नई दिल्ली: शादी के बाद हुए विवादों में पति के गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस) से बचने के लिए आय कम दिखाने या नौकरी छोड़ने की रणनीति पर दिल्ली हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है. अदालत ने साफ कहा है कि कोई भी पति अपनी पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बचने के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) का सहारा नहीं ले सकता.
यह टिप्पणी जस्टिस अमित महाजन की अदालत ने एक ऐसे मामले में की, जहां पति ने दावा किया था कि उसने नौकरी से जल्दी रिटायरमेंट ले लिया है और अब वह खेती कर रहा है, जिससे उसकी आय बहुत कम है. उसने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे पत्नी और बच्चों को मासिक गुजारा भत्ता देने के निर्देश दिए गए थे.
पति ने दी क्या दलील?
पति की दलील थी कि फैमिली कोर्ट ने उसकी आय का गलत आकलन किया है और उसकी आर्थिक स्थिति को वास्तविकता से ज्यादा मजबूत मान लिया है. उसने कहा कि वह अब केवल पेंशन और खेती से होने वाली सीमित आय पर निर्भर है, इसलिए उससे ज्यादा रकम देने की उम्मीद करना उचित नहीं है. हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि यह मानना कठिन है कि कोई व्यक्ति बिना किसी वैकल्पिक आय स्रोत के अपनी स्थिर और अच्छी-खासी सैलरी वाली नौकरी छोड़ देगा. कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि कई मामलों में देखा गया है कि पति अपनी वास्तविक आय छिपाने या कम दिखाने के लिए जानबूझकर नौकरी छोड़ देते हैं या आय के स्रोतों को कमतर बताते हैं.
महिलाएं भी मेंटेनेंस के लिए छोड़ देती हैं नौकरी: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने कहा कि जिस तरह कुछ मामलों में महिलाएं मेंटेनेंस पाने के लिए अपनी नौकरी छोड़ देती हैं, उसी तरह कई योग्य पुरुष भी अपनी आय कम दिखाने के लिए नौकरी छोड़ना एक रणनीति के तौर पर अपनाते हैं. ऐसे मामलों में अदालत को वास्तविक कमाई की क्षमता के आधार पर अनुमान लगाकर मेंटेनेंस तय करने का अधिकार है. कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि एक स्वस्थ और सक्षम व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह अपनी पूरी क्षमता के अनुसार कमाए और अपने परिवार का भरण-पोषण करे. सिर्फ यह कह देना कि अब उसके पास सीमित आय है, उसे इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं कर सकता.
क्या दिया था फैमिली कोर्ट ने आदेश?
इस मामले में फैमिली कोर्ट ने पहले पति को उसकी पत्नी और दो बच्चों को 8,300-8,300 रुपये मासिक देने का आदेश दिया था. बाद में बेटे के बालिग होने के बाद पत्नी और बेटी के लिए यह राशि बढ़ाकर 10,000-10,000 रुपये प्रति माह कर दी गई थी. साथ ही हर दो साल में इस रकम में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी का निर्देश भी दिया गया था.
पति ने हाईकोर्ट में यह भी तर्क दिया कि उसकी पत्नी के पास किराए से आय का स्वतंत्र स्रोत है और वह खुद अपनी जरूरतें पूरी कर सकती है. लेकिन अदालत ने पाया कि इस दावे के समर्थन में कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया. रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि पत्नी की आय बहुत सीमित है, जो उसके और उसके बच्चों के खर्च के लिए पर्याप्त नहीं है.
मेंटेनेंस का अधिकार खत्म नहीं होता है: कोर्ट
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि पति-पत्नी अलग रह रहे हैं, तब भी पत्नी का मेंटेनेंस पाने का अधिकार खत्म नहीं होता, खासकर तब जब वह उत्पीड़न और क्रूरता के आरोप लगा रही हो. हालांकि अदालत ने फैमिली कोर्ट के उस हिस्से पर कुछ आपत्ति जताई, जिसमें पति को अपनी मां की आर्थिक सहायता करने का निर्देश दिया गया था, लेकिन कुल मेंटेनेंस राशि को उचित मानते हुए उसमें कोई बदलाव करने से इनकार कर दिया.
