देश में लोकतंत्र को और मजबूत करने के लिए मतदान को सभी के लिए अनिवार्य बनाने जैसे किसी तंत्र पर विचार किए जाने की जरूरत है. यह व्यवस्था जरूरी नहीं कि दंडात्मक हो, लेकिन इसका उद्देश्य अधिक से अधिक योग्य नागरिकों को चुनावी प्रक्रिया से जोड़ना और ‘नोटा’ (None of the Above) विकल्प को अप्रासंगिक बनाना होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को यह बड़ी टिप्पणी की.
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने कहा कि नोटा का प्रावधान बेहतर उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में लाने और मतदाताओं को अपने मताधिकार के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित करने के मकसद से लाया गया था. हालांकि, पिछले एक दशक के अनुभव से यह सामने आया है कि बहुत ही नगण्य संख्या में मतदाताओं ने इस विकल्प का इस्तेमाल किया है.
PIL की सुनवाई के दौरान आई टिप्पणी
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत यह टिप्पणी विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी की ओर से दायर एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान की. याचिका में मांग की गई थी कि जिन निर्वाचन क्षेत्रों में केवल एक ही उम्मीदवार चुनाव लड़ रहा हो, वहां नोटा को एक उम्मीदवार के रूप में शामिल किया जाए, ताकि यह पता चल सके कि उस अकेले उम्मीदवार को वास्तव में मतदाताओं का समर्थन प्राप्त है या नहीं.
‘संसद को करना होगा कानून में संशोधन’
इस पर सुप्रीम कोर्ट बेंच ने साफ किया कि अगर नोटा को उम्मीदवार का दर्जा देना है, तो इसके लिए जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में संसद को संशोधन करना होगा. इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने दलील दी कि नोटा को उम्मीदवार बनाने से धनबल और बाहुबल के दम पर अन्य उम्मीदवारों को मैदान से हटाने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी.
अटॉर्नी जनरल की आपत्ति
इस मामले में आर. वेंकटरमणि ने अदालत में आपत्ति जताते हुए कहा कि जब मतदान कोई मौलिक अधिकार नहीं है, तो फिर अनुच्छेद 32 के तहत दायर यह याचिका कैसे सुनवाई योग्य हो सकती है. उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को यह तय नहीं करना चाहिए कि कानून में क्या संशोधन होना चाहिए, यह संसद का विशेषाधिकार है.
सरकार का हलफनामा
सरकार ने अपने हलफनामे में PIL का विरोध करते हुए कहा कि नोटा कोई व्यक्ति या विधिवत नामांकित प्रत्याशी नहीं है, इसलिए उसे जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत उम्मीदवार नहीं माना जा सकता. सरकार के अनुसार, नोटा केवल एक विकल्प या अभिव्यक्ति है, न कि कोई ‘कृत्रिम व्यक्तित्व’ जिसे उम्मीदवार का दर्जा दिया जाए.
शिक्षित और संपन्न लोग करते हैं कम वोटिंग
पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि अक्सर शिक्षित और संपन्न वर्ग के लोग मतदान के लिए कम संख्या में बाहर निकलते हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में मतदान का दिन किसी त्योहार की तरह मनाया जाता है, जहां लोग बड़े उत्साह के साथ अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं.
इस मामले में अंतिम निर्णय आना अभी बाकी है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी एक बार फिर चुनावी सुधारों और मतदान की भागीदारी बढ़ाने की बहस को तेज कर सकती है.
