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अप्रैल में ही गर्मी दम निकाल रही, मई-जून तो तबाही होंगे! कमजोर मानसून और सुपर अल नीनो, मौसम का ये कॉम्बो डेडली

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मई-जून तो तबाही होंगे… कमजोर मानसून और सुपर अल नीनो, मौसम का ये कॉम्बो डेडली!

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India Heatwave 2026: अप्रैल के 21 दिन गुजर चुके हैं और सूरज के तेवर देख कर रूह कांपने लगी है. उत्तर भारत से लेकर दक्षिण तक पारा 40 डिग्री सेल्सियस को पार कर चुका है. दिल्ली, राजस्थान और यूपी में लू के थपेड़ों ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है. मौसम विभाग (IMD) की ताजा रिपोर्ट्स और ग्लोबल क्लाइमेट मॉडल्स जो संकेत दे रहे हैं, वे बेहद डरावने हैं. इस साल केवल भीषण गर्मी ही नहीं, बल्कि ‘अल नीनो’ का एक ऐसा खतरनाक रूप सामने आने वाला है, जो मानसून को पूरी तरह से पटरी से उतार सकता है. अगर समय रहते तैयारी नहीं की गई, तो मई और जून का महीना वाकई तबाही लेकर आ सकता है. (All Photos : Reuters)

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इस साल अप्रैल में ही देश के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से 5 से 7 डिग्री ऊपर चल रहा है. मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तो बस शुरुआत है. आने वाले दिनों में हीटवेव (Heatwave) की फ्रीक्वेंसी और इंटेंसिटी दोनों बढ़ने वाली हैं. ओडिशा, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में पारा अभी से रिकॉर्ड तोड़ रहा है. शहरों में कंक्रीट के जंगलों ने ‘अर्बन हीट आइलैंड’ बना दिए हैं, जिससे रात का तापमान भी कम नहीं हो रहा. लू (Heat Wave) की मार इस बार इतनी जल्दी शुरू हुई है कि रबी की फसलों, खासकर गेहूं की पैदावार पर बुरा असर पड़ने की आशंका है.

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भारत के लिए सबसे बुरी खबर प्रशांत महासागर से आ रही है. यूनिवर्सिटी ऑफ हवाई के रिसर्चर्स ने एक नई स्टडी में चेतावनी दी है कि इस साल एक बेहद ताकतवर ‘अल नीनो’ (El Niño) दस्तक दे रहा है. यह अल नीनो सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म हो सकता है. इसे ‘सुपर अल नीनो’ की श्रेणी में रखा जा रहा है. जब भी प्रशांत महासागर का पानी इतना गर्म होता है, भारत में मानसून कमजोर पड़ जाता है. मौसम विभाग ने पहले ही संकेत दिया है कि इस साल मानसून सामान्य से कम यानी केवल 92% ही रह सकता है. यह पिछले 20 सालों का सबसे कम अनुमान है.

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आमतौर पर मानसून और अल नीनो की सटीक भविष्यवाणी करना बहुत मुश्किल होता है. लेकिन यूनिवर्सिटी ऑफ हवाई के वैज्ञानिकों ने ‘Wyrtki-CSLIM’ नाम का एक नया मॉडल तैयार किया है. यह मॉडल केवल समुद्र की सतह के तापमान और ऊंचाई के आधार पर 15 महीने पहले ही सटीक जानकारी दे देता है. इस मॉडल ने संकेत दिया है कि इस साल के अंत तक अल नीनो अपनी चरम सीमा पर होगा. इसका सीधा मतलब यह है कि मानसून के दूसरे भाग यानी अगस्त और सितंबर में बारिश की भारी कमी हो सकती है. यह किसानों के लिए किसी बड़ी आपदा से कम नहीं होगा.

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भारत की 70% से ज्यादा बारिश मानसून के चार महीनों (जून-सितंबर) में होती है. अगर मानसून कमजोर रहा, तो देश के 166 बड़े जलाशयों का जलस्तर तेजी से गिरेगा. फिलहाल केंद्रीय जल आयोग (CWC) के आंकड़े बताते हैं कि दक्षिण भारत के जलाशय अभी से संकट में हैं. कर्नाटक और तेलंगाना के बांधों में पानी 30% से भी नीचे चला गया है. उत्तर भारत में स्थिति थोड़ी बेहतर है, लेकिन भीषण गर्मी के कारण इवेपोरेशन (वाष्पीकरण) की दर बढ़ गई है. अगर जून में मानसून ने देरी की, तो पीने के पानी और बिजली उत्पादन दोनों पर संकट खड़ा हो जाएगा.

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इस बार गर्मी और कम बारिश का एक ऐसा डेडली कॉम्बो बन रहा है जिसे वैज्ञानिक ‘क्रिटिकल क्लाइमेट फेज’ कह रहे हैं. एक तरफ अल नीनो के कारण बादल नहीं बनेंगे, जिससे सूरज की किरणें सीधे धरती को तपाएंगी. दूसरी तरफ प्री-मानसून बारिश न होने से मिट्टी की नमी खत्म हो जाएगी. जब हवा में नमी ज्यादा हो और तापमान 45 डिग्री के पार जाए, तो इंसानी शरीर का कूलिंग सिस्टम फेल होने लगता है. इसे ‘वेट बल्ब टेम्परेचर’ की खतरनाक स्थिति कहते हैं. ऐसी स्थिति में लू लगने से होने वाली मौतों का आंकड़ा तेजी से बढ़ सकता है.

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सरकार और नीति निर्धारकों के लिए यह साल एक बड़ी परीक्षा होने वाला है. अच्छी बात यह है कि पिछले कुछ सालों में भारत ने जल संरक्षण और आपदा प्रबंधन में काफी सुधार किया है. मनरेगा के तहत बनाए गए हजारों तालाब और चेक डैम इस सूखे में जीवनदान साबित हो सकते हैं. हालांकि, खेती के लिए पानी का प्रबंधन सबसे बड़ी चुनौती होगी. एक्सपर्ट्स का कहना है कि किसानों को अब कम पानी वाली फसलों की ओर शिफ्ट होना पड़ेगा. साथ ही, शहरों में बढ़ते तापमान को रोकने के लिए ‘कूल रूफ’ और ‘ग्रीन कवर’ जैसे उपायों पर युद्ध स्तर पर काम करना होगा.

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मौसम विभाग के मुताबिक, जून और जुलाई में बारिश फिर भी ठीक-ठाक हो सकती है, लेकिन असली खेल अगस्त में शुरू होगा. अल नीनो का असर आमतौर पर एक महीने की देरी से भारत पर दिखता है. अगर अगस्त-सितंबर सूखा गया, तो न केवल खरीफ की फसलें बर्बाद होंगी, बल्कि आने वाले साल के लिए भूजल स्तर भी नहीं सुधरेगा. यह स्थिति महंगाई को भी आसमान पर पहुंचा सकती है. कुल मिलाकर देखें तो अप्रैल की यह तपन आने वाले विनाशकारी मौसम की एक छोटी सी झलक मात्र है. हमें एक लंबी और थका देने वाली गर्मी के लिए खुद को तैयार करना होगा.

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By uttu

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