kerala assembly election 2026: केरल की राजनीति इस बार सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि बाप की इज्जत और इलाके के दबदबे को बचाने की लड़ाई बन गई है. तीन बेटे अलग-अलग सीटों पर मैदान में हैं ताकि पिता की बनाई हुई पहचान और क्षेत्रीय ताकत कहीं डूब न जाए. अपू जॉन जोसेफ थोडुपुझा में पिता पी.जे. जोसेफ की 10 बार की जीत वाली विरासत संभाल रहे हैं. जोस के. मणि पाला में पिता के.एम. मणि के पांच दशक के गढ़ को वापस लेने की ठान चुके हैं. अनूप जैकब पिरावोम में पिता टी.एम. जैकब की पुरानी सीट पर चौथी बार कोशिश कर रहे हैं. यानी जिस केरल की राजनीति हमेशा से गठबंधन, समुदाय और स्थानीय मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है. वही इस बार की चुनावी कहानी कुछ अलग है. यहां मुद्दों से ज्यादा चर्चा विरासत की हो रही है. तीन बेटे, तीन सीटें और एक ही मकसद- अपने पिता की बनाई पहचान को बचाना. यह चुनाव अब सिर्फ राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच की लड़ाई जैसा बन गया है. इडुक्की से लेकर पाला और पिरावोम तक, हर सीट पर भावनाएं, दबदबा और इतिहास दांव पर लगा है. इन उम्मीदवारों के लिए यह सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि अपने परिवार के नाम को जिंदा रखने की चुनौती है. ऐसे में सवाल यही है कि क्या जनता विरासत को वोट देगी या बदलाव को चुनेगी. जानते हैं पूरी कहानी.
इडुक्की में अपू जोसेफ की परीक्षा, पिता की विरासत सबसे बड़ी ताकत
इडुक्की की थोडुपुझा सीट पर अपू जोसेफ पहली बार चुनावी मैदान में हैं, लेकिन उनकी पहचान नई नहीं है. उनके पिता पी.जे. जोसेफ इस इलाके में एक बड़ा नाम रहे हैं और कई बार यहां से जीत हासिल कर चुके हैं. अब जब उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बनाई है, तो अपू पर जिम्मेदारी आ गई है. लोगों के बीच उनकी छवि पिता के बेटे की है, लेकिन उन्हें खुद को साबित भी करना है. चुनाव प्रचार के दौरान अपू लगातार अपने पिता के कामों को याद दिला रहे हैं और भरोसा दिला रहे हैं कि वे उसी परंपरा को आगे बढ़ाएंगे. यहां मुकाबला आसान नहीं है, लेकिन विरासत उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी हुई है.
पाला में जोस के. मणि की साख दांव पर, ‘करो या मरो’ वाली लड़ाई
पाला सीट पर जोस के. मणि के लिए यह चुनाव बेहद अहम है. उनके पिता के.एम. मणि ने इस सीट को दशकों तक संभाला और इसे अपना गढ़ बना दिया था. लेकिन पिछले चुनाव में हार के बाद जोस की सियासी पकड़ कमजोर हुई है. इस बार वे पूरी ताकत से मैदान में हैं और इसे ‘करो या मरो’ की लड़ाई माना जा रहा है. जोस लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि पाला उनका घर है और वे यहां की नब्ज समझते हैं. लेकिन सामने मजबूत विपक्ष और बदले हुए समीकरण उनके लिए चुनौती बने हुए हैं.
पिरावोम में अनूप जैकब की जिद, छोटी पार्टी लेकिन बड़ा इरादा
एर्नाकुलम के पिरावोम में अनूप जैकब लगातार अपनी जमीन बचाने की कोशिश में हैं. उनके पिता टी.एम. जैकब इस सीट पर मजबूत पकड़ रखते थे और उनके निधन के बाद यह जिम्मेदारी अनूप के कंधों पर आई. उनकी पार्टी छोटी है और उन्हें सिर्फ एक सीट मिली है, लेकिन उनकी लड़ाई बड़ी है. अनूप के लिए यह चुनाव अस्तित्व की लड़ाई जैसा है. अगर वे जीतते हैं तो उनकी पार्टी का अस्तित्व बना रहेगा, वरना राजनीतिक जमीन खिसक सकती है. यही वजह है कि वे हर वोटर तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं.
बीजेपी की एंट्री से बिगड़ा खेल, ईसाई वोट बैंक में हलचल
इस बार केरल के इन इलाकों में बीजेपी की एंट्री ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है. खासकर पाला सीट पर बीजेपी ने ईसाई उम्मीदवार उतारकर सभी को चौंका दिया है. इससे वोटों का बंटवारा होना तय माना जा रहा है. पहले जहां मुकाबला दो ध्रुवों में होता था, अब तीसरा विकल्प भी सामने है. बीजेपी युवाओं और नए मुद्दों को लेकर प्रचार कर रही है, जिससे पारंपरिक दलों के वोट बैंक में सेंध लग सकती है. इसका सीधा असर इन तीनों बेटों की संभावनाओं पर पड़ सकता है.
ईसाई राजनीति में बदलाव, परंपरा से हटकर सोच रही नई पीढ़ी
मध्य केरल में ईसाई समुदाय की राजनीति अब बदल रही है. पहले जहां लोग परंपरागत रूप से एक ही दल या परिवार के साथ खड़े रहते थे, अब नई पीढ़ी सवाल पूछ रही है. रोजगार, पलायन और बेहतर भविष्य जैसे मुद्दे ज्यादा अहम हो गए हैं. चर्च और राजनीतिक दलों के बीच भी दूरी बढ़ती नजर आ रही है. ऐसे में सिर्फ विरासत के भरोसे चुनाव जीतना आसान नहीं रह गया है. उम्मीदवारों को अब नए मुद्दों पर भी काम करना होगा.
गठबंधन की सियासत में फंसी विरासत, हर कदम पर रणनीति जरूरी
केरल की राजनीति में गठबंधन अहम भूमिका निभाते हैं. इस बार भी अलग-अलग गुट और पार्टियां मिलकर चुनाव लड़ रही हैं. ऐसे में इन तीनों बेटों के लिए सिर्फ अपने इलाके में मजबूत होना ही काफी नहीं है, बल्कि गठबंधन की रणनीति भी अहम है. कौन किसके साथ है, किसका वोट किस ओर जाएगा—ये सभी समीकरण चुनाव को प्रभावित कर रहे हैं. यही वजह है कि हर उम्मीदवार बेहद सोच-समझकर कदम उठा रहा है.
क्या विरासत दिलाएगी जीत या जनता चुनेगी नया चेहरा?
आखिरकार सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन बेटों को उनके पिता की विरासत जीत दिलाएगी या जनता इस बार बदलाव का फैसला करेगी. यह चुनाव सिर्फ तीन सीटों का नहीं, बल्कि केरल की बदलती राजनीति का संकेत भी है. अगर विरासत जीतती है तो पुरानी परंपरा मजबूत होगी, लेकिन अगर हार होती है तो यह नए दौर की शुरुआत मानी जाएगी.
