चेन्नई: तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय तक द्रविड़ मुनेत्र कज़गम (DMK) और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कज़गम (AIADMK) के इर्द-गिर्द घूमती रही. लेकिन अब राज्य की सत्ता का गणित बदल रहा है. इस बदले हुए समीकरण के केंद्र में है विदुथलाई चिरुथइगल काची यानी VCK. इसे तमिलनाडु की ‘बसपा’ कहा जाता है, क्योंकि यह पार्टी दलित राजनीति को सिर्फ नारों तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे सत्ता के केंद्र तक पहुंचाने की ताकत भी रखती है. थोल. थिरुमावलवन के नेतृत्व में VCK ने सड़क से लेकर संसद तक संघर्ष किया और अब वही पार्टी अभिनेता थलापति विजय की तमिलगा वेत्री कज़गम (TVK) सरकार बनाने में सबसे अहम कड़ी बन गई है. राजनीति में अक्सर सीटों से ज्यादा मायने समर्थन का होता है और VCK इस वक्त उसी ताकत का दूसरा नाम बन चुकी है. तमिलनाडु में यह संदेश साफ है कि अब दलित राजनीति सिर्फ वोट ट्रांसफर की मशीन नहीं, बल्कि सत्ता तय करने वाली ताकत बन चुकी है. विजय की लोकप्रियता अपनी जगह है, लेकिन सत्ता का सिंहासन VCK के समर्थन के बिना अधूरा दिखाई दे रहा है.
VCK की कहानी संघर्ष विचारधारा और संगठन की कहानी है. यह पार्टी अचानक पैदा नहीं हुई. इसके पीछे दशकों की सामाजिक लड़ाई, जातिगत हिंसा के खिलाफ आंदोलन और दलित अस्मिता का सवाल जुड़ा है. महाराष्ट्र के दलित पैंथर्स आंदोलन से प्रेरित होकर बनी यह पार्टी तमिलनाडु में दलितों की आवाज बन गई. थिरुमावलवन ने इसे सिर्फ राजनीतिक दल नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलन की तरह खड़ा किया. यही वजह है कि VCK की पकड़ केवल चुनावी सीटों तक सीमित नहीं है. गांवों, छात्र संगठनों और सामाजिक आंदोलनों में भी इसका असर दिखता है. आज जब थलापति विजय को सरकार बनाने के लिए सहयोगियों की जरूरत पड़ी तो VCK सबसे अहम खिलाड़ी बनकर सामने आई. यह पार्टी बता रही है कि तमिलनाडु की राजनीति में अब दलित वोट बैंक को नजरअंदाज करना आसान नहीं है.
VCK के सामने सबसे बड़ी चुनौती दलित उप-जातियों को एकजुट रखना और गठबंधन राजनीति में अपनी पहचान बचाए रखना है.
VCK की शुरुआत और तमिलनाडु में नई सत्ता का गणित
- VCK की शुरुआत 1982 में ‘दलित पैंथर्स इयक्कम’ के रूप में हुई थी. उस दौर में तमिलनाडु के कई हिस्सों में दलितों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं बढ़ रही थीं. ऐसे माहौल में यह संगठन आत्मसम्मान और सुरक्षा की आवाज बनकर उभरा. बाद में 1990 में थोल. थिरुमावलवन ने इसे राजनीतिक पार्टी का रूप दिया और नाम रखा विदुथलाई चिरुथइगल काची. पार्टी ने शुरुआत से ही अंबेडकर, पेरियार और सामाजिक न्याय की विचारधारा को अपना आधार बनाया.
- थिरुमावलवन पहले फॉरेंसिक विभाग में नौकरी करते थे, लेकिन उन्होंने नौकरी छोड़कर पूर्णकालिक राजनीति और आंदोलन का रास्ता चुना. उनकी छवि आक्रामक लेकिन वैचारिक नेता की रही. उन्होंने दलित युवाओं को संगठित किया और जातिगत हिंसा के खिलाफ कई बड़े आंदोलन चलाए. VCK ने शुरुआती दौर में चुनाव बहिष्कार की नीति अपनाई, लेकिन बाद में समझा कि सत्ता में भागीदारी के बिना सामाजिक बदलाव अधूरा रहेगा.
दलित राजनीति की नई धुरी बनी VCK
VCK को तमिलनाडु की बसपा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी राजनीति दलित अधिकारों और बहुजन प्रतिनिधित्व पर केंद्रित है. पार्टी ने अदि द्रविड़ समुदाय के बीच मजबूत आधार बनाया. साथ ही पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों के मुद्दों को भी उठाया. थिरुमावलवन लगातार आरक्षण, शिक्षा, भूमि अधिकार और सामाजिक समानता की बात करते रहे हैं. यही कारण है कि VCK का प्रभाव उसकी सीटों से कहीं ज्यादा बड़ा माना जाता है.
चुनावी राजनीति में कैसे बढ़ा असर?
1999 में पहली बार चुनावी मैदान में उतरने के बाद VCK ने धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई. पार्टी ने समय-समय पर द्रविड़ मुनेत्र कज़गम और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कज़गम दोनों के साथ गठबंधन किए. लोकसभा और विधानसभा में उसकी मौजूदगी बनी रही. थिरुमावलवन खुद चिदंबरम सीट से सांसद बने. 2026 के चुनाव में भले ही VCK की सीटें कम रहीं, लेकिन सरकार गठन में उसकी भूमिका सबसे बड़ी बन गई.
थलापति विजय के लिए क्यों जरूरी है VCK?
तमिलगा वेत्री कजगम ने चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन बहुमत से थोड़ा पीछे रह गई. ऐसे में VCK का समर्थन विजय के लिए सत्ता की चाबी बन गया. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि VCK सिर्फ समर्थन नहीं दे रही, बल्कि सत्ता में सम्मानजनक हिस्सेदारी चाहती है. यही वजह है कि थिरुमावलवन की शर्तें चर्चा में हैं. इस पूरे घटनाक्रम ने साबित किया है कि तमिलनाडु में अब केवल स्टारडम से सरकार नहीं चलती, मजबूत सामाजिक गठबंधन भी जरूरी है.
VCK को तमिलनाडु की बसपा क्यों कहा जाता है?
VCK को तमिलनाडु की बसपा इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह पार्टी दलितों, वंचितों और सामाजिक न्याय की राजनीति को केंद्र में रखती है. बहुजन समाज पार्टी की तरह VCK भी अंबेडकरवादी विचारधारा पर चलती है. पार्टी जातिगत भेदभाव के खिलाफ खुलकर आवाज उठाती है और दलित समुदाय को राजनीतिक हिस्सेदारी दिलाने पर जोर देती है. तमिलनाडु में दलित राजनीति को मुख्यधारा में लाने में VCK की बड़ी भूमिका रही है.
थलापति विजय की सरकार के लिए VCK इतनी अहम क्यों है?
तमिलगा वेत्री कजगम बहुमत के करीब पहुंची, लेकिन सरकार बनाने के लिए उसे सहयोगियों की जरूरत पड़ी. ऐसे में VCK का समर्थन निर्णायक बन गया. पार्टी के पास भले कम सीटें हों, लेकिन उसका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव काफी बड़ा है. VCK के समर्थन से विजय को स्थिर सरकार बनाने में मदद मिल सकती है. यही वजह है कि इसे किंगमेकर कहा जा रहा है.
VCK के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
VCK के सामने सबसे बड़ी चुनौती दलित उप-जातियों को एकजुट रखना और गठबंधन राजनीति में अपनी पहचान बचाए रखना है. पार्टी को संसाधनों की कमी और बड़े दलों के दबाव का भी सामना करना पड़ता है. इसके बावजूद VCK लगातार अपने संगठन और जनाधार को मजबूत कर रही है. थिरुमावलवन की रणनीति ने पार्टी को तमिलनाडु की निर्णायक राजनीतिक ताकत बना दिया है.
