Sun. Feb 22nd, 2026

राहुल गांधी की रणनीति: कांग्रेस में गुटबाजी और नेतृत्व संकट

Rahul Gandhi 2026 02 47413ea9c5c6549909c4b5be41fd377d

होमताजा खबरदेश

क्या राहुल गांधी की रणनीति कांग्रेस को रसातल में ले जा रही है?

Last Updated:

भूपेन कुमार बोरा के इस्तीफे के बाद कांग्रेस में गुटबाजी, नेतृत्व संकट और सहयोगियों से तालमेल की कमी ने पार्टी की स्थिति कई राज्यों में कमजोर कर दी है. राहुल गांधी पर सवाल उठे हैं. बिहार में राजद के साथ गठबंधन के बावजूद कांग्रेस को ‘बोझ’ के रूप में देखा गया. ओडिशा में संगठन लगातार कमजोर हो रहा है. राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच टकराव को 2023 में सत्ता गंवाने की बड़ी वजह माना गया.

ख़बरें फटाफट

क्या राहुल गांधी की रणनीति कांग्रेस को रसातल में ले जा रही है?Zoom

कुछ लोग मानते हैं कि राहुल गांधी की नेतृत्व शैली कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है. (फाइल फोटो)

नई दिल्ली. असम कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन कुमार बोरा के पार्टी में ‘अपमान’ का आरोप लगाते हुए इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस की लगातार गिरती राजनीतिक स्थिति और केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका पर सवाल फिर से उठ खड़े हुए हैं. बोरा ने चुनाव से ठीक पहले पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया, जिससे संगठनात्मक कमजोरी और आंतरिक कलह की बहस तेज हो गई है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कई राज्यों में कांग्रेस की इकाइयां अंदरूनी गुटबाजी, आपसी अविश्वास और सहयोगी दलों के साथ तालमेल की कमी के कारण हाशिये पर सिमटती जा रही हैं. आलोचकों के अनुसार, शीर्ष नेतृत्व की निर्णय प्रक्रिया में कथित ‘सुस्ती’ और समय पर हस्तक्षेप न कर पाने की प्रवृत्ति पार्टी के लगातार क्षरण का कारण बन रही है.

कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्दारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच सत्ता संतुलन को लेकर लंबे समय से खींचतान चल रही है. बताया जाता है कि राहुल गांधी की मुलाकातों के बावजूद मतभेद पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं. हिमाचल प्रदेश में सुखविंदर सिंह सुक्खू और प्रतिभा सिंह गुटों के बीच प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर संघर्ष देखने को मिला. पार्टी ने राज्य इकाई भंग कर संतुलन साधने की कोशिश की, लेकिन असंतोष बना रहा.

दिल्ली और हरियाणा में नाकाम हुई कांग्रेस
दिल्ली में, जहां कभी शिला दीक्षित के नेतृत्व में 15 साल तक कांग्रेस की सरकार रही, पार्टी आज एकजुट चेहरा पेश करने में नाकाम दिखती है. हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी सैलजा के बीच मतभेदों ने 2025 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाया. पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच टकराव ने पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया. बाद में चरणजीत सिंह चन्नी को जिम्मेदारी दी गई, लेकिन तब तक काफी क्षति हो चुकी थी.

पूर्वोत्तर और बंगाल में भी कहीं नहीं
उत्तर प्रदेश में संगठन भंग करने के बावजूद कांग्रेस पुनर्जीवित नहीं हो पाई. पूर्वोत्तर राज्यों, खासकर असम और अरुणाचल प्रदेश में भी पार्टी अव्यवस्था का सामना कर रही है. पश्चिम बंगाल में सीएम ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस से दूरी बना ली है. झारखंड में हेमंत सोरेन की पार्टी के साथ गठबंधन भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका.

गुजरात-महाराष्ट्र में बीजेपी को चुनौती देने में विफल
बिहार में राजद के साथ गठबंधन के बावजूद कांग्रेस को ‘बोझ’ के रूप में देखा गया. ओडिशा में संगठन लगातार कमजोर हो रहा है. राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच टकराव को 2023 में सत्ता गंवाने की बड़ी वजह माना गया. गुजरात और महाराष्ट्र में भी पार्टी दो दशक से अधिक समय से भाजपा को चुनौती देने में विफल रही है. तमिलनाडु में द्रमुक के साथ गठबंधन के बावजूद सीट बंटवारे को लेकर मतभेद उभर रहे हैं, जिससे आगामी चुनावों से पहले असहज स्थिति बन रही है.

कुल मिलाकर, कई राज्यों में लगातार गुटबाजी, नेतृत्व संकट और सहयोगियों के साथ तालमेल की कमी ने कांग्रेस की स्थिति को कमजोर किया है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या पार्टी की मौजूदा चुनौतियों के लिए शीर्ष नेतृत्व, खासकर राहुल गांधी की रणनीति और हस्तक्षेप की शैली जिम्मेदार है.

About the Author

authorimg

Rakesh Ranjan Kumar

राकेश रंजन कुमार को डिजिटल पत्रकारिता में 10 साल से अधिक का अनुभव है. न्यूज़18 के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने लाइव हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज़, जनसत्ता और दैनिक भास्कर में काम किया है. वर्तमान में वह h…और पढ़ें

By uttu

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *