चुनाव आयोग ने बीते रविवार को पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की घोषणा कर दी। चुनाव की घोषणा के साथ अलग-अलग दलों ने अपने उम्मीदवार भी घोषित करने शुरू कर दिए हैं। सबसे ज्यादा चर्चा पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव की हो रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र भी जारी कर दिया। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इस पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, पीयूष पंत, अवधेश कुमार, अजय सेतिया और अनुराग वर्मा मौजूद रहे।
रामकृपाल सिंह: बंगाल में चुनावी हिंसा की सियासत सिद्धार्थ शंकर रे के जमाने से ही रही है। हर चरण के चुनाव में बंगाल में चुनावी हिंसा की खबरें आती हैं। चुनाव आयोग ने दो चरण में मतदान की घोषणा करके अच्छी पहल की है। मुझे उम्मीद है कि पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार शायद कम हिंसा की खबरें आएं। भाजपा का पश्चिम बंगाल में दो राष्ट्रीय पार्टियों कांग्रेस और माकपा को विधानसभा चुनाव में जीरो पर लाना पिछले चुनाव में भाजपा की बहुत बड़ी सफलता है।
अजय सेतिया: चुनाव में हर पार्टी जब चुनाव लड़ती है तो वह चाहती है कि वह सत्ता तक पहुंचे। 2021 के मुकाबले इस बार ज्यादा कड़ा मुकाबला है। बंगाल में भाजपा 77 तक पहुंची है, तो आगे भी इसमें इजाफा होगा। 30 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले प्रदेश में ध्रुवीकरण का मुद्दा तो होगा ही। जहां तक हिंसा पर काबू पाने की बात है, तो चुनाव आयोग इस पर अपने ढंग से काम कर रहा है।
पीयूष पंत: अगर आप लंबे समय तक शासन में रहते हैं, तो भारतीय व्यवस्था भ्रष्टाचार का शिकार होती है। यह हमें मानना चाहिए। चुनाव में यह एक मुद्दा होता है। लगातार एक ही पार्टी की सत्ता रहती है, तो व्यवस्था लेथार्जिक भी हो जाती है। यह सभी सरकारों को झेलना पड़ता है। इसका सरकारें शिकार भी होती हैं। कई मामलों में सरकारें इसे परश्रय भी देती हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।
अनुराग वर्मा: ममता बनर्जी के लिए मुस्लिम और महिलाओं का समीकरण बहुत कारगर रहा है। लेफ्ट और कांग्रेस भी इस वोट बैंक पर नजर गड़ाए हुए हैं। लेकिन ममता का यह वोट बैंक इंटैक्ट है। इस बार कांग्रेस की बातों से लग रहा है कि उसकी कोशिश पूरी गंभीरता से यह चुनाव लड़ने की है। इस चुनाव में ओवैसी और हुमायूं कबीर ममता को कितना डेंट करेंगे, यह देखना होगा।
अवधेश कुमार: भाजपा का स्वाभाविक रूप से सपना होना चाहिए कि पश्चिम बंगाल में उसका शासन हो। हिंदू महासभा से लेकर जनसंघ और आरएसएस तक का यहां लंबा इतिहास रहा है। ममता बनर्जी ने बहुत रणनीतिक रूप से एसआईआर को इस चुनाव में मुद्दा बनाया है। ममता ने इसे सबसे बड़ा मुद्दा बनाया है। उन्होंने भाजपा और चुनाव आयोग की मिलीभगत को मुद्दा बनाया है। 2021 में दोनों पार्टियों के बीच वोट का अंतर करीब 60 लाख था। इस बार एसआईआर में जो वोट कटे हैं, वे करीब 63 लाख हैं।
विनोद अग्निहोत्री: बंगाल चुनाव की तस्वीर लगभग वैसी ही है जैसी 2021 के विधानसभा चुनाव में थी। परिस्थितियों में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आया है। एसआईआर को मैंने कभी चुनावी मुद्दा नहीं माना है, क्योंकि जिसका नाम वोटर लिस्ट में आ गया, उसके लिए यह चुनावी मुद्दा नहीं होगा, और जिसका नाम कट गया, वह चुनाव में वोट ही नहीं डाल सकेगा, तो वह चुनाव में प्रभाव कैसे डालेगा। जो वोट कटेंगे, अगर हम यह मानकर चलें कि सारे वोट ममता बनर्जी के हैं, तो यह गलत होगा।
