IPS Deputation in CAPF: केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) में नॉन फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेडेशन (एनएफयू) और आईपीएस अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को लेकर विवाद एक बार फिर गहरा गया है. इन दोनों मसलों पर सुप्रीम कोर्ट का मई 2025 में स्पष्ट आदेश आ चुका है, बावजूद इसके अब तक इस फैसले को लागू नहीं किया गया है, जिससे अधिकारियों में नाराजगी और असंतोष बढ़ता जा रहा है. इस मुद्दे को लेकर अब मामला अवमानना याचिका तक पहुंच चुका है.
सीआरपीएफ के अतिरिक्त महानिदेशक (सेनानिवृत्त) एचआर सिंह के अनुसार, यह पूरा विवाद 6वें वेतन आयोग की सिफारिशों से शुरू हुआ था. 2006 में आयोग ने केंद्र सरकार की विभिन्न ग्रुप की सर्विस के लिए एनएफयू की बात रखी थी. इसका उद्देश्य यह था कि जिन अधिकारियों को समय पर प्रमोशन नहीं मिल पाता, उन्हें कम से कम वेतन और पद के स्तर पर अगले रैंक का लाभ दिया जाए, ताकि सेवा में ठहराव को दूर किया जा सके. सरकार ने इस सिफारिश को स्वीकार करते हुए लगभग 52 सेवाओं में इसे लागू भी किया.
हालांकि, सीएपीएफ के अंतर्गत आने वाली बीएसएफ, सीआरपीएफ, आईटीबीपी, सीआईएसएफ और एसएसबी को इसके दायरे से बाहर रखा गया. यही वह बिंदु था, जहां से असंतोष की शुरुआत हुई. सीएपीएफ अधिकारियों का कहना है कि वे भी ऑर्गनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस का हिस्सा हैं, फिर उन्हें इस लाभ से वंचित क्यों रखा गया. 2006 से 2012 के बीच सीएपीएफ अधिकारियों ने गृह मंत्रालय और संबंधित विभागों को कई बार प्रतिनिधित्व दिया, लेकिन हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगी. अंततः मजबूर होकर उन्हें कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा.
कोर्ट से सुनवाई में किसके पक्ष में आया फैसला
- दिल्ली हाई कोर्ट में लंबी सुनवाई के बाद फैसला सीएपीएफ अधिकारियों के पक्ष में आया. लेकिन सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई.
- करीब 13-14 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 23 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने सीएपीएफ अधिकारियों के पक्ष में एक व्यापक और निर्णायक फैसला सुनाया.
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सीएपीएफ अधिकारी भी ऑर्गनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस के अंतर्गत आते हैं और उन्हें एनएफयू का लाभ मिलना चाहिए.
- सीआरपीएफ रिटायर्ड एडीजी एचआर सिंह का आरोप सरकार ने इस फैसले को लागू करने में अनावश्यक देरी की.
- यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए छह महीने के समय सीमा के भीतर भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. इस स्थिति से निराश होकर अधिकारियों ने अब सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर कर दी है.
- सीएपीएफ अधिकारियों का कहना है कि सरकार अब एक नया विधेयक लाने की तैयारी कर रही है, जिसका उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निष्प्रभावी करना हो सकता है.
- उनका मानना है कि यह कदम न्यायपालिका के आदेश की भावना के खिलाफ है और इससे न केवल अधिकारियों का मनोबल गिरेगा, बल्कि सुरक्षा बलों की कार्यक्षमता पर भी असर पड़ेगा.
डोमेन एक्सपर्टीज के बावजूद नहीं मिल रहे मौके
बीएसएफ में अतिरिक्त महानिदेशक रहे एमएस मल्ही के अनुसार, सीएपीएफ बलों ने वर्षों में अपनी डोमेन एक्सपर्टीज विकसित की है. उदाहरण के तौर पर बीएसएफ पाकिस्तान और बांग्लादेश सीमा पर सीमा प्रबंधन की जिम्मेदारी निभाता है. इसके अलावा, कश्मीर से लेकर नॉर्थ ईस्ट और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों तक काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशनों में इन बलों की अहम भूमिका रही है.
युद्ध जैसी परिस्थितियों में भी सीएपीएफ की भूमिका कम नहीं है. उन्होंने हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर का उदाहरण देते हुए कहा कि बीएसएफ के कम से कम 80 बॉर्डर आउट पोस्ट (BOP) इस ऑपरेशन से प्रभावित हुए थे. ऐसे में यह सवाल उठता है कि जब सीएपीएफ अधिकारी इतने महत्वपूर्ण और संवेदनशील कार्यों में लगे हैं, तो उन्हें नेतृत्व के अवसर और वित्तीय लाभ से क्यों वंचित रखा जा रहा है.
- रिटायर्ड एडीजी एमएस मल्ही के अनुसार, एक और बड़ा मुद्दा नेतृत्व को लेकर भी है. सीएपीएफ के आईजी, एडीजीस, डीजीस जैसे पदों पर अक्सर आईपीएस अधिकारियों की नियुक्ति की जाती है.
- ये आईपीएस अधिकारी इन बलों की जमीनी हकीकत और विशेष परिस्थितियों से उतने परिचित नहीं होते, जितने कि खुद सीएपीएफ कैडर के अधिकारी होते हैं.
- रिटायर्ड एडीजी एमएस मल्ही का मानना है कि इससे न केवल कार्यकुशलता प्रभावित होती है, बल्कि कैडर अधिकारियों के करियर ग्रोथ पर भी असर पड़ता है.
- उनका कहना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेटर एण्ड स्प्रिट में लागू किया जाता है, तो इससे न केवल न्याय सुनिश्चित होगा, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी.
- उनका मानना है कि बेहतर मनोबल और स्पष्ट करियर प्रगति से सुरक्षाबलों की ऑपरेशनल एफिशिएंसी में भी सुधार होगा.
एनएफयू क्या होता है?
एनएफयू (नॉन-फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेडेशन) एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें किसी बैच का एक आईएएस (इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस) अफसर जब ऊंचे पे-स्केल (जैसे जॉइंट सेक्रेटरी) तक पहुंचता है, तो उसी बैच के बाकी ऑल इंडिया सर्विसेज के अंतर्ग आने वाल आईएएस, आईपीएस, आईएफएस अफसरों को भी बिना पद बदले वही ऊंचा वेतनमान मिल जाता है. यानी उनका पोस्ट वही रहता है, लेकिन सैलरी और ग्रेड बढ़ जाता है. इसका मकसद फाइनेंशियल असमानता को कम करना होता है.
सीएपीएफ अफसरों की मांग क्या है?
सीएपीएफ यानी सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, सीआईएसएफ और एसएसबी के ग्रुप ए अफसरों की मांग है कि उन्हें भी आईएएस और आईपीएस की तरह एनएफयू का लाभ मिले. उनका कहना है कि वे भी समान रिस्क, जिम्मेदारी और कठिन सर्विस कंडीशंस में काम करते हैं, लेकिन सैलरी, प्रमोशन और करियर ग्रोथ में पीछे रह जाते हैं. कई बार वे आईपीएस अफसरों के अंडर काम करते हैं, जिससे असमानता और साफ नजर आती है.
दोनों मु्द्दों को लेकर विवाद क्यों बढ़ा?
यह विवाद इसलिए बढ़ा क्योंकि सीएपीएफ अफसर लंबे समय से इसे डिस्क्रिमिनेशन मानते हैं. उनका कहना है कि एक ही बैच के आईपीएस अफसर जल्दी प्रमोशन और बेहतर पे-स्केल हासिल कर लेते हैं, जबकि वे पीछे रह जाते हैं. इससे उनका मनोबल और रिटेंशन प्रभावित होती है. लंबे समय तक इस मुद्दे का समाधान नहीं होने से यह मामला और ज्यादा गंभीर हो गई है.
असली मुद्दा क्या है?
इस विवाद का असली मुद्दा सिर्फ सैलरी नहीं है, बल्कि समान दर्जे, करियर प्रोग्रेशन और इक्वल ट्रीटमेंट से जुड़ा है. सीएपीएफ अफसर चाहते हैं कि उन्हें भी ऑल इंडिया सर्विसेज के बराबर सम्मान और अवसर मिलें. वहीं, सरकार इसे पॉलिसी (नीति) और एडमिनिस्ट्रेटिव स्ट्रक्चर (प्रशासनिक ढांचे) के नजरिए से देख रही है, इसलिए यह मामला जटिल बना हुआ है.
