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स्कूलों में बच्चे क्यों टूट रहे? मेहसाणा से जालना, रीवा और जयपुर तक की घटनाओं ने देश को झकझोरा

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दिल्ली, गुजरात, राजस्थान और मध्यप्रदेश में बच्चों द्वारा खुद की जान लेने के मामले चिंताजनक हैं. जेन-जेड और अल्फा पीढ़ी मानसिक दबाव और अकेलेपन से प्रभावित हैं. स्कूल और अभिभावकों को भावनात्मक, मानसिक और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी. बच्चों को सुनें, समझें और सही मार्गदर्शन दें. एक सहारा उनकी जिंदगी बचा सकता है.

स्कूलों में बच्चों पर कौन सा दबाव? मेहसाणा से जयपुर तक मौतों ने बढ़ाई चिंताछात्रों पर भारी दबाव नजर आ रहा है.

नई दिल्ली. पिछले कुछ दिनों में दिल्‍ली से मध्‍यप्रदेश और राजस्‍थान से गुजरात तक बच्‍चों के खुद की जान लेने की ऐसी खबरें आई, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया. हर माता-पिता और शिक्षक के लिए यह सच बहुत ही चिंताजनक है. जेन Z की आखिरी पीढ़ी हो या फिर जेन अल्फा की शुरुआत जनरेशन, हमारी अगली पीढ़ी मानसिक दबाव और अकेलेपन से कैसे दबी जा रही है, हमें यह समझना होगा. यह घटनाएं हमें सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि बच्चों की भावनात्मक देखभाल कितनी जरूरी है. बेहद छोटी-छोटी बातों पर यह बच्‍चे अपने जीवन को खत्‍म कर रहे हैं, जो सच में चिंता का विषय है.

इन घटनाओं से दहला देश
मेहसाणा जिले के हॉली फैमिली स्कूल में कक्षा 6 के छात्र को क्लास से बाहर बैठाया गया. जिसके बाद उसने स्कूल की दूसरी मंजिल से छलांग लगा दी. घायल छात्र को अस्पताल ले जाया गया जहां पैर में फ्रैक्चर की पुष्टि हुई. महाराष्ट्र के जालना में 13 साल की छात्रा ने स्कूल की तीसरी मंजिल से कूद कर अपनी जान दे दी. जयपुर में 9 साल की छात्रा अमायरा ने चौथी मंजिल से छलांग लगाई, जिसके बाद सीबीएसई ने स्कूल को नोटिस जारी किया. रीवा जिले की कक्षा 11 की छात्रा ने सुसाइड नोट में शिक्षक द्वारा किए गए शारीरिक दंड और मानसिक प्रताड़ना का जिक्र किया. दिल्ली में कक्षा 10 के छात्र ने राजेंद्र प्लेस मेट्रो स्टेशन पर आत्महत्या कर ली, जिसके बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने स्वतः संज्ञान लिया.

भावनात्मक, मानसिक जुड़ाव जरूरी
इन सभी घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि छात्रों पर शैक्षणिक और मानसिक दबाव लगातार उत्पीड़न और सुरक्षा की कमी उनकी जीवन रक्षा में सबसे बड़े खतरे बन सकते हैं. विशेषज्ञ कहते हैं कि जेन-जी और अल्फा पीढ़ी अधिक संवेदनशील, डिजिटल और मानसिक दबाव के प्रति जल्दी प्रभावित होने वाली हैं. इसलिए स्कूलों और अभिभावकों को यह समझना होगा कि केवल पढ़ाई ही नहीं बल्कि बच्चों की भावनात्मक, मानसिक और सामाजिक सुरक्षा भी प्राथमिकता हो. दिल्ली के शिक्षा मंत्री अशिष सूद ने कहा कि उन्हें एक अभिभावक के नाते चिंता है और स्कूलों को CBSE के मानकों के अनुसार बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी. राजस्थान में अभिभावक अमायरा के लिए न्याय की मांग कर रहे हैं और जालना, मेहसाणा और रीवा में भी स्थानीय प्रशासन मामले की जांच कर रहा है.

बच्‍चों के साथ ये कदम जरूर उठाएं
यह समय है कि हम अपनी अगली पीढ़ी की मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाएं. बच्चों को सुनें, उनके डर और परेशानियों को समझें और उन्हें यह भरोसा दें कि कोई भी कठिनाई इतनी बड़ी नहीं है जिसे अकेले झेलना पड़े. याद रखें एक सहारा, एक बातचीत और एक सही मार्गदर्शन किसी बच्चे की ज़िंदगी बचा सकता है.

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Sandeep Gupta

पत्रकारिता में 14 साल से भी लंबे वक्‍त से सक्रिय हूं. साल 2010 में दैनिक भास्‍कर अखबार से करियर की शुरुआत करने के बाद नई दुनिया, दैनिक जागरण और पंजाब केसरी में एक रिपोर्टर के तौर पर काम किया. इस दौरान क्राइम और…और पढ़ें

पत्रकारिता में 14 साल से भी लंबे वक्‍त से सक्रिय हूं. साल 2010 में दैनिक भास्‍कर अखबार से करियर की शुरुआत करने के बाद नई दुनिया, दैनिक जागरण और पंजाब केसरी में एक रिपोर्टर के तौर पर काम किया. इस दौरान क्राइम और… और पढ़ें

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स्कूलों में बच्चों पर कौन सा दबाव? मेहसाणा से जयपुर तक मौतों ने बढ़ाई चिंता

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