क्यों दोबारा नहीं बन सकती आदिलाबाद की एक भी मूर्ति? जानिए क्या है इसकी खासियत
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Dokra Art: तेलंगाना के आदिलाबाद की प्राचीन ‘डोकरा कला’ अपने ‘सिंगल-यूज़ मोल्ड’ के कारण विश्व में इकलौती है. यहाँ की हर मूर्ति अनूठी होती है क्योंकि सांचा एक बार ही इस्तेमाल होता है. 2018 में जीआई टैग पाने वाली यह 4,000 साल पुरानी कला आज मशीनी नकल और बिचौलियों के कारण संकट में है. कारीगरों की गिरती आय और नई पीढ़ी के पलायन से यह नायाब धरोहर विलुप्त होने की कगार पर है. इसे बचाने के लिए सीधे बाजार और सरकारी सहायता की सख्त आवश्यकता है ताकि यह आदिम कला भावी पीढ़ियों के लिए बची रहे.
Dokra Art: तेलंगाना के आदिवासी बहुल जिले आदिलाबाद के जैनूर मंडल में एक ऐसी परंपरा जीवित है जो सदियों पुरानी है. यहाँ का ओझा समुदाय लगभग 4,000 साल पुरानी ‘लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग’ यानी ‘खोया हुआ मोम’ पद्धति का उपयोग करके अत्यंत सुंदर धातु शिल्प का निर्माण करता है. डोकरा कला भारत के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित है, लेकिन आदिलाबाद के ओझाओं द्वारा बनाई जाने वाली डोकरा कला अपनी विशिष्टता के कारण पूरी दुनिया में बेजोड़ मानी जाती है.
स्थानीय कलाकार इन्द्रजीत ओझा के अनुसार, इस शिल्प की सबसे बड़ी खूबी इसका ‘सिंगल-यूज़ मोल्ड’ यानी एक बार इस्तेमाल होने वाला सांचा है. कलाकार मिट्टी और मोम के बारीक धागों का उपयोग करके हर मूर्ति के लिए एक नया और अनूठा सांचा तैयार करते हैं. पिघली हुई पीतल की धातु सांचे में डालने के बाद, बाहरी मिट्टी की परत को हथौड़े से तोड़कर मूर्ति निकाली जाती है. सांचा नष्ट हो जाने के कारण दुनिया में उस जैसी दूसरी कृति दोबारा कभी नहीं बनाई जा सकती. यही कारण है कि यहाँ बनने वाला हर उत्पाद दुनिया में इकलौता और अद्वितीय होता है. इसी अनूठी विशेषता के कारण साल 2018 में इस कला को जीआई टैग (GI Tag) प्रदान किया गया था.
अस्तित्व पर मंडराते खतरे
शहरी सजावट और ग्लोबल कला दीर्घाओं में इन मूर्तियों की मांग तो बढ़ रही है, लेकिन इसके असली संरक्षक आज अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं. एक छोटी मूर्ति बनाने में 4 से 5 दिन और बड़ी आकृतियों में हफ़्तों की कड़ी मेहनत लगती है, मगर बिचौलियों के जाल के कारण कारीगरों को उनकी मेहनत का सही दाम नहीं मिल पाता. पीतल, शुद्ध मधुमक्खी के मोम और कोयले जैसी कच्ची सामग्रियों की बढ़ती कीमतों ने इनके लाभ को पूरी तरह समाप्त कर दिया है.
मशीन बनाम हाथ की लड़ाई
वर्तमान में सबसे बड़ा खतरा बाजार में मिल रहे मशीन-निर्मित केमिकल मोल्ड वाले नकली डोकरा उत्पादों से है, जो बेहद कम दामों पर बिक रहे हैं. आम ग्राहक अक्सर असली हस्तशिल्प और मशीनी नकल के बीच का अंतर नहीं समझ पाते, जिससे पारंपरिक कारीगरों का बाजार लगातार सिमटता जा रहा है. गिरती आय के कारण अब मुश्किल से 100-150 परिवार ही इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. नई पीढ़ी इस पुश्तैनी काम को छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रही है. यदि ई-कॉमर्स और प्रभावी सरकारी नीतियों के जरिए इन कलाकारों को सीधे बाजार से नहीं जोड़ा गया, तो दुनिया की यह सबसे नायाब कला हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगी.
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Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with News18 Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें
