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वीरप्पन का काल, नक्सलियों का बाप! मिलिए देश के सबसे बड़े ‘संकटमोचक’ विजय कुमार से जिन्हें मिला पद्मश्री

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वीरप्पन का काल, नक्सलियों का बाप! संकटमोचक विजय कुमार से जिन्हें मिला पद्मश्री

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खूंखार चंदन तस्कर वीरप्पन का अंत करने वाले और नक्सलियों के गढ़ में घुसकर उन्हें चुनौती देने वाले पूर्व आईपीएस अधिकारी के. विजय कुमार को साल 2026 के प्रतिष्ठित पद्मश्री (Padma Shri) सम्मान से नवाजा गया है. अपने पांच दशक के शानदार करियर में उन्होंने हमेशा मुश्किलों का सीना तानकर सामना किया. 2010 के दांतेवाड़ा नक्सली हमले के बाद रात के अंधेरे में उसी खूनी जंगल में जवानों के साथ रुकना हो, या श्रीनगर में फिदायीन हमलों को रोकना, विजय कुमार ने हर मोर्चे पर शानदार नेतृत्व किया. आइए जानते हैं उस ‘संकटमोचक’ की कहानी, जिसने आईएएस की कुर्सी ठुकराकर वर्दी चुनी.

वीरप्पन का काल, नक्सलियों का बाप! संकटमोचक विजय कुमार से जिन्हें मिला पद्मश्रीZoom

के विजय कुमार को आज मिलेगा पद्म श्री अवॉर्ड.

Padma Shri Award K. Vijayan: कहते हैं कि जब हालात सबसे बुरे हों, तब असली हीरो की पहचान होती है. भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के पूर्व अधिकारी के. विजय कुमार एक ऐसे ही ‘संकटमोचक’ हैं, जो देश पर आए हर संकट में सबसे आगे खड़े नजर आए. मुश्किल जगहों पर जाने की उनकी इसी सहज आदत और अद्भुत बहादुरी को सलाम करते हुए, उन्हें साल 2026 के प्रतिष्ठित ‘पद्मश्री’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.

के. विजय कुमार को पुलिस की नौकरी का जुनून था. उनके पिता खुद एक पुलिस इंस्पेक्टर थे और हमेशा स्मार्ट यूनिफॉर्म में रहते थे. एक छोटे लड़के के रूप में विजय कुमार के लिए पिता की वह झलक सबसे बड़ी प्रेरणा थी. उन्होंने एमए (MA) की पढ़ाई पूरी की. 1975 में आईपीएस के लिए चुन लिए गए. दिलचस्प बात यह है कि एक साल बाद जब उनका चयन प्रशासनिक सेवा (IAS) के लिए भी हो गया, तो उन्होंने इसे साफ ठुकरा दिया क्योंकि उन्हें यूनिफॉर्म (वर्दी) से गहरा लगाव था.

खूनी मंजर और डीजी का हौसला

उनके करियर का सबसे चुनौतीपूर्ण पल अप्रैल 2010 में आया, जब वह केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के डीजी थे. छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा में नक्सलियों ने सीआरपीएफ के जवानों पर घात लगाकर भीषण हमला किया, जिसमें 75 जवान शहीद हो गए. हालात बेहद तनावपूर्ण और गंभीर थे.

लेकिन एक सच्चे लीडर की तरह, विजय कुमार तुरंत उस खूनी जंगल में पहुंचे और रात भी ठीक उसी जगह बिताई जहां घास लगाकर वह कायराना हमला किया गया था. उनका यह कदम जवानों के लिए एक बहुत बड़ा संदेश था. इससे पूरी फोर्स का हौसला बढ़ गया. उनकी सीख साफ थी – ‘जिस जगह मुसीबत हो, वहीं जाओ.’

विजय कुमार का पांच दशकों का करियर ऐसे ही साहसिक कारनामों से भरा पड़ा है

  1. धर्मापुरी में नक्सलवाद पर प्रहार: करियर के शुरुआती दिनों में जब उन्हें धर्मापुरी का एसपी (SP) बनाया गया, जो नक्सलियों का गढ़ था – तब उन्होंने खुद रातों में नाइट पेट्रोलिंग की, लोगों का विश्वास जीता और इलाके की तस्वीर बदल दी.
  2. कारगिल युद्ध और श्रीनगर: 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान, वह श्रीनगर में बीएसएफ (BSF) के आईजी थे. वहां फिदायीन हमलों का जबरदस्त खौफ था, लेकिन उन्होंने अपने सिस्टेमेटिक एप्रोच से श्रीनगर में हालात को पूरी तरह कंट्रोल में कर लिया.
  3. ऑपरेशन कोकून (वीरप्पन का अंत): अगली और सबसे बड़ी चुनौती चंदन और हाथी दांत के कुख्यात तस्कर वीरप्पन से निपटना था. साल 2004 में तमिलनाडु के घने जंगलों में, विजय कुमार के नेतृत्व में ही ‘स्पेशल टास्क फोर्स’ (STF) ने वीरप्पन को मार गिराया था.

परिवार मेरी सबसे बड़ी ताकत

आज जब उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक पद्मश्री से नवाजा गया है, तो वह इसका पूरा श्रेय अपने परिवार और सहकर्मियों को देते हैं. विजय कुमार भावुक होकर कहते हैं, ‘अगर उन्होंने परिवार की पूरी जिम्मेदारी ना संभाली होती, तो मुझे नहीं लगता मैं आज यहां होता. वह मेरी सबसे बड़ी ताकत थीं.’ उनका जीवन फलसफा बेहद सीधा और प्रेरणादायक है, ‘किसी भी काम में, अगर आपको अपना काम पसंद है, तो आप उसमें अच्छा करने लगते हैं, अपना बेस्ट देने लगते हैं और आप अपने आप सबसे ऊपर पहुंच जाते हैं.’

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Deep Raj Deepak working with News18 Hindi (hindi.news18.com/) Central Desk since 2022. He has strong command over national and international political news, current affairs and science and research-based news. …और पढ़ें

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