नई दिल्ली. दिल्ली हाईकोर्ट में धार्मिक उपदेशक अनिरुद्धाचार्य से जुड़े एक अहम मामले की सुनवाई के दौरान उस वक्त दिलचस्प और तीखी बहस देखने को मिली जब अदालत ने ‘विवादित कंटेंट तो मंगल ग्रह पर भी है’ जैसी टिप्पणी की. यह मामला ‘पर्सनैलिटी राइट्स’ यानी व्यक्तित्व अधिकारों की सुरक्षा से जुड़ा है, जिसमें अनिरुद्धाचार्य ने सोशल मीडिया और इंटरनेट प्लेटफॉर्म पर अपने खिलाफ चल रहे कथित आपत्तिजनक और भ्रामक कंटेंट को हटाने की मांग की है. इस याचिका पर सुनवाई दिल्ली हाईकोर्ट में जस्टिस तुषार राव गेडेला की बेंच के सामने हुई.
मामला क्या है?
अनिरुद्धाचार्य की ओर से दायर याचिका में दावा किया गया है कि सोशल मीडिया पर उनके नाम से आपत्तिजनक कंटेंट फैलाया जा रहा है. कुछ कंटेंट एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से तैयार किया गया है. ऐसा दिखाया जा रहा है जैसे वही खुद विवादित बातें कह रहे हों. याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि ‘गुरुजी एडिक्टस’ जैसे सोशल मीडिया हैंडल्स और कुछ वेबसाइट्स पर उनके क्लाइंट की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला कंटेंट डाला जा रहा है.
AI और ‘डीपफेक’ बना बड़ा मुद्दा
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि कुछ कंटेंट एआई तकनीक के जरिए तैयार किया गया है. वीडियो और ऑडियो इस तरह एडिट किए गए हैं जिससे लगे कि अनिरुद्धाचार्य खुद ही विवादित बयान दे रहे हैं. इस पर कोर्ट ने माना कि डीपफेक तकनीक एक गंभीर चिंता का विषय है और इस पर कानूनी कार्रवाई जरूरी हो सकती है.
‘मंगल ग्रह’ वाली टिप्पणी क्यों?
सुनवाई के दौरान कोर्ट और याचिकाकर्ता के वकील के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर तीखी बहस हुई. जब वकील ने कहा कि विवादित कंटेंट इंटरनेट पर मौजूद है, तो कोर्ट ने तीखे अंदाज में कहा कि विवादित कंटेंट तो मंगल ग्रह पर भी है, शायद बृहस्पति पर भी… सवाल यह है कि इसे यहां कौन देख रहा है? इस टिप्पणी का मतलब यह था कि सिर्फ कंटेंट का इंटरनेट पर मौजूद होना ही काफी नहीं है-यह भी जरूरी है कि वह किस क्षेत्र में प्रभाव डाल रहा है.
दिल्ली ही क्यों?
कोर्ट ने बार-बार यह सवाल उठाया कि मामला दिल्ली हाई कोर्ट में ही क्यों लाया गया?
क्या बाकी राज्यों की अदालतें सक्षम नहीं हैं?
क्या यह सिर्फ ‘सुविधाजनक मंच’ के कारण किया गया?
कोर्ट ने यहां तक कहा…
टिम्बकटू में भी केस कर सकते हैं, तो दिल्ली ही क्यों? इस पर वकील ने जवाब दिया कि प्रतिवादी (जैसे गूगल) दिल्ली में स्थित हैं और उनके क्लाइंट का कामकाज भी यहीं से जुड़ा है. लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि ‘सुविधा’ के आधार पर अदालत चुनना सही तर्क नहीं है.
अभिव्यक्ति बनाम प्रतिष्ठा
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने एक अहम बात कही कि जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से विचार या दर्शन प्रस्तुत करता है, तो आलोचना होना स्वाभाविक है. कोर्ट ने ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए कहा कि आदिशंकराचार्य ने कभी आलोचना के खिलाफ मानहानि के मुकदमे नहीं किए, बल्कि बहस के जरिए अपने विचार रखे. कोर्ट का साफ संदेश था कि हर आलोचना मानहानि नहीं होती जब तक कंटेंट अपमानजनक या झूठा न हो, उसे पूरी तरह रोकना सही नहीं.
‘आपको इन सब से ऊपर होना चाहिए’
सुनवाई के दौरान जस्टिस गेडेला ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि आपको आलोचना, तारीफ और पहचान-इन सबसे ऊपर होना चाहिए। अगर आप अपनी प्रतिष्ठा से इतने जुड़े हैं, तो यह आपके उपदेशों के विपरीत होगा. यह टिप्पणी सीधे तौर पर याचिकाकर्ता के दावे और उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व पर सवाल उठाती दिखी.
क्या थी यूट्यूब और गूगल की दलीलें
गूगल और यूट्यूब की ओर से पेश वकील ने कहा कि कुछ लिंक ‘फैन पेज’ हैं. उनमें आलोचना की गई है, जो पूरी तरह अवैध नहीं है. अगर AI से बना फर्जी कंटेंट है, तो उसे हटाया जा सकता है.
– कोर्ट ने फिलहाल सीमित राहत देते हुए कहा कि जिन यूआरएल में स्पष्ट आपत्तिजनक या भ्रामक कंटेंट है, उन्हें हटाया जा सकता है. खासकर यूट्यूब पर ऐसे कंटेंट को लेकर कार्रवाई की जाएगी.
