ये दावा एडवोकेट रवि झा जो उस समय कोर्ट में मौजूद थे, उन्होंने बीबीसी से बात करते हुए किया है. इसके अलावा, एक अन्य वेबसाइट लाइव लॉ में छपी रिपोर्ट के अनुसार, कुछ चश्मदीदों का कहना है कि जूता फेंका गया जबकि कुछ का कहना है कि पेपर रोल फेंका गया.
इस बीच, पूरी घटना को लेकर अभी तक सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कोई बयान सामने नहीं आया है. सुप्रीम कोर्ट ने वकील के खिलाफ आरोप लगाने से इनकार कर दिया है. दिल्ली पुलिस ने जूता फेंकने की कोशिश करने वाले वकील राकेश किशोर को रिलीज कर दिया है.
अब सवाल ये है कोर्ट या किसी अन्य स्थान पर किसी जज के साथ इस तरह के बर्ताव या गैर-जरूरी व्यवाहर पर क्या सजा होती है? क्या ये वकील या किसी सामान्य व्यक्ति के लिए अलग-अलग है.
भारतीय संविधान के अनुसार, अदालत में दुर्व्यवहार में जज को अपशब्द कहना, फैसले की ऐसी आलोचना जो न्याय प्रक्रिया को बदनाम करती हो शामिल हैं. शारीरिक हमला, जैसे मारपीट या धमकी, इससे भी गंभीर अपराध है. इस तरह के व्यवाहर को कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स माने जाते हैं जो जिसके तहत सिविल या क्रिमिनल कंटेम्प्ट में दोनों ही आते हैं. शारीरिक हमले के लिए BNS, 2023 की धाराएं (BNS धारा 2(45)) लागू होती हैं, क्योंकि जज पब्लिक सर्वेंट का पद है.
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन ने भी इस घटना की निंदा करते हुए इसे बेहद खराब बताया. इंडिया टूडे के अनुसार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने राकेश किशोर का लाइसेंस सस्पेंड कर दिया है.
वकील होने के नाते, दुर्व्यवहार या हमले पर दोहरी सजा, मतलब आपराधिक और पेशेवर सजा हो सकती है.
कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट, 1971 की धारा 12 के तहत, 6 महीने तक की साधारण कैद और 2000 रुपये तक जुर्माना, या फिर दोनों हो सकते हैं. हांलाकि, इसमें माफी मांगने पर सजा माफ हो सकती है. सुप्रीम कोर्ट के मामले विनय चंद्रा मिश्रा केस में वकील को जज से दुर्व्यवहार के लिए 6 सप्ताह की कैद और 3 साल के लिए प्रैक्टिस सस्पेंड करने की सजा दी थी.
एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 35 के तहत, प्रोफेशनल मिसकंडक्ट की जांच स्टेट बार काउंसिल या बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की समिति करती है. इसमें जज के साथ दुर्व्यवहार शामिल है. जांच में दोषी पाए जाने पर फटकार, सस्पेंशन, रिमूवल फ्रॉम रोल यानी वकील बनने का अधिकार छिना जा सकता हैं.
वकील न्याय व्यवस्था के स्तंभ हैं, लेकिन अपमानजनक व्यवहार पर एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 35 के तहत दंडित किया जा सकता है. राज्य बार काउंसिल या बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की अनुशासनिक समिति शिकायत की जांच करती है.
आम आदमी (कॉमन मैन) द्वारा अदालत में अपमानजनक व्यवहार, जैसे जज को गाली देना या फैसले की निंदा जो स्कैंडलाइजिंग हो, इसी भी कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट, 1971 के तहत क्रिमिनल कंटेम्प्ट माना जाता है. दंड धारा 12 के अनुसार 6 महीन तक जेल, 2000 तक रुपए जुर्माना , या दोनों हो सकते हैं. सिविल कंटेम्प्ट में सिविल जेल तक 6 महीने की हो सकती है. माफी मांगने पर छूट मिल सकती है. यह जज या वकील से अलग है, क्योंकि यहां सीधे अदालत कार्रवाई करती है.
