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Himalyan Snow Crisis | Ganga water crisis: गंगा-सिंधु का सूख जाएगा पानी? हिमालय में बर्फ का ‘अकाल’, ICIMOD ने जारी किया 200 करोड़ लोगों का ‘डेथ वारंट’

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नई दिल्ली: गंगा और सिंधु जैसी नदियां, जिन्हें हम सदियों से जीवनदायिनी मानते आए हैं, क्या सच में सूखने की कगार पर पहुंच रही हैं? यह सवाल अब सिर्फ डर नहीं बल्कि वैज्ञानिक चेतावनी बन चुका है. हिमालय में बर्फ का अकाल एक ऐसी हकीकत बनता जा रहा है जो आने वाले समय में एशिया की सबसे बड़ी जल आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है. ग्लोबल वार्मिंग का असर अब केवल तापमान तक सीमित नहीं रह गया है यह हमारे पानी के स्रोतों पर सीधा हमला कर रहा है. जिस हिमालय को हम वाटर टावर ऑफ एशिया कहते हैं, वही अब धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है. यह स्थिति केवल पर्यावरणीय संकट नहीं है यह सामाजिक और आर्थिक आपदा का संकेत है. अगर बर्फ ऐसे ही कम होती रही तो आने वाले सालों में करोड़ों लोगों को पीने के पानी, खेती और बिजली के लिए गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है.

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की 2026 की रिपोर्ट ने इस खतरे को और स्पष्ट कर दिया है. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में बर्फ टिके रहने की अवधि सामान्य से 27.8% कम हो गई है. यह पिछले 20 सालों में सबसे निचला स्तर है. लगातार चौथे साल बर्फ में गिरावट ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है. क्योंकि इसका सीधा असर गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र और मेकांग जैसी नदियों पर पड़ने वाला है.

स्नो पर्सिस्टेंस यानी बर्फ के जमीन पर टिके रहने का समय. (फोटो AI)

200 करोड़ लोगों की जल सुरक्षा खतरे में

  • हिमालयी क्षेत्र में बर्फ की कमी का असर अब साफ दिखने लगा है. ICIMOD की रिपोर्ट के अनुसार 12 में से 10 प्रमुख नदी घाटियों में बर्फ सामान्य से कम दर्ज की गई है. मेकांग बेसिन में सबसे ज्यादा 59.5% की गिरावट आई है, जबकि तिब्बती पठार में 47.4% की कमी दर्ज की गई है. यह आंकड़े बताते हैं कि समस्या केवल एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे एशिया को प्रभावित कर सकती है.
  • विशेषज्ञों का कहना है कि गर्मियों के शुरुआती महीनों में जब बारिश कम होती है, तब नदियों का पानी मुख्य रूप से बर्फ के पिघलने पर निर्भर करता है. लेकिन अब जब बर्फ ही कम पड़ रही है, तो नदियों का प्रवाह भी प्रभावित होगा. सिंधु और हेलमंद जैसी नदियों में करीब 18% तक की गिरावट दर्ज की गई है, जो आने वाले समय में जल संकट को और गहरा कर सकती है.

क्यों खतरनाक है ‘स्नो पर्सिस्टेंस’ में गिरावट

स्नो पर्सिस्टेंस यानी बर्फ के जमीन पर टिके रहने का समय, जल चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. जब बर्फ लंबे समय तक रहती है, तो धीरे-धीरे पिघलकर नदियों को पानी देती है. लेकिन अगर यह जल्दी पिघल जाए या बने ही कम, तो पानी का संतुलन बिगड़ जाता है. इससे अचानक बाढ़ और फिर लंबे समय तक सूखे की स्थिति बन सकती है.

हिमालयी क्षेत्र में बर्फ की कमी का असर अब साफ दिखने लगा है. (फाइल फोटो AP)

गंगा-सिंधु पर क्या होगा असर?

गंगा और सिंधु जैसी नदियां करोड़ों लोगों की जीवनरेखा हैं. भारत, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों की बड़ी आबादी इन पर निर्भर है. अगर बर्फ की कमी जारी रही तो इन नदियों का जलस्तर घट सकता है. इससे खेती, पेयजल और बिजली उत्पादन पर गहरा असर पड़ेगा.

समाधान क्या है?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट से निपटने के लिए जल संरक्षण, बेहतर जल प्रबंधन और कार्बन उत्सर्जन को कम करना बेहद जरूरी है. साथ ही, सरकारों को दीर्घकालिक योजनाएं बनानी होंगी ताकि भविष्य में जल संकट से बचा जा सके.

हिमालय में बर्फ कम होने की सबसे बड़ी वजह क्या है?

सबसे बड़ी वजह ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन है. तापमान बढ़ने से बर्फ जल्दी पिघलती है और नई बर्फबारी भी कम हो रही है. इससे पूरे क्षेत्र का जल संतुलन बिगड़ रहा है.

क्या इसका असर भारत में तुरंत दिखेगा?

कुछ असर अभी से दिखने लगा है, लेकिन बड़ा प्रभाव आने वाले वर्षों में देखने को मिलेगा. खासकर गर्मियों में पानी की कमी और सूखे की स्थिति ज्यादा गंभीर हो सकती है.

क्या इस संकट को रोका जा सकता है?

पूरी तरह रोकना मुश्किल है, लेकिन प्रभाव को कम किया जा सकता है. इसके लिए जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और ग्लोबल स्तर पर कार्बन उत्सर्जन कम करना जरूरी होगा.

By uttu

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