संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने एक बयान में कहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) इतिहास में अपने नाम को स्वर्ण अक्षरों में दर्ज कराने की इच्छा नहीं रखता, बल्कि पिछले 100 वर्षों के अपने कार्यों का पूरा श्रेय समाज को देना चाहता है। उन्होंने कहा कि आरएसएस का पूरा काम इसके स्वयंसेवकों की कड़ी मेहनत पर आधारित है, न कि किसी की कृपा पर। साथ ही उन्होंने यह भी साफ किया कि संगठन के कार्यों में किसी की कृपा की कमी के कारण भी कभी बाधा नहीं आई।
क्या बोले भागवत?
भागवत नागपुर के रेशिमबाग स्थित डॉ. हेडगेवार स्मृति मंदिर परिसर में आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे। इस दौरान आरएसएस के ‘घोष पथक’ (बैंड दल) के इतिहास पर आधारित पुस्तक ‘राष्ट्र स्वाराधना’ का विमोचन किया गया। उन्होंने कहा कि सभी स्वयंसेवकों ने संघ की विचारधारा के अनुरूप राष्ट्र निर्माण के लिए अपनी पूरी शक्ति समर्पित की है। ‘घोष पथक’ की यात्रा और किताब की तारीफ करते हुए भागवत ने कहा कि यह पुस्तक स्वयंसेवकों के लिए बेहद उपयोगी है, क्योंकि इससे उन्हें यह समझने में मदद मिलेगी कि 1925 में स्थापना के बाद से आरएसएस ने क्या किया है और भविष्य में उसे क्या करना चाहिए।
समाज को दिया संघ की उपलब्धियों का श्रेय
भागवत ने दोहराया कि संघ इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज नहीं कराना चाहता, बल्कि अपने कार्यों का श्रेय पूरे समाज को देना चाहता है। उन्होंने कहा कि संगठन ने अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए पूरे समाज की कार्यशक्ति पर आधारित मार्ग को चुना है।