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विजय सिन्हा की रणनीति और NDA की एकजुटता से जीत

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लखीसराय. बिहार विधानसभा चुनाव में लखीसराय का चुनावी मैदान शुरुआत में एनडीए के लिए उतना सहज नहीं दिख रहा था. डिप्टी सीएम विजय सिन्हा के खिलाफ स्थानीय समीकरणों और अंदरूनी असंतोष की बातें उठने लगी थीं. विरोधी पक्ष आरजेडी ने यह अफवाह फैलाने की कोशिश की कि सूर्यगढ़ा से एनडीए उम्मीदवार रामानंद मंडल और विजय सिन्हा के बीच टकराव है. सोशल मीडिया पर चर्चा होने लगी कि एनडीए के भीतर ही फूट है. यह अफवाह इतनी तेजी से फैली कि जेडीयू के कार्यकर्ताओं तक में असमंजस पैदा हो गया. विपक्ष का उद्देश्य साफ था-जेडीयू के समर्थन को कमजोर कर ओबीसी और ईबीसी वोटों में सेंध लगाना. अगर यह माहौल बना रहता तो ओबीसी और ईबीसी वोट बैंक में सेंध लगना तय माना जा रहा था. लेकिन, इसके बाद तो कुछ रणनीतिक बाजीगरियां सामने आईं और यही राजनीतिक चतुराई विजय सिन्हा के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुईं.

अफवाहों का जवाब रणनीति से

दरअसल, चुनावी माहौल गरमाता जा रहा था, लेकिन विजय सिन्हा ने इसे अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया. उन्होंने तुरंत जवाबी रणनीति बनाई और अफवाहों को हवा में नहीं उड़ने दिया. उन्होंने तुरंत रामानंद मंडल के साथ संयुक्त रैलियों की योजना बनाई. रामानंद मंडल को अपने साथ मंच पर बिठाया, संयुक्त रैलियां कीं और सबके सामने कहा-एनडीए एक है, कोई मतभेद नहीं. इन सभाओं में दोनों नेताओं ने एक-दूसरे के लिए खुलकर समर्थन जताया जिससे विरोधियों की चाल बेअसर हो गई. विजय सिन्हा के इस रणनीतिक कदम ने खेल पलट दिया. इन रैलियों का असर जमीनी स्तर पर साफ दिखा-कार्यकर्ताओं में एकता आई और सोशल मीडिया पर #VijaySinhaStrong ट्रेंड करने लगा. इस अभियान के साथ ही स्थानीय जनता में यह संदेश गया कि एनडीए पूरी तरह एकजुट है.

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लखीसराय के हलसी में जनसभा के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ डिप्टी सीएम विजय सिन्हा.

नीतीश कुमार का सपोर्ट, जेडीयू बैलेंस

इसके बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सभा ने लखीसराय में एनडीए की स्थिति और मजबूत कर दी. हलसी प्रखंड में आयोजित सभा में नीतीश ने कहा, विजय सिन्हा मेरे पुराने साथी हैं, उन्हें फिर से जिताना है. सीएम नीतीश का यह बयान न सिर्फ जेडीयू कार्यकर्ताओं के लिए संकेत था, बल्कि कुर्मी और यादव समुदायों में भी गूंजा. नीतीश के समर्थन ने विपक्ष के जातीय समीकरणों को कमजोर किया और एनडीए को एकजुटता का नया जोश दिया और नीतीश कुमार की रैली ने विजय सिन्हा की स्थिति को निर्णायक मोड़ दे दिया.

अमित शाह की सभा ने बदला सियासी सीन

विजय सिन्हा की रणनीति का सबसे बड़ा दांव था- केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सभा. शाह के भाषण में यह लाइन कि- विजय सिन्हा बिहार की राजनीति का भविष्य हैं- स्थानीय राजनीति की दिशा तय कर गई. जनसभा के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं में ऊर्जा दिखी और ग्रामीण इलाकों में एनडीए की लहर का एहसास होने लगा. राष्ट्रीय चैनलों ने इस सभा को प्रमुखता दी जिससे विजय सिन्हा की छवि एक राज्य से आगे बढ़कर बड़े नेता की बनती हुई लगी. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सभा इस चुनाव का सबसे बड़ा ‘गेम चेंजर’ साबित हुई.

ललन सिंह और गिरिराज सिंह की जॉइंट पावर

एक और मिथक जो तोड़ा गया-वह था ललन सिंह के असंतोष का. विजय सिन्हा ने ललन सिंह के साथ कई संयुक्त सभाएं कीं जिसमें ललन ने खुलेआम कहा- विजय सिन्हा को जिताना हमारा कर्तव्य है. यह बड़ा मास्टरस्ट्रोक था और इससे भूमिहार वोटर पूरी तरह एनडीए के पक्ष में एकजुट हो गए. गिरिराज सिंह की मौजूदगी ने इसे और सुदृढ़ किया. दलित वोट बैंक के लिए चिराग पासवान से भी सहयोग लिया गया, जिससे बूथ स्तर पर एनडीए की पकड़ मजबूत हुई है.संदेश यह निकला कि विजय सिन्हा ने सिर्फ भाजपा ही नहीं, बल्कि पूरे एनडीए को साथ जोड़ लिया.

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लखीसराय विधानसभा के परसामा (रामगढ़ चौक) में केंद्रीय मंत्री ललन सिंह और गिरिराज सिंह के साथ डिप्टी सीएम विजय सिन्हा.

विपक्ष की शातिर चाल और जमीनी हकीकत

विपक्ष ने प्रियंका गांधी की रैली से महिला और युवा वोटरों को लुभाने की कोशिश की, लेकिन जमीनी स्तर पर असर सीमित दिख रहा है. आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन ने भी जातीय समीकरणों के सहारे माहौल बनाने की कोशिश की, लेकिन एनडीए की एकजुट रणनीति के सामने यह सब फीका पड़ गया. स्थानीय जानकारों का मानना है कि अब लखीसराय में मुकाबला एक तरफ झुकता हुआ लग रहा है. एनडीए कार्यकर्ता आत्मविश्वास में हैं और वोटरों में भी यही चर्चा है कि -सिन्हा जी ने सबको साथ जोड़ लिया.

रणनीति, एकता और भरोसे की जीत

लखीसराय का यह चुनाव अब सिर्फ एक सीट की लड़ाई नहीं, बल्कि एक संदेश बन गया है कि- जब राजनीतिक अफवाहों का जवाब रणनीति, संयम और संवाद से दिया जाए तो हालात बदल सकते हैं. विजय सिन्हा ने आखिरी हफ्ते में जिस तरह स्थिति पलटी है वह बिहार की राजनीति में संगठन की शक्ति और व्यक्तिगत नेतृत्व दोनों का उदाहरण बन गया है. विजय सिन्हा ने दिखाया कि राजनीति में संयम, संवाद और संगठन ही सबसे बड़ा हथियार हैं. उन्होंने आखिरी हफ्ते में जिस तरह से समीकरण पलटे, वह बिहार की राजनीति में एक ‘क्लासिक केस स्टडी’ बन गया है. अब बस 14 नवंबर को जनता यह तय करेगी कि यह ‘विजय की वापसी’ कहानी बनती है या ‘विजय का इतिहास’!

By uttu

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