India Learning From Iran War: ईरान के साथ इजरायल-अमेरिका की जंग के आगोश में दुनिया आ चुकी है. तेल की कीमत आसमान छूने लगी है. भारत ही नहीं तमाम देशों में इसका असर दिखने लगा है. इस जंग में ईरान ने अपनी सटीक रणनीति से अमेरिका जैसे सुपर पावर को बैकफुट पर ला दिया है. अमेरिका के लिए यह जंग काफी महंगी पड़ रही है. ईरान की इस रणनीतिक को दुनिया के तमाम सामरिक मामलों के जानकार बेहद सटीक और नए जमाने का युद्ध कौशल बता रहे हैं. एस-35 और एफ-22 जैसे पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स और आयरन डोम जैसे बेहद ताकतवर डिफेंस सिस्टम से लैस अमेरिका और इजरायल अब बेबस दिख रहे हैं.
ऐसे में सबसे अहम सवाल यह है कि आखिर ईरान की यह रणनीति है क्या? इस सवाल पर आने से पहले थोड़ा भारत की चर्चा कर लेते हैं. इस वक्त भारत को चीन जैसे सुपर पावर और उसके प्रॉक्सी पाकिस्तान से सीधे खतरा है. चीन हर एक मामले में अमेरिका को टक्कर दे रहा है. उसके पास पांचवीं पीढ़ी के दो-दो फाइटर जेट्स और सैकड़ों तरह की मिसाइलें हैं. उसके कई युद्धपोत समंदर में तैर रहे हैं. वह भी दुनिया के कई देशों में अपने सैन्य अड्डे बना रहा है. वह करीब-करीब हर अंतरराष्ट्रीय विवाद या युद्ध वाले क्षेत्र में अमेरिका के खिलाफ खड़ा है. ऐसे में भारत इस खतरे को कभी भी हल्के में नहीं ले सकता. लेकिन, इस सच्चाई को भी स्वीकार करनी होगी कि भारत की इकोनॉमी चीन की तुलना में काफी छोटी है. हम सैन्य साजो-समान और डिफेंस बजट में भी चीन की बराबरी नहीं कर सकते हैं. ऐसे में भारत को भी ईरान की तरह स्मार्ट युद्ध के लिए तैयार रहना होगा. जहां कम खर्च में दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाने की क्षमता विकसित करनी होगी.
ड्रोन और मिसाइल क्षमता
चीन का पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट जे-35. फोटो- रायटर
भारत की कैसी तैयारी
अब भारत में भी इस श्रेणी के ड्रोन बनाने की युद्ध स्तर पर तैयारी चल रही है. ये ड्रोन लंबी दूरी तक वार करते हैं और बेहद सस्ते हैं. डिफेंस से जुड़ी तमाम रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि भारत का निजी सेक्टर इस मैदान में उतर चुका है. कई कंपनियां और स्टार्टअप्स ऐसे स्वदेसी लॉन्ग-रेंज लॉइटनिंग मुनिशन यानी हमला करने के साथ नष्ट हो जाने वाले ड्रोन बनने में जुट गए हैं. इन कंपनियों का मकसद भारतीय सेना की जरूरत पूरा करने के साथ दुनिया में उभरते ड्रोन बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करना है. इनका जोर स्वदेसी जरूरत पूरी करने के साथ निर्यात पर है.
इस रेस में कई कंपनियां शामिल हैं. इसमें प्रमुख नाम- पिनाका रॉकेट सिस्टम बनाने की कंपनी सोलर इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड का है. यह कंपनी बेंगलुरु स्थित सीआईआईआर- नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेटरीज (NAL) के साथ मिलकर 900 से 1000 किमी की रेंज वाले ड्रोन विकसित कर रही है. सोलर इंडस्ट्रीज देश की प्रमुख निजी हथियार निर्माता कंपनी बनकर उभरी है. वह जो ड्रोन बना रही है वह ईरान के शाहेद-136 की क्षमताओं जैसी है. इस ड्रोन में 25 किलो विस्फोटक रखा जा सकता है. ये ड्रोन भारत के एनएवीआईसी सैटेलाइट नेविगेशन नेटवर्क से निर्देशित होंगे. ये ड्रोन युद्ध क्षेत्र में घंटों तक आसमान में मंडराते रह सकते हैं. फिर मौका मिलते ही हमला कर खुद नष्ट हो जाएंगे. इनको बनाने में बहुत कम खर्च आता है. ऐसे में ये झुंड में दुश्मन पर हमले कर सकते हैं जिससे कि दुश्मन का डिफेंस सिस्टम इसे रोकने में परेशान हो जाए.
सोलर इंडस्ट्रीज के साथ कई स्टार्टअप्स इस काम में जुटे हैं. बेंगलुरु की न्यूस्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजीज (NRT) ने हाल ही में सऊदी अरब के वर्ल्ड डिफेंस शो में अपना शेषनाग-150 ड्रोन पेश किया था. यह फिक्स्ड विंग मॉड्यूलर ड्रोन 1000 किमी की रेंज और पांच घंटे की एंड्योरेंस रखता है. इमसें एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस लगा है जो नेटवर्क्ड स्वार्म अटैक्स यानी झुंड में हमले की ताकत देता है. इसके ड्रोन्स आपस में कम्युनिकेट कर सकते हैं. ये रियल टाइम में टास्क बदल सकते हैं. इसी तरह हैदराबाद की वीईएम टेक्नोलॉजीज ने चेजर लॉइटरिंग मुनिशन पेश किया है. यह कंपनी ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम के लिए कई चीजें बनाती है. चेजर को 1000 किमी दूर की चीजों को भेदने के लिए बनाया जा रहा है. इसमें एडवांस इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल टारगेटिंग सिस्टम लगा है जो करीब-करीब 100 फीसदी सटीक हमले की क्षमता रखता है.
इसी तरह नोएडा स्थित आईजी डिफेंस प्रोजेक्ट काल शुरू किया है. यह एक डेल्टा विंग अटैक ड्रोन है जो 1000 किमी की रेंज को तबाह कर सकता है. काल के पास तीन से पांच घंटे का फ्लाइट एंड्योरेंस है. यह दुश्मन क्षेत्र में रडार सिस्टम, लॉजिस्टिक हब जैसी चीजों को तबाह कर सकते हैं. ये सभी प्लेटफॉर्म एक साथ विकसित हो रहे हैं, जो भारत की रक्षा खरीद नीति में व्यापक रणनीतिक बदलाव को दिखा रहे हैं. सरकार इसके लिए प्राइवेट सेक्टर को बढ़ावा दे रही है. इससे टेक्नोलॉजी तेजी से परिवक्व हो रही है और युद्ध के वक्त इनका तेजी से प्रोक्शन किया जा सकेगा. इन ड्रोन्स की लागत पारंपरिक क्रूज मिसाइलों की तुलना में काफी कम है.
कितनी सही है ये रणनीति?
दरअसल, यह बात सबको पता है कि भारत पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट की रेस में पीछे चल रहा है. हमारे पास इस वक्त मुख्य रूप से चौथी पीढ़ी के फाइटर जेट हैं. हमने 4.5+ जेन के 36 राफेल खरीदे हैं. हमारा देसी फाइटर जेट प्रोग्राम तेजस अभी तक पूरी तरह से परिपक्व नहीं है. हम और 114 राफेल खरीदने की योजना पर काम कर रहे हैं. लेकिन, सब कुछ समय पर चलता रहे तो 2030 के आसपास नई डील तहत राफेल की डिलिवरी शुरू होगी. तेजस मार्क-2 की डिलिवरी भी उसी वक्त शुरू होने की उम्मीद है. ये सभी चीजें अभी तक कागजों पर है. लेकिन, दूसरी तरफ चीन की सेना में सैकड़ों की संख्या में फिफ्थ जेन फाइटर जेट शामिल हो चुके हैं. उसने ये फाइटर जेट पाकिस्तान को भी देने की बात कही है. हमारे पर दोहरी चुनौती है. हमारे में फाइजर जेट्स के केवल 30 स्क्वाड्रन बचे हैं.
यानी करीब 600 फाइटर जेट्स हैं वहीं चीन के पास करीब 2000 फाइटर जेट्स हैं. सबसे अहम बात यह है कि फाइटर जेट्स की खरीद और उनकी संख्या बढ़ाना एक जटिल काम है. इसे चंद महीनों में नहीं पूरा किया जा सकता. ऐसे में भारत को साथ में इसके विकल्प पर भी काम करना होगा. इसमें ड्रोन एक बेहद कारगर विकल्प बनकर उभरे हैं. ऑपरेशन सिंदूर में भी भारत ने ड्रोन्स की अहमियत को समझ गया है. पाकिस्तान ने तुर्की मेड सैकड़ों ड्रोन्स भारत पर दागे थे. हालांकि भारत के एयर डिफेंस ने इन सभी ड्रोन्स को मार गिराया था. ऐसे में ईरान जंग और उससे पहले ऑपरेशन सिंदूर के अनुभव को देखते हुए ड्रोन्स तकनीक विकसित करना एक बेहद अहम फैसला है.
