पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान से ठीक पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक ऐसा दांव खेला है, जिसने राज्य के लाखों सरकारी कर्मचारियों के चेहरे पर मुस्कान ला दी है. दशकों से चला आ रहा ‘ROPA एरियर’ का विवाद अब सुलझता दिख रहा है. यह मामला सिर्फ पैसों का नहीं, बल्कि कर्मचारियों के हक और सम्मान की लंबी लड़ाई का है. आखिर ROPA एरियर है क्या और दूसरे राज्यों से यह अलग कैसे?
ROPA एरियर आखिर है क्या बला?
ROPA का मतलब होता है रिवीजन ऑफ पे एंड अलाउंस यानी पेमेंट और भत्तों में सुधार. सरकार हर कुछ साल में महंगाई और वक्त को देखते हुए कर्मचारियों की सैलरी और भत्तों के नियम बदलती है. बंगाल में 2009 के नियमों के तहत कर्मचारियों का कुछ पिछला पैसा जैसे महंगाई भत्ता यानी DA बकाया रह गया था. इसी पुराने बकाया पैसे को ROPA एरियर कहा जा रहा है.
कर्मचारी अचानक इतने खुश क्यों हो गए हैं?
खुशी की वजह यह है कि यह पैसा सालों से अटका हुआ था. सरकार और कर्मचारियों के बीच इसे लेकर लंबी कानूनी लड़ाई चली. अब जब मुख्यमंत्री ने इस पैसे को देने का आधिकारिक ऐलान कर दिया है, तो कर्मचारियों को लग रहा है कि उनकी बरसों की तपस्या सफल हो गई है और अब उनके बैंक खातों में मोटी रकम आएगी.
क्या यह दूसरे राज्यों के कर्मचारियों के एरियर से अलग है?
हां, यह काफी अलग है. ज्यादातर राज्यों में केंद्र सरकार के साथ-साथ ही DA बढ़ा दिया जाता है, जिससे वहां बड़ा एरियर जमा नहीं होता. लेकिन बंगाल में सालों तक केंद्र और राज्य के DA के बीच एक बड़ा गैप बना रहा. इस वजह से यहां का एरियर दूसरे राज्यों के मुकाबले बहुत ज्यादा बढ़ गया है, जिसे चुकाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती थी.
इस फैसले से कितने लोगों की जेब में पैसा आएगा?
इस फैसले का फायदा बहुत बड़ा है. राज्य सरकार के करीब 12 लाख लोग इससे सीधे जुड़ेंगे. इसमें केवल दफ्तरों में काम करने वाले बाबू ही नहीं, बल्कि सरकारी स्कूलों के शिक्षक, कॉलेज के प्रोफेसर, पेंशन पाने वाले बुजुर्ग और पंचायतों व नगरपालिकाओं में काम करने वाले छोटे कर्मचारी भी शामिल हैं.
सैलरी पर इसका कितना बड़ा असर पड़ेगा?
यह असर काफी तगड़ा होने वाला है. चूंकि यह बकाया पैसा 2008-2009 के समय से जुड़ा है, इसलिए कई कर्मचारियों को एकमुश्त अच्छी-खासी रकम मिलेगी. किसी के लिए यह लाखों में हो सकती है, तो किसी के लिए हजारों में. इससे कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी और वे अपने रुके हुए पारिवारिक काम पूरे कर सकेंगे.
क्या ममता सरकार ने यह फैसला अपनी मर्जी से लिया है?
मर्जी के साथ-साथ इसमें कानून का भी बड़ा हाथ है. फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एक कड़ा फैसला सुनाया था. कोर्ट ने साफ कहा था कि DA कर्मचारियों का हक है, यह कोई भीख नहीं है. सरकार पैसे की कमी का बहाना बनाकर इसे नहीं रोक सकती. कोर्ट के इसी दबाव के बाद सरकार ने यह कदम उठाया है.
विपक्ष इसे चुनावी लॉलीपॉप क्यों कह रहा है?
विपक्ष का तर्क है कि अगर सरकार को पैसा देना ही था, तो सालों तक कोर्ट में लड़ाई क्यों लड़ी? चुनाव की तारीखों के ऐलान से ठीक 5 मिनट पहले यह घोषणा करना सवाल खड़े करता है. विपक्ष का कहना है कि सरकार के पास फंड नहीं है और वह सिर्फ वोट पाने के लिए कागज पर वादे कर रही है.
क्या सरकार के पास इतने पैसे हैं कि वह सबका बकाया चुका सके?
यही सबसे बड़ा सवाल है. बंगाल की आर्थिक स्थिति पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबी है. लाखों कर्मचारियों का सालों का बकाया चुकाने के लिए हजारों करोड़ रुपयों की जरूरत होगी. सरकार का कहना है कि वह बजट में इसका इंतजाम कर लेगी, लेकिन जानकार इसे आर्थिक मोर्चे पर एक बहुत बड़ी चुनौती मान रहे हैं.
क्या यह पैसा एक साथ मिल जाएगा या किस्तों में?
सरकार की योजना इसे किस्तों में देने की है. एक साथ सारा पैसा देना सरकारी खजाने के लिए नामुमकिन जैसा है. वित्त विभाग की अधिसूचना के मुताबिक, मार्च 2026 से इसकी शुरुआत होगी और संभव है कि अगले 2-3 सालों में इसे अलग-अलग चरणों में कर्मचारियों के खातों में भेजा जाए.
क्या इस फैसले का असर बंगाल के चुनाव पर पड़ेगा?
बिल्कुल पड़ेगा. सरकारी कर्मचारी किसी भी चुनाव में एक बड़ा और प्रभावशाली वोट बैंक होते हैं. उनके परिवार और उनसे जुड़े लोग लाखों की संख्या में हैं. अगर उन्हें विश्वास हो गया कि पैसा वाकई मिलने वाला है, तो यह ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के लिए एक ‘मास्टरस्ट्रोक’ साबित हो सकता है.
पेंशनधारकों को इससे क्या मिलेगा?
बुजुर्ग पेंशनर्स के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है. उनकी पेंशन भी इसी ROPA 2009 के नियमों से जुड़ी है. एरियर मिलने का मतलब है कि उन्हें अपनी पिछली रुकी हुई पेंशन का हिस्सा मिलेगा. इस उम्र में जब दवाइयों और देखभाल का खर्चा बढ़ जाता है, तब यह पैसा उनके लिए बहुत बड़ी सहारा बनेगा.
शिक्षकों को इसमें क्यों शामिल किया गया है?
पश्चिम बंगाल में प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों के शिक्षकों की संख्या बहुत ज्यादा है. वे भी राज्य सरकार के नियमों के तहत ही सैलरी पाते हैं. शिक्षकों का DA विवाद बहुत पुराना है और वे कई बार सड़कों पर प्रदर्शन भी कर चुके हैं. उन्हें शामिल करना सरकार की मजबूरी भी थी और चुनावी जरूरत भी.
क्या पंचायत और नगर पालिका कर्मचारियों को भी फायदा होगा?
हां, मुख्यमंत्री ने साफ किया है कि पंचायतों और नगर निकायों जैसे ग्रांट-इन-एड संस्थानों के कर्मचारियों को भी इसका लाभ मिलेगा. अक्सर इन छोटे निकायों के कर्मचारियों को बड़े विभागों के मुकाबले बाद में लाभ मिलता है, लेकिन इस बार उन्हें भी मुख्य धारा के साथ रखा गया है.
क्या केंद्र सरकार के कर्मचारियों को भी ऐसा एरियर मिलता है?
नहीं, केंद्र सरकार आमतौर पर हर 6 महीने में महंगाई के हिसाब से DA बढ़ा देती है, इसलिए वहां सालों का बकाया जमा नहीं होता. अगर कभी देरी होती भी है, तो वह कुछ महीनों की होती है जिसका भुगतान तुरंत कर दिया जाता है. बंगाल जैसी स्थिति केंद्र में कभी पैदा नहीं हुई.
क्या इस फैसले से राज्य में महंगाई बढ़ सकती है?
जब बाजार में एक साथ बहुत सारा पैसा आता है, तो चीजों की मांग बढ़ती है और इससे महंगाई पर असर पड़ सकता है. 12 लाख लोगों के पास जब एरियर का पैसा पहुंचेगा, तो वे खरीदारी करेंगे. इससे राज्य की अर्थव्यवस्था में तेजी तो आएगी, लेकिन स्थानीय स्तर पर चीजों के दाम थोड़े बढ़ सकते हैं.
अगर सरकार बदल गई, तो क्या यह एरियर मिलेगा?
सरकारी नोटिफिकेशन एक आधिकारिक दस्तावेज होता है. अगर भविष्य में सरकार बदलती भी है, तो भी आने वाली सरकार के लिए इस आदेश को पलटना आसान नहीं होगा, खासकर तब जब सुप्रीम कोर्ट का निर्देश पीछे खड़ा हो. कर्मचारियों के लिए यह एक सुरक्षा कवच की तरह है.
