गाजा में शांति बहाली के नाम पर अमेरिका और इजरायल ने एक ऐसा प्लान तैयार किया है, जिसने दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया की नींद उड़ा दी है. हाल ही में मिस्र के शर्म अल-शेख में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात हुई. सामने से देखने पर यह एक कूटनीतिक मुलाकात लग रही थी, लेकिन इसके पीछे की जो डील सामने आ रही है, उसे इंडोनेशिया के डिफेंस एक्सपर्ट सीधे तौर पर ‘आग में छलांग लगाने’ या ‘ट्रंप के बिछाए जाल में फंसने’ जैसा बता रहे हैं. आखिर क्या ऐसा हो रहा है, जिसे लेकर इंडोनेशिया परेशान है.
गाजा में युद्ध के बाद हालात संभालने और वहां एक नई व्यवस्था बनाने के लिए एक पीस काउंसिल का गठन किया गया है. यह सीधे तौर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के कंट्रोल में नहीं है, बल्कि इसे अमेरिका और इजरायल का खुला समर्थन प्राप्त है. इस इंटरनेशनल स्टेबिलाइजेशन फोर्स में अपनी सेनाएं भेजने के लिए पांच देशों इंडोनेशिया, कोसोवो, कजाकिस्तान, अल्बानिया और मोरक्को को चुना गया है. दिलचस्प बात है कि इन पांचों में से केवल मोरक्को के पास ही संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में काम करने का अनुभव है. लेकिन, सबसे ज्यादा सैनिक इंडोनेशिया से भेजे जाने की योजना है. इंडोनेशिया का यूएन पीसकीपिंग में पुराना इतिहास रहा है, लेकिन गाजा का यह नया मिशन पूरी तरह से एक अलग और बेहद खतरनाक गेम है.
इंडोनेशियाई सेना के लिए सुसाइड मिशन क्यों?
जो देश इस स्थिरता बल में शामिल होंगे, उन्हें इजरायल और मिस्र के साथ सहयोग करना होगा. इसके अलावा, इस बल को कुछ ऐसे काम सौंपे गए हैं, जो किसी भी मुस्लिम देश की सेना के लिए सीधे तौर पर फिलिस्तीनियों से दुश्मनी मोल लेने वाले हैं.
- हमास को निहत्था करना
यह सबसे बड़ा पेंच है. शांति बल के एजेंडे में सीमा क्षेत्रों को सुरक्षित करने और नागरिकों की मदद करने के अलावा एक प्रमुख शर्त यह भी है कि इस बल को हमास को ‘निहत्था’ करना होगा और उसके सैन्य ढांचे को नष्ट करना होगा. इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ कर दिया था कि जब तक हमास को पूरी तरह से निहत्था नहीं किया जाता, तब तक ‘गाजा पुनर्निर्माण योजना’ एक इंच भी आगे नहीं बढ़ेगी. - सुरंगों का जाल और मौत का कुआं
पडजदजारन विश्वविद्यालय के रक्षा विशेषज्ञ मुरादी ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि हमास को निहत्था करना इंडोनेशियाई सेना के लिए सबसे बड़ा और जानलेवा खतरा है. मुरादी के अनुसार, हथियार छीनने के अलावा सुरंगों को नष्ट करना कोई बच्चों का खेल नहीं है. इससे सीधे तौर पर शहरी युद्ध छिड़ सकता है और हमारी सेना एक खूनी जाल में फंस सकती है. हमास और फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद के लड़ाके इन सुरंगों को इजरायली सेना के खिलाफ अपनी सबसे बड़ी युद्ध रणनीति मानते हैं. जब इंडोनेशियाई सैनिक इन सुरंगों को नष्ट करने जाएंगे, तो क्या हमास उन्हें अपना दुश्मन नहीं मानेगा?
इजरायल की चाल और हमास का निशाना
फरवरी की शुरुआत में इजरायली मीडिया ने खुलासा किया था कि इंडोनेशियाई सैनिकों को दक्षिणी गाजा, विशेष रूप से ‘रफाह’ और ‘खान यूनिस’ के आसपास तैनात किया जाएगा. रफाह वही जगह है जो अक्टूबर 2023 से गाजा के लोगों के लिए लाइफलाइन बनी हुई है, क्योंकि यही मिस्र तक पहुंचने का एकमात्र खुला रास्ता है.
हाई-टेक निगरानी और हमास की सुरंगें
इजरायल के पूर्व जनरल अमीर अवीवी ने जनवरी में खुलासा किया था कि इजरायल रफाह में नागरिकों के लिए कैंप बनाएगा और पुनर्निर्माण परियोजना के तहत बनने वाले घरों में फेशियल रिकग्निशन तकनीक और निगरानी उपकरण लगाएगा. खतरे की बात यह है कि पीस काउंसिल जिस रफाह में इजरायली बलों की मदद से हमास को निहत्था करने का अभियान चलाएगी, वह इलाका हमास की सुरंगों के सबसे जटिल और घने जाल के ठीक ऊपर स्थित है.
एक्सपर्ट क्यों चिंंचित
इंडोनेशिया विश्वविद्यालय में शांति और मानवाधिकार के विशेषज्ञ हेरू सुसेटियो ने गंभीर चेतावनी देते हुए कहा, रफाह हमास के लिए एक हाई सेंसिटिव एरिया है. जब भूमिगत सुरंगों को नष्ट किया जाएगा, तो हमास निश्चित रूप से इंडोनेशियाई सेना को अपना दुश्मन, विरोधी या प्रतिद्वंद्वी समझेगा. ऐसे में हमें काउंटर टेररिज्म अभियानों में उलझना पड़ेगा और इस तरह वे सीधे तौर पर इजरायल-हमास युद्ध का एक पक्ष बन जाएंगे.
खर्च कौन उठाएगा?
बीबीसी उर्दू की रिपोर्ट के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र के ब्लू हेलमेट वाले शांति अभियानों का खर्च यूएन सुरक्षा परिषद उठाती है. एक सैनिक का वेतन लगभग 1410 डॉलर या 2.3 करोड़ इंडोनेशियाई रुपिया होता है. लेकिन पीस काउंसिल का यह नया मिशन यूएन के अधिकार क्षेत्र से बाहर है.
अंतरराष्ट्रीय संबंधों की विशेषज्ञ डेवी फॉर्च्यूना अनवर ने सवाल उठाया कि जब यह मिशन यूएन का है ही नहीं, तो इसका खर्च कौन उठाएगा? विदेश मंत्री सुगियोनो का जवाब था कि खर्च का वहन सरकार और शांति परिषद का समर्थन करने वाले पक्ष संभवतः अमेरिका या अरब देश करेंगे. लेकिन इंडोनेशिया जैसे विकासशील देश के लिए किसी दूसरे के युद्ध में अपनी सेना और पैसा झोंकना एक बहुत बड़ा दांव है.
