ईरान युद्ध शुरू होने के बाद होर्मुज स्ट्रेट से तेल और पेट्रोकेमिकल सप्लाई में भारी रुकावट आई है. होर्मुज के बंद होने से तेल और गैस की कीमतें तो बढ़ी ही हैं, अब प्लास्टिक और पॉलिमर की कीमतों में भी भारी उछाल आया है. सप्लाई में रुकावट की वजह से केमिकल की किल्लत हुई है और प्लास्टिक की कीमतें लगभग चार सालों के उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं.
प्लास्टिक और पॉलिमर का इस्तेमाल ऑटो पार्ट्स से लेकर खिलौनों तक हर चीज में होता है. रैबोबैंक के अनुसार, हर साल करीब 20 से 25 अरब डॉलर के पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट होर्मुज स्ट्रेट से गुजरते हैं. इससे यह साफ होता है कि अगर सप्लाई रुकी रही तो उत्पादक बढ़ी हुई लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डालेंगे.
केमिकल मार्केट एनालिटिक्स (OPIS) के जोएल मोरालेस ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बात करते हुए कहा, ‘मध्य पूर्व से आयात करने वाला लगभग हर देश अपना एक बड़ा सप्लायर खो चुका है. अब इन देशों को बेहद ऊंची कीमतों पर वैकल्पिक रेजिन की तलाश करनी पड़ रही है.’
मध्य-पूर्व से ही लगभग पूरी दुनिया को होती है पॉलिएथिलीन की सप्लाई
2025 में वैश्विक पॉलीएथिलीन निर्यात में मध्य पूर्व की हिस्सेदारी 40% से अधिक थी, जिसमें सऊदी अरब प्रमुख था. मध्य-पूर्व उत्तरी अमेरिका को छोड़कर दुनिया के लगभग हर हिस्से में आपूर्ति करता है.
मध्य पूर्व में संघर्ष शुरू होने के बाद से तेल और गैस की तरह ही पॉलीएथिलीन (PE) और पॉलीप्रोपाइलीन (PP) जैसे प्लास्टिक की कीमतों में तेजी से उछाल आया है.
अमेरिका स्थित कंपनी डाउ (Dow) के सीईओ जिम फिटरलिंग ने कहा, ‘वैश्विक लॉजिस्टिक्स अनिश्चित हो गई है, और पॉलीएथिलीन की सप्लाई का लगभग 50% हिस्सा या तो बंद है, सीमित है या प्रभावित हो रहा है.’
फरवरी 2026 के अंत से, जब मध्य पूर्व संघर्ष शुरू हुआ, डालियान कमोडिटी एक्सचेंज पर पॉलीएथिलीन की कीमतें करीब 37% और पॉलीप्रोपाइलीन की कीमतें 38% से अधिक बढ़ चुकी हैं.
विश्लेषकों के अनुसार, अगर होर्मुज स्ट्रेट बंद होता है तो वैश्विक नेफ्था निर्यात का लगभग 12 लाख बैरल प्रतिदिन प्रभावित हो सकता है, जिससे पेट्रोकेमिकल उत्पादन के लिए कच्चे माल की उपलब्धता और कम हो जाएगी.
एलएसईजी डेटा के मुताबिक, एशिया में नेफ्था रिफाइनिंग मार्जिन, जो पहले करीब 108 डॉलर प्रति टन था, अब ब्रेंट क्रूड के ऊपर 400 डॉलर प्रति टन से अधिक हो गया है, यानी इसमें तीन गुना से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है.
सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल है भारत
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ मक्सिम सोनिन ने कहा कि कीमतों में उछाल से सबसे अधिक एशिया प्रभावित हो रहा क्योंकि यहां के देश प्लास्टिक उत्पादन के लिए नेफ्था पर काफी निर्भर हैं.
जापान, दक्षिण कोरिया और भारत जैसे देश आयातित कच्चे तेल और पेट्रोकेमिकल्स पर निर्भरता के कारण सबसे अधिक प्रभावित हैं.
कई कंपनियां अब बढ़ी हुई लागत उपभोक्ताओं पर डाल रही हैं. सेलानेज और डॉउ जैसी अमेरिकी कंपनियों ने कीमतें बढ़ा दी हैं. भारत की प्रमुख बोतलबंद पानी कंपनी बिसलेरी ने भी कीमतों में 11% की वृद्धि की है, जिससे उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ा है.
विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती लागत के कारण गैर-जरूरी वस्तुओं की मांग पर भी असर पड़ सकता है और महंगाई का दबाव बढ़ सकता है. लंबे समय में प्लास्टिक उद्योग में बड़े और कम लागत वाले उत्पादकों का दबदबा बढ़ने की संभावना है.
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