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26वीं मंजिल तक भी पहुंच गई जहरीली हवा…हाईराइज वाले भी नहीं सुरक्षित, बढ रहा जान का खतरा! – mumbai wadala high rise air pollution study dangerous levels tvism

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मुंबई की ऊंची बिल्डिंग्स में रहने वाले लोगों को अक्सर लगता है कि ऊंची इमारतों, धुंए से दूर वे लोग ऊंचाई पर अच्छी और शुद्ध हवा में सांस ले रहे हैं. लेकिन हाल ही में मुंबई के वडाला इलाके में हुई एक स्टडी ने इस बात को गलत साबित कर दिया है. दरअसल, स्टडी के मुताबिक, वडाला एरिया में हवा की क्वालिटी इतनी खराब हो चुकी है कि 26वीं मंजिल पर रहने वाले लोग भी उतनी ही जहरीली हवा अंदर ले रहे जितने स़ड़क पर चलने वाले और निचले इलाकों में रहने वाले लोग. तो आइए जानते हैं, ये पूरी स्टडी क्या कहती है…

खतरनाक कण हवा में मौजूद

मुंबई इकोलॉजिकल रिसर्च एंड एनालिसिस ग्रुप (एमईआरएजी) द्वारा की गई स्टडी के मुताबिक, वडाला इलाके में ऊंचाई बढ़ने के साथ प्रदूषण का स्तर कम नहीं हो रहा बल्कि वहां की हवा में भी PM2.5 और अन्य हानिकारक कण खतरनाक स्तर पर मौजूद हैं. यह चिंताजनक तो है ही साथ ही साथ उन हजारों परिवारों के लिए खतरे की घंटी है जो साफ हवा के नाम पर ऊंची-ऊंची बिल्डिंगों में रह रहे हैं.

मुंबई के वडाला, भक्ति पार्क और न्यू कफ पैराड जैसे इलाकों में हवा की क्वालिटी जांचने के लिए 8 दिन तक लगातार हाईराइज टावर्स में एयर क्वालिटी की  मॉनिटरिंग की गई. इस दौरान एक टावर की 26वीं और दूसरे की 13वीं मंजिल पर सेंसर्स लगाए गए जो हर 15 मिनट में डेटा रिकॉर्ड कर रहे थे. रिपोर्ट में सामने आया कि यहां पर भी CO, NH3, H2S और पार्टिकुलेट मैटर की मात्रा मानक सीमा से काफी अधिक थी.

कार्बन मोनोऑक्साइड 3 मिलीग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक पहुंची जो तय लिमिट से करीब 50 प्रतिशत अधिक है. अमोनिया 700 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक दर्ज हुआ जबकि मानक रेंज 400 है. 

हाइड्रोजन सल्फाइड की मात्रा लगभग 2 ppm रही जो सीमा से करीब 15 गुना अधिक है. इसके साथ ही PM2.5 और PM10 दोनों लेवल्स लगातार सुरक्षित सीमा से ऊपर बने रहे.

‘क्लीन एयर’ थ्योरी का क्या हुआ?

अक्सर लोग समझते आए थे कि जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती है, गाड़ियों, रोड डस्ट और जमीन से उठने वाले धूल-पार्टिकल्स कम होते जाते हैं. क्लीन एयर थ्योरी कहती थी कि 8वीं से 10वीं मंजिल से ऊपर पार्टिकुलेट मैटर 30 से 40 प्रतिशत तक कम हो सकते हैं इसलिए ऊंची मंजिल पर हवा साफ मानी जाती थी.

लेकिन ये तर्क गैसों और फाइन पार्टिकल्स पर लागू नहीं होते. ऊंची इमारतें कई बार स्ट्रीट कैन्यन इफेक्ट (ऊंची इमारतों के बीच खतरनाक प्रदूषकों का फंसना) बनाती हैं जिससे ये खतरनाक पार्टिकल्स ऊपर की ओर चले जाते हैं. 

सर्दी या रात में जब गर्म हवा की परत ढक्कन की तरह काम करती है तो 16 से 30 वें फ्लोर की ऊंचाई तक जाकर प्रदूषण फंस सकता है यानी टॉप फ्लोर भी कई बार ग्राउंड से ज्यादा टॉक्सिक हो सकता है.

आम लोगों के लिए क्या जोखिम होगा?

स्टडी के आंकड़ों से पता चलता है कि सिर्फ टावर की ऊंची मंजिल पर रहकर आप साफ हवा के संपर्क में नहीं पहुंच जाते. फाइन गैसें और PM2.5 जैसे सूक्ष्म कण हवा के साथ काफी दूर और ऊंचाई तक जा सकते हैं और ऊंची इमारतों के ऊपरी फ्लोर पर भी खतरनाक स्तर पर मौजूद रह सकते हैं.

लंबे समय तक ऐसी हवा के संपर्क में रहने से सांस संबंधी बीमारियां, सिरदर्द, आंखों में जलन, थकान और कार्डियोरेस्पिरेटरी प्रॉब्लम्स का रिस्क बढ़ जाता है. खासकर बच्चों, बुजुर्गों, प्रेग्नेंट महिलाओं और पहले से अस्थमा या हार्ट डिजीज वाले लोगों के लिए ये ज्यादा खतरनाक स्थिति है.

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By uttu

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