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यामी गौतम की ‘हक’ ने लिया हकीकत का सहारा, पर सियासत से किया किनारा! – haq yami gautam film political analysis bjp congress shah bano case ntcpsm

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‘हक’ के आखिरी सीन में कई बच्चियां हाथों में पतंग लिए, एक उल्लास के साथ दौड़ रही हैं. कैमरा जिस बच्ची को फॉलो कर रहा है वो दौड़ती हुई जाती है और बाकी बच्चियों के बीच एक क्लास में बैठ जाती है. ये लड़कियों के लिए कुरान की क्लास है. क्लास ले रहीं टीचर इन बच्चियों को कुरान का पहला शब्द सिखाती हैं— इकरा. ये अरबी भाषा का शब्द है. इकरा यानी ‘पढ़ो’. 

फिल्म की ये टीचर यामी गौतम हैं. किरदार शाह बानो का है, जिसके हक में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है. मगर जिस लड़की को कैमरा फॉलो कर रहा था, उसकी पतंग पर आपकी नजर एक बार जरूर टिकती है— केसरिया रंग की पतंग.

रंग दे तू मोहे पॉलिटिक्स!
फिल्म कहती है कि शाह बानो ने खुद कुरआन पढ़ी, समझी इसलिए हक की लड़ाई जीत पाईं. वरना खुद को ही खुदा समझ बैठे मौलवी-काज़ी न जाने कैसे गुमराह कर देते. इसलिए ‘हक’ का लास्ट सीन― पतंगें और खिलखिलाती बच्चियां, शाह बानो के बहाने लड़कियों को मिली नई उड़ान का प्रतीक हैं. लेकिन जिस दौर में बिकिनी तक का रंग पॉलिटिकल चर्चाओं का मुद्दा हो, वहां एक पतंग के रंग पर ध्यान कैसे न अटके!

शाह बानो केस की कहानी में ‘हक’ धीरे से यूनिफॉर्म सिवल कोड (UCC) का जिक्र सरका देती है― सत्ता में बैठी बीजेपी की राष्ट्रवादी राजनीति के लिए बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा. राइट विंग पॉलिटिक्स के सिलेबस से निकले कई मंत्र ‘हक’ धीरे से फुसफुसा देती है, बिना किसी पार्टी का नाम लिए. शाह बानो का मैटर दीन वर्सेज महिला अधिकार में बदल जाता है. 

भारतीय मुसलमान बनाम पाकिस्तानी मुसलमान, गुड मुस्लिम वर्सेज बैड मुस्लिम, शरीयत बनाम सेक्युलर लॉ जैसी बहसें शाह बानो केस के नैरेटिव में फिट कर देती है. शाह बानो (और सॉलिड एक्टिंग करतीं यामी) से सिंपथी रखता दर्शक इस राजनीतिक टोन को सोशल मैसेज समझ ले तो कोई चौंकाने वाली बात नहीं है. मगर ‘हक’ बड़ी सफाई से पूरे शाह बानो केस और ट्रिपल तलाक की बहस के बीच कांग्रेस का रोल गायब कर देती है.

84 में कहां थी पॉलिटिक्स?
1981 में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने से पहले ही शाह बानो केस अखबारों में छपने लगा था. तलाकशुदा महिलाओं को मेंटेनेंस का अधिकार देने वाला CrPC का सेक्शन 125 सबसे बड़ा पेंच था― क्या ये मुस्लिम मामलों में लागू होगा? क्योंकि वहां तो मुस्लिम पर्सनल लॉ चलता है.  

मुस्लिम पर्सनल लॉ बनाम इंडियन सेक्युलर लॉ की राजनीति ने आग पकड़ी. 1983-84 में केस की हर सुनवाई की आंच पॉलिटिक्स को भी तपाने लगी. उधर 1984 में देश की राजनीति में कोहराम मचा था. 

31 अक्टूबर 1984 की सुबह अपनी मां इंदिरा गांधी के बाद, शाम को राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बन गए. दिसंबर के लोकसभा चुनावों की जीत से उन्होंने पहला बड़ा एग्जाम पास किया. लेकिन 1985 में फरवरी से सितंबर तक 14 राज्यों के विधानसभा चुनाव होने थे. यानी अप्रैल 1985 में जब सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो के हक में फैसला सुनाया तो राजनीति के कुकर में बना प्रेशर सीटी मारने लगा. 

कोर्ट के फैसले की कानूनी काट
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीअत उलेमा-ए-हिंद समेत कई संगठन और नेता विरोध में उतर आए. पॉलिटिकल प्रेशर कुकर की सीटी कांग्रेस नेताओं के कान बेधने लगी― सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने वाला कोई कानून नहीं बना तो बड़ा वोट बैंक खिसकेगा और चुनाव में रिस्क होगा. भाषणों में गुपचुप सिग्नल दिए जाने लगे― ‘अल्पसंख्यकों की आवाज सुनी जाएगी’. 

मई 1985 में निर्दलीय सांसद जी एम बनातवाला संसद में प्राइवेट बिल ले आए― मुस्लिमों को CrPC के सेक्शन 125 से बाहर रखा जाए. कांग्रेस इस बिल के सपोर्ट में उतर गई. ये प्राइवेट बिल तो कहीं नहीं पहुंचा. लेकिन स्पष्ट बहुमत वाली राजीव गांधी सरकार ने संसद से अपना एक कानून पास करवा लिया― मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986. 

अब तलाकशुदा महिलाएं केवल 90 दिनों के इद्दत पीरियड के दौरान ही पूर्व पति से मेंटेनेंस का दावा कर सकती थीं. सुप्रीम कोर्ट का फैसला बेअसर हो गया. मेंटेनेंस के लिए शाह बानो की पूरी लड़ाई से न्याय की जो नजीर सेट हुई थी , वो धरी रह गई. 

बीजेपी, लेफ्ट पार्टियों और कई संगठनों ने इसे ‘तुष्टीकरण की राजनीति’ कहकर विरोध किया. ये मामला 2001 में आकर पलटा जब सुप्रीम कोर्ट ने राजीव गांधी सरकार के 1986 वाले कानून की एक नई इंटरप्रिटेशन दी, जो शाह बानो केस के फैसले पर आधारित थी. मुस्लिम महिलाओं को तलाक के बाद पति से मेंटेनेंस मिलने का रास्ता दोबारा खुला. 

2017 में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल तलाक को गैर-कानूनी माना और इस पर कानून बनाने को कहा.  बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने इसी आधार पर कानून बनाया— मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019. उस समय भी संसद में कांग्रेस और कई विपक्षी पार्टियों ने इस कानून का बहुत विरोध किया था. 

शाह बानो केस में कांग्रेस का जिक्र किए बिना ना ‘हक’ की बात हो सकती थी, ना पॉलिटिक्स की. कहानी का एक बड़ा पहलू बिना छुए ही यामी गौतम की फिल्म दो घंटे में खत्म हो गई. पर अंत में 2019 वाले कानून के लिए सरकार की पीठ थपथपाना नहीं भूली― बिना पार्टी का नाम लिए! 

लॉकडाउन के बाद ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘द केरला स्टोरी’ और ‘बस्तर’ जैसी फिल्मों ने कांग्रेस सरकार और नेताओं को खूब लपेटा है. सबसे बड़ी हिंदी फिल्म ‘धुरंधर’ ने भी ऐसी छोटी सी कोशिश की. ऐसी हर कोशिश को उसके हिस्से के विवाद भी मिले पर ‘हक’ बहुत सावधानी से खेली. शायद इसीलिए एक खेमा सोशल मीडिया पर इसकी खूब वाहवाही कर रहा है, तो दूसरा भी आहत नहीं है. और फिल्म नेटफ्लिक्स पर ट्रेंड हो रही है.

ये पॉलिटिकल सलामी है या फिल्ममेकर का एक्सप्रेशन, या फिर पॉलिटिक्स के सहारे बाजार में अपना माल बेच लेने की जुगत… ये ‘हक’ देखकर आप खुद तय कर सकते हैं. हमारी राय एक ही है― ‘इकरा’!

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By uttu

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