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क्या राहुल गांधी से ज्यादा परिपक्व हैं हेमंत सोरेन, किनकी राजनीति अधिक समझदार? सियासी ‘लकीर’ पर छिड़ी बहस

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पटना. झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने हाल ही में न्यूज18 इंडिया के डायमंड स्टेट समिट में केंद्र-राज्य संबंधों पर खुलकर बात की. उन्होंने इशारों में कांग्रेस नेता राहुल गांधी को नसीहत दी कि विदेश में देश की बुराई नहीं करनी चाहिए.ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में दिए अपने एक पुराने बयान का जिक्र करते हुए हेमंत सोने ने कहा कि जैसे बैलगाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए दोनों पहियों का साथ-साथ चलना जरूरी होता है, वैसे ही देश के विकास के लिए केंद्र और राज्य सरकारों का सहयोग अनिवार्य है. हेमंत सोरेन ने कहा कि विदेश में जाकर भारत के अच्छे चीजों पर ही बात करनी चाहिए. बाहर जाकर अपने देश के बारे में गलत कैसे कहेंगे? अगर केंद्र सरकार से कुछ कमी है तो भारत आकर उस पर बात कर लेंगे, वह हमारे देश का मामला है.

विदेश में दिए बयानों पर राजनीति

दरअसल, हेमंत सोरेन का यह बयान उस संदर्भ में अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जब लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी के विदेश दौरों के दौरान दिए गए बयानों पर अक्सर सियासी विवाद खड़ा होता रहा है. भारतीय जनता पार्टी इसे देश की छवि से जोड़ती है, जबकि कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक आलोचना का हिस्सा बताती है. जानकारों की नजर में हेमंत सोरेन का यह कहना कि देश की शिकायत देश के भीतर करनी चाहिए, विपक्षी खेमे के भीतर एक अलग सोच को सामने लाता है. राजनीति के जानकारों की नजर में यह सीधा हमला नहीं है, लेकिन राजनीतिक परिपक्वता के मामले में हेमंत सोरेन द्वारा एक लंबी लकीर जरूर खींचती हुई दिखी है.

केंद्र राज्य संबंधों पर संतुलित रुख

जानकारों की नजर में हेमंत सोरेन का यह बयान उनके राजनीतिक अनुभव और राष्ट्रीय छवि को मजबूत करता दिखता है. वहीं राहुल गांधी के विदेशी दौरों में भारत की आलोचना अक्सर विवाद का कारण बनती रही है. दरअसल, सोरेन ने राजनीति की प्रतिबद्धताओं और जिम्मेवारियों को पढ़ा है और समय के साथ अपनी सोच में बदलाव किया है. वह आदिवासी नेता के रूप में उभरे हैं और झारखंड की विकास योजनाओं पर फोकस करते हैं. उनका बयान केंद्र से सहयोग की मांग करता है, लेकिन वह इसको लेकर आक्रामक नहीं हैं, बल्कि सामंजस्य की बात करते हैं. बीजेपी ने इसे राहुल पर तंज के रूप में देखा और कहा कि हेमंत सोरेन राजधर्म निभा रहे हैं. यह परिपक्वता का संकेत है जहां वह गठबंधन सहयोगी कांग्रेस को भी सलाह देते हैं बिना सीधा हमला किए.

सहयोगी होते हुए भी अलग पहचान

दरअसल, इसकी चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि राहुल गांधी ने कई बार विदेश में भारत की लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था और मोदी सरकार पर सवाल उठाए हैं. कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड में उन्होंने कहा कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है और मीडिया दबाव में है. राहुल गांधी के ऐसे बयानों के कारण बीजेपी उन्हें देशद्रोही बताती है और कहती है कि वह विदेशी मंच पर भारत को बदनाम करते हैं. राहुल गांधी का तर्क है कि वह सच्चाई बोलते हैं और वैश्विक मंच पर भारतीय मुद्दों को उठाना जरूरी है. लेकिन, इससे विपक्षी एकता प्रभावित होती है क्योंकि सहयोगी दल असहज हो जाते हैं. हेमंत सोरेन का बयान इसी असहजता को दर्शाता है. जानकार कहते हैं कि राहुल गांधी की शैली आक्रामक और वैश्विक है, लेकिन घरेलू राजनीति में यह बैकफायर करती है.

परिपक्वता की कसौटी, अनुभव और रणनीति

राहुल गांधी 55 वर्ष के हैं और हेमंत सोरेन 49 साल के. राहुल गांधी लोकसभा लीडर ऑफ अपोजिनशन है और हेमंत सोरेन दो बार से झारखंड के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. उन्होंने जेल से निकलकर 2025 चुनाव जीता और आदिवासी वोट बैंक मजबूत किया. उनका फोकस स्थानीय मुद्दों जैसे जमीन कानून, खनिज संसाधन और गांव विकास पर है. वह केंद्र से लड़ते हैं, लेकिन सहयोग की बात करते हैं. वहीं राहुल 55 साल के होते हुए भी कांग्रेस की कमान संभालने में उनका सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा है. वर्ष 2019 और 2024 चुनाव में हार के बाद उन्होंने भारत जोड़ो यात्रा की जो सफल रही, लेकिन विदेश में दिए गए उनके बयानों से छवि प्रभावित हुई. दूसरी ओर हेमंत सोरेन की परिपक्वता इसमें दिखती है कि वह केंद्र से राज्य के संबंधों की मजबूती पर जोर देते हैं. जबकि, राहुल व्यक्तिगत हमलों से पार्टी को नुकसान पहुंचाते हैं. हेमंत सोरेन का बयान दिखाता है कि वह राष्ट्रीय राजनीति में उभरना चाहते हैं बिना सहयोगियों को नाराज किए.

राजनीतिक प्रभाव और गठबंधन की चुनौतियां

दूसरी ओर हेमंत सोरेन का यह बयान इंडिया गठबंधन के लिए चुनौती है, क्योंकि गठबंधन के भीतर के विरोधाभास को भी प्रकट करता है. बता दें कि झारखंड में जेएमएम और कांग्रेस साथ हैं, लेकिन सोरेन की नसीहत से कांग्रेस में असंतोष हो सकता है. राहुल गांधी के बयानों से बीजेपी को मौका मिलता है कि वह विपक्ष को विभाजित दिखाए. हेमंत सोरेन ने कहा कि सभी पार्टियों की अलग लाइन होती है, लेकिन यह इशारा है कि कांग्रेस की रणनीति गठबंधन को कमजोर कर रही है. जानकारों की दृष्टि में परिपक्व नेता वह है जो स्थानीय और राष्ट्रीय संतुलन बनाए. सोरेन आदिवासी आइकन शिबू सोरेन के बेटे हैं और उन्होंने पिता की विरासत को आगे बढ़ाया. राहुल गांधी नेहरू-गांधी परिवार से हैं, लेकिन निर्णयों में कभी-कभी आवेग दिखता है. हेमंत सोरेन ने दावोस दौरे में निवेश पर फोकस किया जो उनकी परिपक्व छवि को मजबूत करता है.

क्षेत्रीय राजनीति और राष्ट्रीय भूमिका

हेमंत सोरेन खुद को आदिवासी समाज की आवाज बताते हैं और कहते हैं कि राज्य मजबूत होंगे तभी देश मजबूत होगा. उन्होंने जीएसटी और केंद्रीय योजनाओं पर सवाल उठाए लेकिन विदेश में नहीं. यह राष्ट्रीयता का संदेश देता है. राहुल गांधी की यात्राएं वैश्विक हैं, लेकिन घरेलू स्तर पर वे संघर्ष कर रहे हैं. सोरेन की परिपक्वता इसमें दिख रही है है कि वह स्थानीय मुद्दों से राष्ट्रीय बहस बनाते हैं. सोरेन राजनीति को व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक बनाते हैं. राहुल के बयानों में व्यक्तिगत हमले ज्यादा हैं जो परिपक्वता पर सवाल उठाते हैं. दूसरी ओर हेनंत सोरेन ने न तो कांग्रेस की सीधी आलोचना की और न ही अपनी बात दबाई. यही संतुलन उन्हें एक जिम्मेदार क्षेत्रीय नेता की छवि देता है.

परिपक्वता की परिभाषा क्या हो?

क्या हेमंत सोरेन कांग्रेस नेता राहुल गांधी से ज्यादा परिपक्व हैं? जानकार कहते हैं कि मौजूदा संदर्भ में हेमंत सोरेन का बयान संतुलित और रणनीतिक लगता है. सोरेन केंद्र से तालमेल बिठाते हुए और इंडिया गठबंधन को बचाते हुए अपनी बात रखते हैं, जबकि राहुल गांधी के बयान विवाद बढ़ाते हैं. हालांकि, जानकार कहते है कि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि हेमंत सोरेन राहुल गांधी से ज्यादा परिपक्व हैं. लेकिन इतना जरूर है कि विदेश में बयान को लेकर उनका रुख ज्यादा संतुलित और व्यावहारिक नजर आता है.इसके पीछे की वजह यह भी है कि राहुल गांधी की राजनीति राष्ट्रीय स्तर की है और उनका लक्ष्य व्यापक वैचारिक बहस खड़ी करना होता है. वहीं हेमंत सोरेन की राजनीति फिलहाल राज्य केंद्रित है, जिसमें व्यावहारिक संतुलन ज्यादा दिखता है.

By uttu

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