उत्तर प्रदेश में सभी राजनीतिक दलों की निगाहें उस 22 फीसदी दलित वोटबैंक पर है, जिसके सहारे बसपा प्रमुख मायावती चार बार मुख्यमंत्री रहीं. दलित समाज में सियासी चेतना जगाने वाले बसपा संस्थापक कांशीराम को सहारे सपा से लेकर कांग्रेस और बीजेपी तक अपने राजनीतिक समीकरण को दुरुस्त करने में जुटी हैं, जिसके चलते मायावती के सामने बसपा की सियासत को बचाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है.
सूबे की बदली हुई सियासत में मायावती को एक के बाद एक चुनावी मात मिलती जा रही है. बसपा का जनाधार भी चुनाव दर चुनाव खिसकता जा रहा और तमाम बड़े नेता पार्टी छोड़ गए हैं. यूपी की राजनीति में बसपा अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है तो मायावती पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गई हैं.
उत्तर प्रदेश में दलित समुदाय के 22 फीसदी वोट बैंक पर विपक्षी दलों की निगाहें लगी हुई हैं. राहुल गांधी ने कांशीराम को ‘भारत रत्न’ देने के लिए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा तो अखिलेश यादव ने कांशीराम की जयंती को पीडीए दिवस के रूप में मनाया. इस तरह बीजेपी, सपा, रालोद, कांग्रेस और चंद्रशेखर आजाद तक दलित समुदाय का दिल जीतने की कोशिश में जुटे हैं. ऐसे में 2027 की चुनाव की डगर अब मायावती के लिए काफी मुश्किलों भरी लगने लगी है.
यूपी में बसपा अर्श से फर्श पर पहुंची
कांशीराम ने 1984 में बसपा की बुनियाद रखी. बसपा अपने गठन के 9 साल में ही सत्ता में भागीदार बन गई. बसपा ने 1993 में सपा के साथ सरकार बनाया और 1995 में मायावती मुख्यमंत्री बन गए. 2007 का चुनाव मायावती के राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि साबित हुआ. उस साल बसपा ने 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी. वोट शेयर क़रीब 30.43 फ़ीसदी तक पहुंच गया था.
2007 में बसपा जीत की असली कुंजी मायावती की सोशल इंजीनियरिंग थी, जिसमें दलितों के साथ मुस्लिम, पिछड़ों और सवर्ण समुदाय को भी साधा था. लेकिन, इसके बाद से बसपा लगातार कमज़ोर हुई है. 2022 के चुनाव में उसने सबसे निराशाजनक प्रदर्शन किया. यूपी में बसपा का आधार गिरकर 13 फीसदी पर पहुंच गया है.
बसपा के पास यूपी में महज एक विधायक है और 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता तक नहीं खुला. इस तरह बसपा का कैडर और सूबे के आवाम के दिल से मायावती दूर होती जा रही है, जिसके चलते बसपा के सामने सियासी चुनौती खड़ी हो गई है. बसपा पर सवाल सिर्फ़ सत्ता से दूर होने का ही नहीं, बल्कि अस्तित्व का भी खड़ा हो गया है.
बसपा के सामने सियासी चुनौतियां
उत्तर प्रदेश की सियासत में बसपा चुनाव दर चुनाव कमज़ोर होती जा रही है, जिसके चलते पार्टी प्रमुख मायावती के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं.पिछले कुछ वर्षों में पार्टी का वोट शेयर कम हुआ है,और कई प्रमुख नेताओं ने पार्टी छोड़ दी है. मायावती की जाटव समाज पर पकड़ पहले की तरह अब नहीं रही, क्योंकि चंद्रशेखऱ आजाद के रूप में नया सियासी प्लेयर मैदान में है. ग़ैर-जाटव दलित वोटबैंक पहले ही बसपा से पूरी तरह दूर हो चुका है.
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मायावती के सामने अपने पारंपरिक दलित वोट बैंक और मुस्लिमों को एकजुट कैसे रख पाएगी. ये सवाल इसलिए क्योंकि विपक्ष बसपा पर बीजेपी की बी-टीम होने के आरोप लगाता रहता है. इसके चलते मुस्लिम समुदाय पहले ही मायावती से छिटका हुआ है इसकी तस्दीक़ एक के बाद एक यूपी में हो रहे चुनाव नतीजे करते हैं और 2024 के चुनाव में दलित वोट भी उनसे दूर हुआ है.
कांशीराम के बहाने जिस तरह से कांग्रेस से लेकर सपा, बीजेपी और चंद्रशेखर आजाद दलित समुदाय के वोटबैंक को साधने में जुटी है, उसके चलते मायावती ने लिए अब बसपा की राजनीतिक को भी बचाए रखने की चुनौती है. दलित समुदाय भी बसपा से बाहर अपनी सियासी संभावनाएं तलाश रहा है. ऐसे में मायावती कैसे 2027 के चुनाव में दलित वोटबैंक को सहेजकर रख पाएंगी, क्योंकि विपक्षी दल उनसे कहीं ज्यादा खुद को दलित हितैशी के रूप में पेश कर रहे हैं.
दलित वोटबैंक दो हिस्सों में बंटा हुआ है
यूपी का 22 फीसदी दलित समाज दो हिस्सों में बंटा है. एक, जाटव जिनकी आबादी करीब 12 फीसदी है और दूसरा 10 फीसदी गैर-जाटव दलित हैं. मायावती जाटव समुदाय से आती हैं. चंद्रशेखर आजाद भी जाटव हैं और मायावती की तरह पश्चिम यूपी से आते हैं. जाटव समुदाय का वोट बसपा का हार्डकोर वोटर माना जाता है, जिसे चंद्रशेखर साधने में जुटे हैं. इस तरह कांशीराम की सियासी विरासत के सहारे दलितों के दिल में जगह बनाने और बसपा की सियासी जमीन को हथियाने का चंद्रशेखर ने प्लान बनाया है.
यूपी में किस किससे निपेटगी मायावती
चंद्रशेखर कांशीराम के बहाने बसपा की सियासी जमीन पर अपना अधिकार जमाने की है. कांशीराम की जयंती को दलित वोटर के बीच पहुंचने का जरिया बनाया है और खासकर पश्चिम यूपी में. दलितों का युवा तबका उनके साथ जुड़ता है तो मायावती के लिए चिंता का सबब बन सकता है.
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अपने पुराने दलित वोट बैंक को फिर से जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है. कांग्रेस ने कांशीराम की जयंती पर जिस तरह से भारत रत्न देने की बात उठाई है, उसके जरिए दलितों के बीच अपनी पैठ मजपूत करने की है, कांग्रेस प्रदेश संगठन मंत्री अनिल यादव कहते हैं कि जिस दिन दलित कांग्रेस के साथ पूरी तरह से आ गया, उसी दिन बीजेपी केंद्र व राज्य की सत्ता से बाहर हो जाएगी.
कांग्रेस दलित वर्ग के लोगों को समझा रही है कि कांग्रेस उनका पुराना घर है और उनकी सियासी हिस्सेदारी सिर्फ कांग्रेस दे सकती है. कांशीराम के एजेंडे, जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी हिस्सेदारी की बात आज राहुल गांधी कर रहे हैं. दलित समुदाय इस बात को भी समझ रहा है कि उनके मुद्दे कौन उठा रहा है और उनके हितों के लिए कौन जमीन पर संघर्ष कर रहा है.
सपा भी अब यादव-मुस्लिम के साथ-साथ दलित और अति पिछड़े वर्ग के जोड़ने के मिशन पर जुटी है. अखिलेश यादव साफ-साफ कहते हैं कि सपा लोहिया के साथ अंबेडकर और कांशीराम के विचारों को लेकर चलेगी.सपा की नजर पूरी तरह से दलित वोटों पर है, जिसके लिए उन्होंने कांशीराम की प्रयोगशाला से निकले हुए तमाम बसपा नेताओं को अपने साथ मिलाया है और उनके जरिए दलितों के विश्वास जीतने की कोशिश कर रहे हैं.
बीजेपी गैर-जाटव दलितों को अपने साथ जोड़ने में काफी हद तक सफल हो चुकी है और अब उसकी नजर जाटव वोटों पर है. बसपा लगातार दलित समुदाय के बीच अपनी पैठ जमाने की कोशिशों में जुटी है. केंद्र और राज्य की योजनाओं के जरिए दलित समुदाय के बीच बीजेपी ने एक बड़ा वोट बैंक तैयार कर लिया है. आरएसएस सामाजिक समरसता के जरिए दलित समुदाय के विश्वास को जीतने की कोशिश में है. इस तरह से मायावती किस किससे निपटेगी और अपना वोट बैंक कैसे बचाएंगी.
बसपा के लिए 2027 की डगर कितनी कठिन
बसपा अपने वोट बैंक को जोड़े रखने की कोशिशों में जुटी है लेकिन गैर-जाटव पूरी तरह से खिसक चुका है और अब जाटव वोटों में भी सेंधमारी शुरू हो गई है. ऐसे में मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को आगे किया है, जो कांशीराम की जंयती पर उत्तर प्रदेश के बजाय राजस्थान में कार्यक्रम को संबोधित किया. मायावती ने कोई बड़ी रैली नहीं किया जबकि उनकी पार्टी के कई छोटे-बड़े कार्यक्रम हुए, लेकिन कांग्रेस और सपा के कांशीराम प्रेम के आगे फीके पड़ गए.
दलित मतों पर विपक्ष की नजर उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता करीब 22 फीसदी हैं. 80 के दशक तक कांग्रेस के साथ दलित मतदाता मजबूती के साथ जुड़ा रहा, लेकिन बसपा के उदय के साथ ही ये वोट उससे छिटकता ही गया. हाल के कुछ वर्षों में दलितों का उत्तर प्रदेश में बीएसपी से मोहभंग होता दिखा है. ऐसे में मायावती अकेले यूपी चुनाव लड़कर क्या करिश्मा कर पाएंगी, जब न उनके साथ दलित समाज पहले की तरह है और न ही अतिपिछड़ा. मुस्लिम समुदाय पहले ही दूर हो चुका है.
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