देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों और जल संसाधनों के बेहतर उपयोग के उद्देश्य से भारत ने सिंधु नदी तंत्र पर जलविद्युत परियोजनाओं के विकास को तेज कर दिया है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत में सिंधु नदी बेसिन की कुल जलविद्युत क्षमता 33,832 मेगावाट से अधिक आंकी गई है, जिसमें से वर्ष 2012 तक लगभग 10,779 मेगावाट क्षमता विकसित की जा चुकी थी. इसके बाद से विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में कई नई परियोजनाओं को गति दी गई है. सिंधु नदी तंत्र में विशेष रूप से पश्चिमी नदियों (चिनाब, झेलम और सिंधु) में लगभग 20,000 मेगावाट पावर जेनरेशन की क्षमता मौजूद है, लेकिन अभी तक इसका एक छोटा हिस्सा (करीब 4,000 मेगावाट) ही विकसित हो पाया है. यही कारण है कि केंद्र सरकार अब इन क्षेत्रों में अधूरी परियोजनाओं को पूरा करने और नई परियोजनाओं को शुरू करने पर जोर दे रही है.
| इंडस रिवर सिस्टम: हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट |
| हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट | बिजली उत्पादन क्षमता |
| बगलिहार पावर प्रोजेक्ट | 900 मेगावाट |
| सलाल पावर प्रोजेक्ट | 690 मेगावाट |
| दुलहस्ती पावर प्रोजेक्ट | 390 मेगावाट |
| पाकल दुल पावर प्रोजेक्ट | 1,000 मेगावाट (निर्माणाधीन) |
| रतले पावर प्रोजेक्ट | 850 मेगावाट (निर्माणाधीन) |
| उरी-I और उरी-II पावर प्रोजेक्ट | प्रत्येक की क्षमता 240 मेगावाट |
| किशनगंगा पावर प्रोजेक्ट | 330 मेगावाट |
ये परियोजनाएं बेहद खास
चेनाब बेसिन को इस दिशा में सबसे अहम माना जा रहा है, जहां 14 गीगावाट से अधिक क्षमता की पहचान की गई है. यहां पाकल दुल (1,000 मेगावाट), रतले (850 मेगावाट), किरो (624 मेगावाट) और क्वार (540 मेगावाट) जैसी परियोजनाएं तेजी से निर्माणाधीन हैं. पाकल दुल परियोजना (जो मरुसुदर नदी पर बन रही है) को राष्ट्रीय महत्व की परियोजना घोषित किया गया है और इसके दिसंबर 2026 तक चालू होने की संभावना है. वहीं, रतले परियोजना को 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है. झेलम बेसिन में उरी-I और उरी-II (प्रत्येक 240 मेगावाट) और किशनगंगा (330 मेगावाट) जैसी परियोजनाएं पहले से चालू हैं. इसके अलावा रावी और ब्यास बेसिन में भी कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं भी चल रही हैं, जिनमें चमेरा (Chamera) श्रृंखला, रंजीत सागर बांध और पोंग बांध प्रमुख हैं. हाल ही में 2024 में शाहपुरकंडी बांध (206 मेगावाट) का निर्माण पूरा हुआ, जिससे पंजाब और जम्मू-कश्मीर में सिंचाई और बिजली उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा.
समझें भारत की रणनीति
- पहलगाम हमले के बाद तनाव चरम पर: 22 अप्रैल 2025 को पाकिस्तान समर्थित आतंकियों द्वारा पहलगाम में पर्यटकों के नरसंहार ने भारत-पाक संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित किया, जिससे दोनों देशों के बीच पहले से जारी तनाव और बढ़ गया.
- भारत का सैन्य और कूटनीतिक जवाब: हमले के जवाब में भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ लॉन्च कर पाकिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों और सैन्य एयरबेस को निशाना बनाया, साथ ही सिंधु जल समझौते को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया.
- सिंधु नदी तंत्र पर फोकस बढ़ा: समझौते के प्रभावी न रहने के बीच भारत ने सिंधु नदी प्रणाली पर लंबित जलविद्युत परियोजनाओं को तेज कर दिया है. अनुमान के अनुसार, इस तंत्र से करीब 33,800 से 34,000 मेगावाट बिजली उत्पादन संभव है.
- पश्चिमी नदियों में बड़ी संभावनाएं: चिनाब, झेलम और सिंधु जैसी पश्चिमी नदियों में लगभग 20,000 मेगावाट क्षमता मौजूद है, लेकिन अभी तक केवल करीब 4,000 मेगावाट ही विकसित हो पाया है. सरकार अब अधूरी परियोजनाओं को तेजी से पूरा करने पर जोर दे रही है.
- ऊर्जा आत्मनिर्भरता और रणनीतिक बढ़त: खाड़ी देशों पर निर्भरता और होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधाओं के बीच भारत हाइड्रो प्रोजेक्ट्स के जरिए ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करना चाहता है. विशेषज्ञों के अनुसार, इंडस बेसिन में कुल क्षमता 60 गीगावाट तक हो सकती है, जो देश को दीर्घकाल में ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर ले जा सकती है.
भाखड़ा नांगल और नाथपा झाकरी पावर प्रोजेक्ट
सतलुज नदी पर स्थित भाखड़ा-नंगल परियोजना और नाथपा झाकरी (1,500 मेगावाट) जैसे बड़े प्रोजेक्ट भारत के जलविद्युत ढांचे की रीढ़ माने जाते हैं. इसके अलावा लद्दाख क्षेत्र में भी निमू-बाजगो और चुटक जैसी परियोजनाएं स्थानीय ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर रही हैं. सिंधु जल संधि (1960) के तहत भारत को पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास और सतलुज) पर पूर्ण अधिकार प्राप्त हैं, जबकि पश्चिमी नदियों पर केवल ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ परियोजनाएं विकसित करने की अनुमति है. हालांकि, हाल के वर्षों में भारत ने इस संधि को लेकर अपने रुख में बदलाव किया है और इसे ‘अप्रभावी’ मानते हुए पश्चिमी नदियों पर भी अधिक सक्रियता दिखाई है.
ईरान जंग की वजह से एनर्जी कॉरिडोर के नाम से विख्यात होर्मुज स्ट्रेट से तेल और गैस की आपूर्ति काफी प्रभावित हुई है. ऐसे में नए पावर प्रोजेक्ट्स के निर्माण के दूरगामी प्रभाव होंगे. (फाइल फोटो/Reuters)
एक और बड़ी वजह
रणनीतिक दृष्टि से भी ये परियोजनाएं महत्वपूर्ण हैं. सरकार का लक्ष्य न केवल ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना है, बल्कि जल भंडारण क्षमता को भी बढ़ाना है, जिससे बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई और क्षेत्रीय विकास को बल मिल सके. साथ ही नई परियोजनाओं में आधुनिक तकनीकों के जरिए सिल्ट (गाद) प्रबंधन पर भी ध्यान दिया जा रहा है, जो पहले की परियोजनाओं में एक बड़ी चुनौती रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि इंडस बेसिन में कुल संभावित क्षमता 60 गीगावाट तक हो सकती है, जिसका बड़ा हिस्सा अभी भी बिना इस्तेमाल की है. ऐसे में यदि मौजूदा परियोजनाएं समय पर पूरी होती हैं और नई योजनाएं तेजी से लागू की जाती हैं, तो भारत आने वाले वर्षों में जलविद्युत उत्पादन में बड़ी छलांग लगा सकता है. इस नदी तंत्र पर भारत का बढ़ता निवेश और परियोजनाओं की रफ्तार यह संकेत देती है कि देश ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक मजबूत कदम आगे बढ़ा रहा है.
सिंधु नदी तंत्र में भारत की जलविद्युत क्षमता कितनी है?
आंकड़ों के अनुसार, सिंधु नदी तंत्र में भारत की कुल जलविद्युत क्षमता 33,832 मेगावाट से अधिक है, जबकि अब तक केवल लगभग 10,779 मेगावाट ही विकसित हो पाई है. पश्चिमी नदियों (चिनाब, झेलम, सिंधु) में करीब 20,000 मेगावाट की क्षमता मौजूद है, लेकिन इसका सीमित उपयोग हुआ है.
कौन-कौन सी प्रमुख जलविद्युत परियोजनाएं निर्माणाधीन या संचालित हैं?
चेनाब बेसिन में पाकल दुल (1000 मेगावाट), रतले (850 मेगावाट), किरो (624 मेगावाट) और क्वार (540 मेगावाट) जैसी परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं. वहीं उरी-I, उरी-II और किशनगंगा परियोजनाएं पहले से चालू हैं. इसके अलावा भाखड़ा-नंगल, नाथपा झाकरी और हाल ही में पूरा हुआ शाहपुरकंडी बांध भी अहम हैं.
इन परियोजनाओं का भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक महत्व क्या है?
ये परियोजनाएं न सिर्फ ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने में मदद करेंगी, बल्कि जल भंडारण, बाढ़ नियंत्रण और सिंचाई में भी अहम भूमिका निभाएंगी. विशेषज्ञों के अनुसार, इंडस बेसिन में कुल संभावित क्षमता 60 गीगावाट तक हो सकती है, जिससे भारत भविष्य में ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ी छलांग लगा सकता है.
पहलगाम हमले के बाद भारत ने क्या बड़ा कदम उठाया?
22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों द्वारा पर्यटकों के नरसंहार के बाद भारत ने सख्त जवाब देते हुए ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च किया. इस अभियान के तहत पाकिस्तान में मौजूद कई आतंकी ठिकानों और सैन्य एयरबेस को निशाना बनाकर नष्ट किया गया.
इस घटना का भारत-पाकिस्तान संबंधों पर क्या असर पड़ा?
इस हमले के बाद दोनों देशों के बीच पहले से तनावपूर्ण रिश्ते और अधिक बिगड़ गए. भारत ने कड़े रुख के तहत सिंधु जल संधि को भी ठंडे बस्ते में डालते हुए अपने जल संसाधनों के उपयोग की दिशा में नए कदम उठाने शुरू किए.
