ईरान और चीन के बीच एक बेहद घातक एंटी-शिप क्रूज मिसाइल CM-302 की डील लगभग फाइनल हो चुकी है. यह खबर ऐसे वक्त में आई है, जब अमेरिका ने ईरान पर हमले की चेतावनी देते हुए अपने विशाल नौसैनिक बेड़े को ईरान की चौखट पर लाकर खड़ा कर दिया है. तो अब साफ है कि चीन ईरान को यह घातक मिसाइलें देने जा रहा है. लेकिन क्या यह मिसाइल इतनी ताकतवर है कि अमेरिकी युद्धपोतों के सीने में सुराख कर पाए?
जानिए क्यों इसे कहा जा रहा चीन का ब्रह्मास्त्र
चीन और ईरान के बीच मिसाइल डील आखिर है क्या?
ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक- मिडिल ईस्ट में युद्ध के मंडराते बादलों के बीच ईरान, चीन से अत्याधुनिक सुपरसोनिक एंटी-शिप क्रूज मिसाइलें खरीद रहा है. दोनों देशों के बीच यह बातचीत पिछले दो सालों से चल रही थी, लेकिन जून 2025 में जब इजरायल ने ईरान पर हमले किए तो ईरान ने इस मिसाइल को पाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है. अब यह डील होने जा रही है.
इसे क्यों कहा जा रहा चीन का सबसे खूंखार वर्जन?
इस मिसाइल का नाम CM-302 है. यह चीन की खूंखार और घातक YJ-12 मिसाइल का एक्सपोर्ट वर्जन है. चीन की सरकारी डिफेंस कंपनी चाइना एयरोस्पेस साइंस एंड इंडस्ट्री कॉरपोरेशन इसे बनाती है. कहते हैं कि एक बार ये निकल जाए तो तबाही मचाकर ही मानती है.
इसे ‘गेमचेंजर’ क्यों कहा जा रहा है?
CM-302 एक सुपरसोनिक एंटी-शिप क्रूज मिसाइल है. सुपरसोनिक का मतलब है कि यह आवाज की गति से भी कई गुना तेज उड़ती है. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह मिसाइल ईरान के हाथ लग गई, तो यह इस पूरे इलाके के लिए एक बड़ा गेमचेंजर साबित होगी. क्योंकि इतनी तेज रफ्तार वाली मिसाइल को इंटरसेप्ट करना और हवा में मार गिराना दुनिया की किसी भी एडवांस नेवी के लिए एक बहुत बड़ा सिरदर्द है.
इसकी स्पीड और मारक क्षमता कितनी है?
इस मिसाइल की मारक क्षमता लगभग 290 किलोमीटर है. यानी अगर ईरान इसे अपने तट से दागे, तो 290 किमी के दायरे में समंदर में मौजूद कोई भी जहाज नहीं बचेगा. यह मैक 2.5 से लेकर मैक 3 की रफ्तार से उड़ान भरती है. आसान भाषा में समझें तो यह एक सेकंड में लगभग 1 किलोमीटर का फासला तय कर लेती है. जब यह अपने टारगेट के बिल्कुल करीब पहुंचती है, तो इसकी रफ्तार मैक 4 तक भी जा सकती है.
क्या यह मिसाइल सच में अमेरिकी युद्धपोतों में सुराख कर पाएगी?
हां, बिल्कुल. चीन की कंपनी का दावा है कि यह दुनिया की बेहतरीन एंटी-शिप मिसाइलों में से एक है, जो किसी भी एयरक्राफ्ट कैरियर या डिस्ट्रॉयर (विध्वंसक जहाज) को पल भर में डुबो सकती है. इसमें लगभग 250 किलोग्राम का हाई-एक्सप्लोसिव वारहेड लगा होता है. जब मैक 3 की रफ्तार से कोई भारी मिसाइल जहाज से टकराती है, तो सिर्फ बारूद ही नहीं, बल्कि उस भयंकर रफ्तार से पैदा होने वाली काइनेटिक एनर्जी ही जहाज के परखच्चे उड़ाने या उसके कवच को बेधकर एक बहुत बड़ा सुराख करने के लिए काफी होती है. एक सिंगल सटीक हिट किसी भी बड़े युद्धपोत को अपाहिज कर सकती है.
इसे हवा में रोकना इतना मुश्किल क्यों है? ‘सी-स्किमिंग’ तकनीक क्या होती है?
CM-302 की सबसे खौफनाक खासियत इसकी उड़ान का तरीका है. इसे सी-स्किमिंग कहते हैं. यह मिसाइल लॉन्च होने के बाद आसमान में ऊपर नहीं उड़ती, बल्कि समंदर की लहरों को चूमते हुए, पानी की सतह से महज कुछ मीटर की ऊंचाई पर उड़ती है. चूंकि हमारी पृथ्वी गोल है, इसलिए अमेरिकी जहाजों के रडार बहुत दूर से समंदर की सतह के करीब उड़ने वाली चीजों को नहीं देख पाते. जब तक मिसाइल रडार की पकड़ में आती है, तब तक वह जहाज के बहुत करीब आ चुकी होती है.
अमेरिकी नेवी के पास तो दुनिया के सबसे एडवांस रडार और डिफेंस सिस्टम हैं, क्या वो काम नहीं आएंगे?
यह सच है कि अमेरिका के पास एजिस कॉम्बैट सिस्टम और फलांक्स जैसी बेहतरीन समुद्री डिफेंस सिस्टम हैं . लेकिन यहां पूरा खेल रिएक्शन टाइम का है. मान लीजिए, अमेरिकी रडार ने मिसाइल को 30-40 किलोमीटर दूर पकड़ भी लिया. लेकिन मिसाइल की स्पीड इतनी ज्यादा है कि अमेरिकी नौसैनिकों के पास फैसला लेने और अपना डिफेंस सिस्टम फायर करने के लिए सिर्फ 15 से 30 सेकंड का समय बचेगा. अगर सिस्टम ऑटोमैटिक मोड पर नहीं है या जरा सी भी तकनीकी चूक हुई, तो तबाही तय है.
ईरान को अचानक इस मिसाइल को खरीदने की इतनी सख्त जरूरत क्यों पड़ गई?
पिछले कुछ समय से ईरान और अमेरिका के बीच तनाव चरम पर है. पिछले साल के युद्ध के बाद ईरान का हथियारों का जखीरा काफी खाली हो चुका है. ऊपर से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार ईरान पर सीधी सैन्य कार्रवाई की धमकियां दे रहे हैं. खुद को इस खतरे से बचाने और अपनी समुद्री ताकत को रातों-रात मजबूत करने के लिए ईरान को इस रेडी-मेड किलर मिसाइल की सख्त जरूरत है.
अभी ईरान की चौखट (फारस की खाड़ी) पर अमेरिका की क्या तैयारी है?
अमेरिका ने ईरान के बिल्कुल करीब अपना एक विशाल नौसैनिक बेड़ा तैनात कर रखा है. इसमें USS Abraham Lincoln और USS Gerald R. Ford जैसे विशाल एयरक्राफ्ट कैरियर शामिल हैं. इन जहाजों पर 5,000 से ज्यादा सैनिक और 150 से अधिक लड़ाकू विमान तैनात हैं. ये पूरी तरह से ईरान पर स्ट्राइक करने की पोजिशन में खड़े हैं, इसीलिए ईरान बौखलाया हुआ है.
इस मिसाइल का ‘निशाना’ कितना अचूक है? क्या ये लक्ष्य से भटक सकती है?
इसे इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर यानी रडार जैमिंग के जरिए चकमा देना बहुत मुश्किल है. CM-302 में चीन का अपना BeiDou सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम लगा है. रास्ते भर यह सैटेलाइट से रास्ता पूछती है और टारगेट के बिल्कुल करीब पहुंचने पर इसका अपना एक्टिव रडार सीकर ऑन हो जाता है. रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, इसका हिट रेट 90% के करीब है.
क्या ईरान इस मिसाइल को सिर्फ समंदर में जहाजों से ही दाग सकता है?
नहीं, इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी मोबिलिटी है. ईरान इसे अपने युद्धपोतों से तो दाग ही सकता है, लेकिन इसे तटीय इलाकों में छिपे ट्रकों और लड़ाकू विमानों से भी दागा जा सकता है. पहाड़ों और तटीय गुफाओं में छिपे मिसाइल वाले ट्रकों को ढूंढकर नष्ट करना अमेरिकी वायुसेना के लिए भूसे के ढेर में सुई ढूंढने जैसा होगा.
ऐसे वक्त में चीन खुलेआम ईरान को इतना घातक हथियार क्यों दे रहा है?
इसके पीछे चीन की बहुत गहरी जियोपॉलिटिक्स है. चीन चाहता है कि अमेरिका मिडिल ईस्ट के संघर्ष में ही उलझा रहे. अगर अमेरिका ईरान के साथ युद्ध में फंसा रहेगा, तो उसका ध्यान इंडो-पैसिफिक और ताइवान से हट जाएगा. इसके अलावा, चीन को बिना लड़े अपनी मिसाइल की टेस्टिंग अमेरिकी नेवी के हथियारों के खिलाफ करने का मौका मिल रहा है.
क्या ईरान पर संयुक्त राष्ट्र का हथियार खरीदने पर प्रतिबंध नहीं लगा है?
लगा था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में अब इसकी कोई खास अहमियत नहीं बची है. 2015 की न्यूक्लियर डील के तहत ईरान पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी गई थी, जिन्हें हाल ही में सितंबर 2025 में फिर से लागू कर दिया गया. लेकिन चीन और रूस ने खुलेआम कह दिया है कि वे अमेरिका के इन एकतरफा प्रतिबंधों को नहीं मानते.
क्या इस मिसाइल के आने के बाद अमेरिका, ईरान पर हमला करने से डरेगा?
सैन्य भाषा में इसे डिटरेंट और एंटी एक्सेस, एंटी डिनायल A2/AD रणनीति कहते हैं. अमेरिका की दुनिया में सबसे ताकतवर सेना है, इसलिए वह डरेगा तो नहीं, लेकिन वह हमला करने से पहले 100 बार जरूर सोचेगा. एक अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर की कीमत 13 अरब डॉलर यानी एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा होती है. अगर ईरान की एक मिसाइल भी गलती से उस कैरियर पर गिर गई और अमेरिकियों की जान गई, तो यह अमेरिका के लिए किसी बुरे सपने जैसा होगा.
क्या इस डील से युद्ध का खतरा और बढ़ गया है?
बिल्कुल. मिडिल ईस्ट अभी एक बारूद के ढेर पर बैठा है, और यह मिसाइल डील उसमें चिंगारी का काम कर सकती है. अगर ये मिसाइलें ईरान के तटों पर तैनात हो जाती हैं, तो फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाला अमेरिकी नेवी का हर जहाज हर पल ईरान के निशाने पर होगा. यह शतरंज का ऐसा खेल बन गया है जहां एक गलत चाल से सीधा बड़ा युद्ध छिड़ सकता है.
