Fri. Feb 13th, 2026

Sarojini Naidu Birth Anniversary: कौन थीं भारत कोकिला जिन्होंने आजादी के लिए सबकुछ दांव पर लगा दिया? | Sarojini Naidu Biography in Hindi: जानिए सरोजिनी नायडू के जीवन का वह किस्सा जब तिरंगे के लिए महिलाओं ने साड़ियां फाड़ दी थीं, पढ़ें उनकी अनसुनी कहानी

Sarojini Naidu History3 2026 02 2eaea088fd7792ea54363e30122f8dca

नई दिल्ली: हिंदुस्तान को अंग्रेजों से आजादी तो मिल चुकी थी. लेकिन असल में देश की आधी आबादी के साथ न्याय करना और उसे ताकत देना नए भारत के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी. उस दौर के समाज में पर्दा प्रथा और बाल विवाह जैसी तमाम कुरीतियां फैली हुई थीं. ये बुराइयां समाज की जड़ों में बहुत गहराई तक समाई थीं. ऐसे में महिलाओं के समान अधिकार और उनके मताधिकार के बारे में सोचना भी बहुत मुश्किल काम था. उस कठिन दौर में नामुमकिन को मुमकिन बनाने का बीड़ा सरोजिनी नायडू ने उठाया था. उन्होंने न केवल महिलाओं को घर की दहलीज से बाहर निकाला बल्कि उन्हें राजनीति की मुख्यधारा में भी शामिल किया. सरोजिनी नायडू एक ऐसी शख्सियत थीं जिन्होंने अपनी आवाज और कलम के दम पर ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी. उनके नेतृत्व में भारतीय महिलाओं ने वो जज्बा दिखाया जिसकी मिसाल आज भी पूरी दुनिया में दी जाती है.

सरोजिनी नायडू: हैदराबाद से लंदन तक का सफर कैसा रहा?

सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में हुआ था. शुरुआत में उनका नाम सरोजिनी चट्टोपाध्याय था. वे बचपन से ही बहुत कुशाग्र बुद्धि की थीं. मद्रास से अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद वे आगे की शिक्षा के लिए लंदन और फिर कैंब्रिज चली गईं. इंग्लैंड प्रवास के दौरान उन्होंने महिलाओं के वोटिंग अधिकार से जुड़े आंदोलनों को बहुत करीब से देखा. वहां के अनुभवों ने उनके मन में भारत की आजादी और महिलाओं की स्थिति को लेकर एक नई सोच पैदा की. 1898 में वे वापस हैदराबाद लौट आईं. उसी साल उन्होंने गोविंदराजुलु नायडू से विवाह किया. इसके बाद उनके नाम के साथ नायडू सरनेम जुड़ गया. यह विवाह उस समय के हिसाब से बहुत क्रांतिकारी कदम था क्योंकि यह एक अंतरजातीय विवाह था.

सरोजिनी नायडू: कविता के संसार से आजादी की जंग तक कैसे पहुंचीं?

सरोजिनी नायडू की पहचान सिर्फ एक राजनेता की नहीं थी बल्कि वे एक उच्च कोटि की कवयित्री भी थीं. उनका पहला काव्य संग्रह ‘द गोल्डन थ्रेशोल्ड’ 1905 में प्रकाशित हुआ था. इसके बाद अगले 12 सालों तक वे लगातार बहुत ही मनमोहक कविताएं लिखती रहीं. साल 1912 में उनकी कविताओं का दूसरा खंड ‘द बर्ड ऑफ टाइम’ आया. 1917 में ‘द ब्रोकन विंग्स’ के प्रकाशन के बाद उनके काव्य जीवन में थोड़ा ठहराव आ गया. इसका कारण यह था कि उनका पूरा ध्यान अब देश के स्वतंत्रता आंदोलन की ओर मुड़ चुका था. महात्मा गांधी ने उनकी रचनाओं में रंग, लय और कल्पना का अनूठा संगम देखा. उनकी जादुई आवाज और शब्दों के चयन की वजह से ही गांधी जी ने उन्हें ‘नाइटिंगेल ऑफ इंडिया’ यानी ‘भारत कोकिला’ का खिताब दिया था.

सरोजिनी नायडू (फाइल फोटो)

तिरंगे की शान के लिए महिलाओं ने क्या बलिदान दिया?

सरोजिनी नायडू से जुड़ा एक बेहद भावुक और प्रेरणादायक किस्सा राष्ट्रध्वज से जुड़ा है. 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने एक घटना का जिक्र किया था. उन्होंने बताया था कि एक बार बर्लिन में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान जब ध्वज परेड होनी थी, तब भारत का कोई आधिकारिक झंडा नहीं था. यह देश के लिए बहुत ही पीड़ा और अपमान का क्षण था. उस समय सरोजिनी नायडू के सुझाव पर भारतीय महिला प्रतिनिधियों ने अपनी साड़ियों की पट्टियां फाड़ दीं. उन पट्टियों को जोड़कर एक तिरंगा तैयार किया गया ताकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का अपमान न हो. यह घटना दिखाती है कि उस दौर की महिलाओं में देशप्रेम का जज्बा किस कदर भरा हुआ था.

सरोजिनी नायडू कैसे बनीं उत्तर प्रदेश की पहली महिला गवर्नर?

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सरोजिनी नायडू कांग्रेस की एक बहुत ही ताकतवर नेता बनकर उभरीं. जब महात्मा गांधी ने 1 अगस्त 1920 को असहयोग आंदोलन शुरू किया, तो वे इसमें पूरी ताकत से कूद पड़ीं. उन्होंने देशभर में सैकड़ों सभाओं को संबोधित किया. वे खासतौर पर महिलाओं की बुलंद आवाज बन चुकी थीं. उनकी सक्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1925 में वे कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी जाने वाली पहली भारतीय महिला बनीं. आजादी के बाद उन्हें संयुक्त प्रांत (जो अब उत्तर प्रदेश है) का पहला महिला राज्यपाल बनाया गया. उन्होंने अपने पूरे करियर में सिर्फ राजनीति नहीं की बल्कि महिलाओं की शिक्षा और उनकी आजादी के लिए जमीन पर काम किया.

पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ सरोजिनी नायडू (फाइल फोटो)

सरोजिनी नायडू: समाज की कुरीतियों के खिलाफ कितनी बड़ी थी उनकी लड़ाई?

सरोजिनी नायडू का मानना था कि किसी भी सभ्यता के आगे बढ़ने के लिए लैंगिक भेदभाव का खत्म होना बहुत जरूरी है. उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन के दौरान विधवाओं की शिक्षा और उनके पुनर्विवाह के लिए प्रस्ताव पारित कराने में अहम भूमिका निभाई. उन्होंने एनी बेसेंट के साथ मिलकर ‘महिला भारतीय संघ’ की स्थापना की थी. उनका नजरिया बहुत साफ था कि जब तक देश की आधी आबादी को समान अधिकार नहीं मिलेंगे, तब तक आजादी अधूरी है. उन्होंने वीर रस की अपनी कविताओं के जरिए देश के युवाओं और महिलाओं में वो जोश भरा कि लोग हंसते-हंसते जेल जाने को तैयार हो जाते थे. ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों की वजह से उन्हें खुद भी कई बार जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ा.

सरोजिनी नायडू: क्या आज के भारत में उनके विचार प्रासंगिक हैं?

आज जब हम 21वीं सदी के भारत की बात करते हैं, तो सरोजिनी नायडू के विचार और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं. वे एक ऐसा उदाहरण हैं जो साबित करता है कि नारी शक्ति कमजोर नहीं बल्कि सबसे बड़ी ताकत है. हर साल मनाया जाने वाला राष्ट्रीय महिला दिवस दरअसल उनके इसी अतुल्य योगदान की याद दिलाता है. उनकी कृतियां जैसे ‘द गोल्डन थ्रेशोल्ड’ आज भी साहित्य प्रेमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं. सरोजिनी नायडू ने समाज, राजनीति और साहित्य जगत में जो बदलाव के रास्ते दिखाए, वे आज भी भारत की विकास यात्रा को रोशन कर रहे हैं. उनकी कहानी हर उस महिला के लिए एक संदेश है जो अपने हक के लिए संघर्ष कर रही है.

By uttu

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *