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 24 साल पुराने फर्जी वेतन घोटाले में बड़ा फैसला, हाईकोर्ट ने सभी आरोपितों को किया बरी

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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बहुचर्चित फर्जी वेतन आहरण और भ्रष्टाचार के एक पुराने मामले में आज मंगलवार काे अहम फैसला सुनाते हुए सभी आरोपिताें को दोषमुक्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल संदेह के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती और अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में नाकाम रहा।

करीब दो दशक पुराने इस मामले में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए तत्कालीन स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को बरी कर दिया। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि प्रस्तुत साक्ष्य आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय नहीं थे।

यह मामला जगदलपुर के स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा है, जहां वर्ष 1979 से 1985 के बीच कथित तौर पर फर्जी वेतन बिल तैयार कर सरकारी राशि निकालने का आरोप लगाया गया था। इस मामले में करीब 42 हजार रुपए के गबन की बात कही गई थी।

क्या थे आरोप
तत्कालीन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. आर.के. सेन और उनके अधीनस्थ कर्मचारियों पर आरोप था कि उन्होंने तीन सफाई कर्मचारियों जयसिंह, लालमणि और मयाराम के नाम पर फर्जी वेतन बिल बनाकर राशि निकाली। आरोपों में फर्जी हस्ताक्षर और अंगूठे के निशान के इस्तेमाल की बात भी शामिल थी।

ट्रायल कोर्ट ने दी थी सजा
जगदलपुर की विशेष अदालत ने 28 जनवरी 2002 को इस मामले में आरोपियों को दोषी करार देते हुए आईपीसी की विभिन्न धाराओं और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दो-दो साल की सजा और जुर्माना लगाया था।

हाईकोर्ट ने साक्ष्यों को माना कमजोर
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने के लिए ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका।

न तो किसी दस्तावेज की फर्जी होने की पुष्टि के लिए विशेषज्ञ रिपोर्ट दी गई और न ही मूल दस्तावेज अदालत में पेश किए गए। अदालत ने यह भी कहा कि केवल कार्बन कॉपी के आधार पर जालसाजी और धोखाधड़ी जैसे गंभीर आरोप सिद्ध नहीं किए जा सकते।

अधीनस्थ कर्मचारियों को मिली राहत
फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि अधीनस्थ कर्मचारी अपने वरिष्ठ अधिकारी के निर्देशों का पालन कर रहे थे। उनके खिलाफ कोई स्वतंत्र आपराधिक भूमिका या मंशा सिद्ध नहीं हुई, इसलिए उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

साजिश और भ्रष्टाचार के आरोप भी खारिज
अदालत ने कहा कि आपराधिक साजिश सिद्ध करने के लिए ठोस साक्ष्य जरूरी होते हैं, जो इस मामले में अनुपस्थित थे। साथ ही यह भी साबित नहीं हुआ कि आरोपियों ने अपने पद का दुरुपयोग कर कोई व्यक्तिगत लाभ हासिल किया।

गवाहों के बयान से कमजोर पड़ा मामला
मामले में जिन कर्मचारियों के नाम पर वेतन निकाले जाने का आरोप था, उनके बयानों में भी स्पष्टता नहीं थी।

कई गवाहों ने स्वीकार किया कि उन्हें काम के दौरान वेतन मिला था और उन्होंने भुगतान प्राप्त किया था, जिससे अभियोजन का पक्ष और कमजोर हो गया।

 

By uttu

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