इंतजार किया जा रहा था. लेकिन अब सरकार एक ‘लॉटरी सिस्टम’ (Lottery System) पर गंभीरता से विचार कर रही है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इस सिस्टम के जरिए निष्पक्ष रूप से एक तिहाई निर्वाचन क्षेत्रों का चयन किया जा सकेगा जिन्हें महिलाओं के लिए आरक्षित किया जाना है. सूत्रों का कहना है कि सरकार इस विकल्प को सबसे व्यावहारिक मान रही है ताकि बिना किसी देरी के 2027 के चुनावी रण में महिला उम्मीदवारों की भागीदारी सुनिश्चित की जा सके.
बजट सत्र में ही संशोधन की तैयारी
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस मामले में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से दो बार बात की है. सरकार चाहती है कि मौजूदा बजट सत्र में ही, जो 2 अप्रैल 2026 को समाप्त होने वाला है, इस कानून में जरूरी संशोधन पेश कर दिए जाएं. रिजिजू अन्य विपक्षी दलों से भी आम सहमति बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
कांग्रेस, टीएमसी और डीएमके जैसे दल पहले ही मांग कर चुके हैं कि महिला आरक्षण को परिसीमन और जनगणना के भरोसे न छोड़ा जाए. अब सरकार उन्हीं की मांग के अनुरूप कानून को ‘फास्ट-ट्रैक’ करने की योजना बना रही है.
क्यों बदला गया पहले का फैसला और क्या थी पुरानी शर्तें?
विपक्ष ने उस वक्त इसे ‘चुनावी ड्रामा’ करार दिया था और कहा था कि परिसीमन में 20 से 30 साल भी लग सकते हैं. अब सरकार ने इन तकनीकी बाधाओं को हटाकर इसे तुरंत लागू करने का मन बना लिया है ताकि महिला सशक्तिकरण के वादे को हकीकत में बदला जा सके.
2027 के चुनावों पर क्या होगा इस फैसले का असर?
अगर यह संशोधन पारित हो जाता है, तो उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों के राजनीतिक हालात पूरी तरह बदल जाएंगे. विधानसभा की एक तिहाई सीटों पर सिर्फ महिला उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकेंगी. इससे न केवल राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति बदलनी होगी, बल्कि बड़ी संख्या में महिला नेतृत्व उभरकर सामने आएगा.
सरकार का यह कदम आधी आबादी को राजनीति की मुख्यधारा में लाने के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकता है. विपक्षी दल भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की स्थिति में नहीं होंगे क्योंकि वे खुद इसे जल्द लागू करने की वकालत करते रहे हैं.
