नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण) में संशोधन का बिल संसद की दहलीज नहीं लांघ पाया, क्योंकि विपक्ष ने सरकार का साथ नहीं दिया और दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर निराशा जताई. देश के नाम संबोधन में पीएम मोदी ने कहा, मैं जानता हूं कि आज मेरे देश की माताएं, बहनें, बेटियां… आप सभी दुखी हैं. मैं भी आपके इस दुख में दुखी हूं. लेकिन हमारा प्रयास रुकेगा नहीं, हमारा प्रयास थमेगा नहीं, हमारा आत्मबल अजेय है. हमारे पास आगे भी और मौके आएंगे… बिल पास कराने के लिए जरूरी 66 परसेंट वोट हमें नहीं मिला हो, लेकिन मैं जानता हूं, देश की 100 परसेंट नारीशक्ति का आशीर्वाद हमारे साथ है. इसके साथ ही पीएम मोदी ने साफ कर दिया कि बीजेपी इस मुद्दे को छोड़ने वाली नहीं है. तो सरकार के पास विकल्प क्या हैं? अक्सर लोग कहते हैं कि सरकार अध्यादेश ले आए या फिर किसी एक राज्य में लागू कर दे. लेकिन ये इतना भी आसान नहीं है.
जब भी कोई बड़ा बिल अटकता है, तो हम सोचते हैं कि सरकार अध्यादेश लेकर आ जाएगी. कानून लागू कर देगी. लेकिन इस मामले में यह संभव नहीं. दूसरा, ये भी नहीं हो सकता कि सरकार किसी राज्य में लागू कर दे और फिर सेंटर में… ये भी संभव नहीं.. तो आगे का रास्ता क्या है, जिसकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बात कर रहे हैं.
अध्यादेश क्यों नहीं लाया जा सकता?
नारी वंदन अधिनियम एक सामान्य कानून नहीं, बल्कि संविधान संशोधन है. ऐसे संशोधन अनुच्छेद 368 के तहत आते हैं, जिनके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत जरूरी होता है. अध्यादेश का रास्ता केवल साधारण कानूनों के लिए होता है, संविधान बदलने के लिए नहीं. इसलिए सरकार चाहे भी तो इस बिल को अध्यादेश के जरिए लागू नहीं कर सकती. इसलिए अध्यादेश वाला दरवाजा तो पूरी तरह से बंद है.
डीलिमिटेशन का पेच क्या है?
महिला आरक्षण लागू करने का सबसे बड़ा तकनीकी आधार डीलिमिटेशन है. जब 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करनी होंगी, तो पहले यह तय करना पड़ेगा कि कौन सी सीटें आरक्षित होंगी. यह प्रक्रिया जनगणना के नए आंकड़ों के बाद ही होती है, ताकि जनसंख्या के हिसाब से सीटों का संतुलन बना रहे. बिना डीलिमिटेशन के सीधे आरक्षण लागू करने से प्रतिनिधित्व असंतुलित हो सकता है. इसी वजह से बिल में पहले जनगणना, फिर डिलिमिटेशन और उसके बाद आरक्षण लागू करने की शर्त जोड़ी गई थी.
राज्यवार लागू करने में क्या मुश्किल?
तो क्या सरकार ऐसा कर सकती है कि जिन राज्यों में बीजेपी की सरकार है, जैसे यूपी, एमपी, गुजरात, वहां विधानसभाओं में इसे लागू कर दे? इसका जवाब है- नहीं. लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों का बंटवारा और आरक्षण परिसीमन यानी डीलिमिटेशन के दायरे में आता है. चुनाव आयोग और परिसीमन आयोग सीधे केंद्र के विषय हैं. संविधान के अनुच्छेद 327 के तहत चुनाव और सीटों के आरक्षण से जुड़े नियम संसद ही तय कर सकती है. कोई भी राज्य सरकार अपने दम पर अपनी विधानसभा में महिलाओं के लिए 33% सीटें फिक्स नहीं कर सकती, क्योंकि इसका सीधा टकराव केंद्रीय कानूनों और संविधान के ढांचे से होगा.
जॉइंट सेशन का जुगाड़ भी फेल क्यों?
एक और तरीका होता है जॉइंट सेशन का. जब लोकसभा और राज्यसभा में किसी बिल पर ठन जाती है, तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 108 के तहत दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुला सकते हैं. चूंकि लोकसभा में सांसदों की संख्या ज्यादा है, इसलिए वहां बिल पास कराना सरकार के लिए आसान हो जाता है. लेकिन, संविधान निर्माताओं ने यहां भी एक ब्रेक लगा रखा है. संविधान संशोधन बिल पर कभी भी जॉइंट सेशन नहीं बुलाया जा सकता. इसे दोनों सदनों से अलग-अलग पास कराना ही होगा.
बीजेपी के पास क्या हैं विकल्प?
सलेक्ट कमेटी के पास भेज दिया जाए
सरकार चाहे तो बिल को नए सिरे से सलेक्ट कमेटी को भेज दे. यह समिति बिल के विवादित पहलुओं जैसे OBC महिलाओं का अलग कोटा, लागू करने की समयसीमा या डीलिमिटेशन की शर्त पर विस्तार से विचार करती है. इससे राजनीतिक सहमति बनाने में मदद मिल सकती है और विपक्ष की आपत्तियां कम हो सकती हैं. लेकिन इसका एक नुकसान भी है कि प्रक्रिया लंबी हो जाती है और तुरंत कानून बनाना संभव नहीं रहता. इसलिए यह रास्ता राजनीतिक रूप से सुरक्षित, लेकिन समय लेने वाला माना जाता है.
छोटा सा संशोधन और सारा टंटा खत्म
सबसे मास्टर स्ट्रोक होगा उम्मीदवारों का आरक्षण. इसके लिए सरकार को संविधान संशोधन की जरूरत ही नहीं है. सरकार ‘जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951’में बदलाव कर सकती है. इसके तहत चुनाव आयोग में राजनीतिक दलों के रजिस्ट्रेशन के नियमों में एक नई शर्त जोड़ी जा सकती है. जो भी राजनीतिक दल लोकसभा या विधानसभा चुनाव लड़ेगा, उसे अपने कुल टिकटों में से कम से कम 33% टिकट महिलाओं को देने ही होंगे. ऐसा न करने पर पार्टी का चुनाव चिह्न जब्त हो जाएगा या रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया जाएगा. यह एक सामान्य कानून है. इसमें बदलाव के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत नहीं होती. इसे सिंपल मेजोरिटी से पास किया जा सकता है, जो एनडीए के पास आसानी से उपलब्ध है.
आज भारत का हर नागरिक देख रहा है कि कैसे भारत की नारी शक्ति की उड़ान को रोक दिया गया।
उनके सपनों को बेरहमी से कुचल दिया गया। हमारे भरसक प्रयास के बावजूद हम सफल नहीं हो पाए।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन नहीं हो पाया।
मैं इसके लिए सभी माताओं-बहनों से क्षमाप्रार्थी हूं।… pic.twitter.com/iB3SLHejqS
