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Presidential Reference Case: तमिलनाडु, केरल, पंजाब जैसे विपक्षी दल शासित राज्यों में राज्यपाल और सरकार के बीच अक्सर ही ठन जाने की बात सामने आती रहती है. खासकर विधानसभा से पास विधेयकों को मंजूरी देने के मामले में तनातनी की स्थिति पैदा हो जाती है. सुप्रीम कोर्ट ने अब इसपर राष्ट्रपति को अपनी राय दी है.
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए विधेयकों को मंजूरी देने के लिए टाइमलाइन फिक्स करने से इनकार कर दिया है. रिपोर्ट: अनन्या भटनागर
Presidential Reference Case: विधानसभा की ओर से पास किसी बिल या विधेयक को राष्ट्रपति या राज्यपाल कब तक अपने पास रोक कर रख सकते हैं? क्या राष्ट्रपति या राज्यपाल के लिए इस बाबत टाइमलाइन फिक्स की जा सकती है? प्रेसिडेंशियल रेफरेंस के जरिये राष्ट्रपति की ओर से मांगी गई सलाह पर सुप्रीम कोर्ट रुख साफ कर दिया है. देश की टॉप कांस्टीट्यूशनल कोर्ट ने साफ कर दिया है कि किसी भी विधेयक को मंजूरी देने को लेकर राष्ट्रपति या राज्यपाल के लिए टाइमलाइन फिक्स नहीं की जा सकती है. इसका मतलब यह हुआ कि संसद या राज्य विधानसभा की ओर से मंजूरी के लिए भेजे गए विधेयक पर गवर्नर या प्रेसिडेंट अपने विवेक के अनुसार फैसला ले सकते हैं. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि राष्ट्रपति या राज्यपाल किसी भी विधेयक को अनिश्चितकाल तक के लिए रोक कर नहीं रख सकते हैं. पांच जजों की बेंच ने कहा कि सीमित न्यायिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए अदालतें इसपर समय-समय पर विचार कर सकती हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि राज्य विधानसभाओं में पारित विधेयकों को मंजूरी देने के संबंध में राज्यपाल एवं राष्ट्रपति के लिए कोई समयसीमा तय नहीं की जा सकती और ज्यूडिशियरी भी उन्हें मान्य स्वीकृति नहीं दे सकती. प्रधान न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बीआर गवई की अगुवाई वाली 5 जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से कहा कि यदि राज्यपाल को अनुच्छेद 200 (विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने की राज्यपाल की शक्ति) के तहत उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना विधेयकों को रोकने की अनुमति दी जाती है तो यह संघवाद के हित के खिलाफ होगा. यह फैसला सुनाने वाली पीठ में जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर भी शामिल थे.
अनुच्छेद 143(1) के तहत मांगी गई थी सलाह
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि हमें नहीं लगता कि राज्यपालों के पास राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को रोके रखने की असीमित शक्ति है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट की राय मांगे जाने पर पीठ ने ‘राष्ट्रपति के संदर्भ’ के मामले में जवाब देते हुए कहा कि राज्यपालों के पास तीन विकल्प हैं – या तो वे विधेयकों को मंजूरी दें या पुनर्विचार के लिए भेजें या उन्हें राष्ट्रपति के पास भेजें. पीठ ने कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में राज्यपालों के लिए समय-सीमा तय करना संविधान द्वारा प्रदत्त लचीलेपन के विरुद्ध है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ही उपजे सवाल
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने तमिलनाडु के मामले में राज्य के राज्यपाल द्वारा रोक कर रखे गए विधेयकों को शीर्ष अदालत द्वारा 8 अप्रैल को दी गई मान्य स्वीकृति को भी अनुचित बताया. शीर्ष अदालत ने यह भी फैसला दिया कि अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के अधिकारों का उपयोग न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आता. बता दें कि तमिलनाडु के राज्यपाल ने कुछ विधेयकों को लंबे समय तक मंजूरी नहीं दी थी. इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. तब दो जजों की पीठ ने विधानसभा की ओर से पास विधेयकों को मंजूरी देने के लिए समय-सीमा तय कर दी. इस पूरी घटना के बीच राष्ट्रपति ने प्रेसिडेंशियल रेफरेंस के तहत सुप्रीम कोर्ट से सलाह मांगी थी. शीर्ष अदालत ने अब उसपर अपनी राय प्रेसिडेंट को दी है.
(इनपुट: पीटीआई)

बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…और पढ़ें
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