अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर चल रहे तनाव के बीच आज जिनेवा में दूसरे दौर की अहम बातचीत होने जा रही है. इस वार्ता से पहले ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची कूटनीतिक और विशेषज्ञ प्रतिनिधिमंडल के साथ जिनेवा पहुंच चुके हैं. इस बैठक को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जब दोनों देशों के बीच सैन्य और राजनीतिक दबाव लगातार बढ़ता दिख रहा है.
तेहरान के अनुसार यह वार्ता ओमान की मध्यस्थता में अप्रत्यक्ष रूप से आयोजित की जा रही है. वहीं वॉशिंगटन की ओर से संकेत दिए गए हैं कि परमाणु कार्यक्रम के अलावा बैलिस्टिक मिसाइल और क्षेत्रीय सहयोगी समूहों से जुड़े मुद्दे भी चर्चा में शामिल किए जा सकते हैं. अमेरिका की तरफ से मध्य पूर्व दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर वार्ता में हिस्सा लेने पहुंचेंगे. बताया जा रहा है कि वह सुबह 8 बजे तक जिनेवा पहुंचेंगे.
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वार्ता से ठीक पहले ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने रणनीतिक महत्व वाले हॉर्मुज स्ट्रेट में सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है. यह जलमार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब 20 प्रतिशत गुजरने का प्रमुख रास्ता है. ईरानी अधिकारियों का कहना है कि अभ्यास का उद्देश्य संभावित सुरक्षा और सैन्य खतरों से निपटने की तैयारी करना है, जबकि पहले भी तेहरान इस मार्ग को बंद करने की चेतावनी देता रहा है.
दूसरी वार्ता पर क्या है अमेरिकी-ईरानी नेताओं की उम्मीद?
इस बीच अराघची ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी प्रमुख से भी मुलाकात कर तकनीकी मुद्दों पर चर्चा की. उन्होंने कहा कि वे एक न्यायसंगत और संतुलित समझौते के लिए ठोस प्रस्ताव लेकर आए हैं, लेकिन दबाव के आगे झुकना विकल्प नहीं है. दूसरी ओर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने उम्मीद जताई कि बातचीत से समझौते की दिशा में प्रगति हो सकती है.
परमाणु समझौते से ईरान की क्या उम्मीदें?
बातचीत में ईरान के 60 प्रतिशत समृद्ध यूरेनियम के भंडार, प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे प्रमुख रहेंगे. ईरानी उप विदेश मंत्री ने संकेत दिया है कि यदि प्रतिबंध हटाए जाते हैं तो तेहरान कुछ समझौते पर विचार कर सकता है. वहीं इजरायल ने कड़े रुख के साथ यूरेनियम हटाने और संवर्धन क्षमता खत्म करने की मांग दोहराई है.
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इन परिस्थितियों में जिनेवा वार्ता को केवल परमाणु विवाद ही नहीं बल्कि व्यापक क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से भी निर्णायक माना जा रहा है. अब निगाहें इस बात पर हैं कि दोनों पक्ष टकराव के माहौल में कूटनीतिक रास्ता निकाल पाते हैं या नहीं.
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