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Who was the first Indian to reach the US Parliament? | अमरीकी संसद पहुंचने वाला पहला भारतीय कौन था, जिसने गोरों के देश में रचा इतिहास?

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अमरीकी संसद पहुंचने वाला पहला भारतीय कौन था, जिसने गोरों के देश में रचा इतिहास

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आज हम आपको India First सीरीज के तहत उस शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं, जो अमेरिकी संसद में पहुंचने वाले पहले भारतीय बने. उन्होंने इस इतिहास को उस दौर में रचा, जब अमेरिका में नस्लवादी कानून प्रभावी थे. अमेरिकी कांग्रेस का चुनाव जीतने वाले वे पहले एशियाई, पहले भारतीय और पहले सिख बने.

अमरीकी संसद पहुंचने वाला पहला भारतीय कौन था, जिसने गोरों के देश में रचा इतिहासZoom

काफी संघर्ष के बाद दलीप सिंह सौन्द ने इस सफर को तय किया था.

इतिहास गवाह है कि जब-जब संघर्ष की आंच तेज होती है, तब-तब महान व्यक्तित्व निखरकर सामने आते हैं. बात जब अमरीकी राजनीति की हो और वहां भारतीय मूल के दबदबे का जिक्र आए, तो आज हमें कमला हैरिस या राजा कृष्णमूर्ति जैसे नाम याद आते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि वह कौन सा भारतीय था, जिसने ‘गोरों’ के वर्चस्व वाले उस दौर में अमरीकी संसद की सीढ़ियां चढ़ी थीं, जब वहां भारतीयों को जमीन खरीदने तक का हक नहीं था? बहुत कम लोगों को इस बारे में जानकारी होगी. ऐसे में आज हम आपको India First सीरीज के तहत उस पहले भारतीय शख्स के बारे में बताएंगे, जिन्होंने न केवल अमरीकी संसद (US Congress) में कदम रखा, बल्कि पूरी दुनिया को यह दिखा दिया कि भारतीय मेधा और हौसले के आगे कोई भी दीवार बड़ी नहीं है. उस शख्स का नाम दलीप सिंह सौंद है, जिन्होंने साल 1956 में कैलिफोर्निया से चुनाव जीतकर अमेरिकी संसद में पहुंचने वाले वो पहले भारतीय और एशियाई व्यक्ति बने थे.

दलीप सिंह सौंद का जन्म 20 सितंबर 1899 को पंजाब के अमृतसर जिले के एक छोटे से गांव छज्जलवडी में हुआ था. उनके पिता एक साधारण किसान थे, लेकिन वे शिक्षा के महत्व को समझते थे. दलीप ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर के बोर्डिंग स्कूल से पूरी की और बाद में पंजाब विश्वविद्यालय से गणित में स्नातक की डिग्री ली. उस समय भारत पर अंग्रेजों का राज था और दलीप महात्मा गांधी के विचारों से काफी प्रभावित थे. लेकिन इसके बावजूद 1920 में वह अपनी आगे की पढ़ाई के लिए अमरीका चले गए. उन्होंने बर्कले स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में दाखिला लिया. दिलचस्प बात यह है कि वह वहां फूड प्रिजर्वेशन (खाद्य संरक्षण) सीखने गए थे, ताकि भारत लौटकर डिब्बाबंद भोजन का व्यवसाय शुरू कर सकें, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. बर्कले में रहते हुए उन्होंने अपना विषय बदला और गणित में मास्टर और फिर 1924 में PhD की डिग्री हासिल की. उस समय एक भारतीय के लिए अमरीका में PhD करना बहुत बड़ी बात थी, लेकिन असली संघर्ष अभी बाकी था.

खेती से संसद तक: कांटों भरा सफर
बर्कले से गणित में मास्टर और पीएचडी की डिग्री हासिल करने के बाद भी दलीप के लिए राह आसान नहीं थी. उस समय अमरीका में नस्लवादी कानून प्रभावी थे, जिसके कारण एक भारतीय होने के नाते उन्हें कोई सम्मानित नौकरी नहीं मिल रही थी. लेकिन दलीप ने हार नहीं मानी और कैलिफोर्निया की इंपीरियल वैली में खेती शुरू की. एक शिक्षित गणितज्ञ होने के बावजूद उन्होंने कड़कड़ाती धूप में पसीना बहाया और देखते ही देखते एक सफल किसान और व्यवसायी बन गए. इसी दौरान उन्होंने एक अमरीकी महिला मैरियन फ्रीजिल से शादी की. लेकिन एक अजीब कानून के कारण उनकी पत्नी को भी अपनी अमरीकी नागरिकता खोनी पड़ी, क्योंकि उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति से शादी की थी जो नागरिक बनने के योग्य नहीं था. उस दौरान दलीप ने महसूस किया कि बिना राजनीतिक शक्ति के वे अपने समुदाय के लिए कुछ नहीं कर पाएंगे.

नागरिकता की लड़ाई और ऐतिहासिक कानून
दलीप ने महसूस किया कि बिना नागरिकता के भारतीयों की स्थिति अमरीका में गुलामों जैसी रहेगी. उन्होंने इंडिया एसोसिएशन ऑफ अमेरिका का गठन किया और वाशिंगटन में पैरवी शुरू की. उनकी मेहनत रंग लाई और 1946 में तत्कालीन राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने लूस-सेलर एक्ट पर हस्ताक्षर किए. इस कानून ने भारतीयों को अमरीकी नागरिकता पाने का अधिकार दिया. दलीप सिंह सौंद खुद 1949 में अमरीकी नागरिक बने. नागरिक बनते ही उन्होंने राजनीति में कदम रखा और 1952 में जस्टिस ऑफ द पीस (एक स्थानीय जज का पद) का चुनाव जीता, लेकिन तकनीकी कारणों से उन्हें शुरू में पद संभालने से रोका गया, पर वे फिर से जीते और जज बने. लेकिन असली धमाका 1956 में हुआ.

जब रचा गया सबसे बड़ा इतिहास
जस्टिस ऑफ द पीस का चुनाव जीतने के बाद दलीप ने कैलिफोर्निया के 29वें जिले से हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (House of Representatives) के लिए इलेक्शन लड़ने का फैसला किया. उनके खिलाफ रिपब्लिकन पार्टी की एक बहुत ही प्रसिद्ध महिला उम्मीदवार जैकलिन कोचरन खड़ी थीं, जो एक मशहूर पायलट थीं और उनके पास अकूत संपत्ति थी. चुनाव प्रचार के दौरान दलीप पर नस्लभेदी टिप्पणियां की गईं, उन्हें विदेशी कहा गया. लेकिन दलीप ने हार नहीं मानी. उन्होंने घर-घर जाकर प्रचार किया और लोगों से कहा, ‘मुझे मेरे चेहरे के रंग से नहीं, बल्कि मेरी योग्यता से आंकिए.’ जब चुनाव के नतीजे आए, तो पूरी दुनिया दंग रह गई. दलीप सिंह सौंद ने जीत हासिल की और अमरीकी संसद में पहुंचने वाले पहले भारतीय, पहले सिख और पहले एशियाई बन गए.

विरासत जो आज भी जिंदा है!
दलीप सिंह सौंद ने लगातार तीन बार (1956, 1958 और 1960) चुनाव जीता. संसद में रहते हुए उन्होंने नागरिक अधिकारों (Civil Rights) और किसानों के मुद्दों पर जमकर आवाज उठाई. वे विदेशी मामलों की समिति के सदस्य भी रहे और शीत युद्ध के दौरान अमरीका की लोकतांत्रिक छवि को पूरी दुनिया में पेश किया. लेकिन 1962 में चौथे चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें एक गंभीर ब्रेन स्ट्रोक आया, जिसके बाद वे आंशिक रूप से लकवाग्रस्त हो गए. 22 अप्रैल 1973 को इस महान शख्स ने दुनिया को अलविदा कह दिया. लेकिन वे एक ऐसा रास्ता बना गए थे, जिस पर आज हजारों भारतीय-अमरीकी चल रहे हैं. वे उस विश्वास के प्रतीक हैं कि अमरीका किसी एक नस्ल या विरासत से परिभाषित नहीं होता, बल्कि यह उन लोगों का देश है जो मेहनत और ईमानदारी से बदलाव लाने का साहस रखते हैं.

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Niranjan Dubey

न्यूज़18 हिंदी (Network 18) डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर के तौर कार्यरत. इंटरनेशनल, वेब स्टोरी, ऑफबीट, रिजनल सिनेमा के इंचार्ज. डेढ़ दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय. नेटवर्क 18 के अलावा टाइम्स ग्रुप, …और पढ़ें

By uttu

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