When the World Plays Out on Two Stages at Once: दुनिया में ऐसे मौके बहुत कम आते हैं, जब वैश्विक ताकतों का संतुलन बदलता हुआ साफ दिखाई दे. लेकिन इस समय कुछ ऐसा ही माहौल बनता नजर आ रहा है. एक ही समय में बीजिंग और नई दिल्ली दुनिया की बड़ी कूटनीतिक गतिविधियों के केंद्र बन गए हैं. दोनों जगह ऐसी बैठकों और बातचीत का दौर चल रहा है, जो आने वाले समय में दुनिया की दिशा तय कर सकता है. बीजिंग में डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात सिर्फ एक सामान्य द्विपक्षीय बैठक नहीं मानी जा रही. यह उस नए दौर का संकेत है, जहां राजनीति, टेक्नोलॉजी और पैसा एक ही मेज पर साथ बैठे दिखाई दे रहे हैं.
ट्रंप के साथ दुनिया की कई बड़ी कंपनियों के प्रमुख भी चीन पहुंचे हैं . इनमें एलन मस्क, एनवीडिया के सीईओ जेनसन हुआंग, एप्पल के टिम कुक और बड़े वित्तीय संस्थानों के प्रमुख शामिल हैं. इससे साफ संदेश जाता है कि आज की कूटनीति केवल सरकारों तक सीमित नहीं रह गई है. अब दुनिया की दिशा तय करने में सरकारों के साथ बड़ी कंपनियों और कॉर्पोरेट ताकतों की भी बड़ी भूमिका हो गई है.
ईरान संकट, तेल सप्लाई को लेकर चिंता, सेमीकंडक्टर की प्रतिस्पर्धा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI में आगे निकलने की होड़ के बीच बीजिंग इस समय उस जगह में बदल गया है, जहां मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को लेकर बड़ी बातचीत हो रही है.
नई दिल्ली में दिख रही एक अलग तस्वीर
इसी दौरान नई दिल्ली में एक अलग तस्वीर दिखाई दे रही है. यहां ब्रिक्स देशों की बैठक चल रही है. ब्रिक्स को अक्सर पश्चिमी देशों के प्रभाव के मुकाबले खड़े एक समूह के रूप में देखा जाता है. इस बैठक में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची की मौजूदगी ने इसे और ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया है. यह सिर्फ एक सामान्य भागीदारी नहीं है, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संकेत माना जा रहा है.
यह संकेत है कि ग्लोबल साउथ यानी विकासशील और उभरते देश अब पहले से ज्यादा आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रख रहे हैं. ये देश ऊर्जा सुरक्षा चाहते हैं, डॉलर पर निर्भरता कम करना चाहते हैं और दुनिया की वैकल्पिक संस्थाएं बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.
अगर इन दोनों घटनाओं को एक साथ देखा जाए, तो यह केवल संयोग नहीं लगता . यह उस दुनिया की तस्वीर पेश करता है, जो तेजी से बदल रही है. बीजिंग में अमेरिका और चीन अपनी प्रतिस्पर्धा को किनारे रख मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं. वहीं नई दिल्ली में उभरती ताकतें उसी व्यवस्था को बदलने और नए तरीके से गढ़ने की कोशिश कर रही हैं.
बदलते समीकरण के केंद्र में ईरान
इस पूरे बदलते समीकरण के केंद्र में ईरान खड़ा नजर आता है. अमेरिका के लिए ईरान एक बड़ा दबाव और चुनौती है. चीन के लिए वह एक रणनीतिक साझेदार है. वहीं ब्रिक्स के भीतर ईरान अब पहले से ज्यादा खुलकर अपनी भूमिका निभाता दिख रहा है. इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये सब एक ही समय पर हो रहा है. ऐसा लग रहा है जैसे दुनिया दो अलग-अलग मंचों पर एक साथ दिख रही हो.
एक तरफ ऐसी ताकतें हैं जो मौजूदा व्यवस्था को स्थिर बनाए रखना चाहती हैं. दूसरी तरफ वे देश हैं जो भविष्य की नई वैश्विक व्यवस्था तैयार करना चाहते हैं. अगर इसे बहुत सरल शब्दों में समझें तो बीजिंग में दुनिया जैसी अभी है, उस पर बातचीत हो रही है. जबकि नई दिल्ली में दुनिया भविष्य में कैसी हो सकती है, उसकी नींव रखी जा रही है.
