5 लोक नृत्य सिर्फ डांस नहीं, सदियों पुरानी संस्कृति और परंपरा की जीवंत पहचान
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Telangana Folk Dance: तेलंगाना अपनी समृद्ध संस्कृति, लोक परंपराओं और रंग-बिरंगे लोक नृत्यों के लिए देशभर में खास पहचान रखता है. यहां के पारंपरिक नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि इतिहास, लोक जीवन और सामाजिक परंपराओं का जीवंत प्रतिबिंब हैं. पेरिनी शिवतांडवम, लंबाडी, धिमसा, गुस्साडी और बोनालू नृत्य तेलंगाना की सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं. इन नृत्यों में पारंपरिक वेशभूषा, लोक संगीत और अनूठे भाव लोगों को आकर्षित करते हैं. विशेष अवसरों, त्योहारों और धार्मिक आयोजनों में इन लोक नृत्यों का आयोजन बड़े उत्साह के साथ किया जाता है. पेरिनी शिवतांडवम जहां वीरता और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है, वहीं लंबाडी नृत्य बंजारा समुदाय की संस्कृति को दर्शाता है.

हैदराबाद: तेलंगाना की सांस्कृतिक पहचान यहाँ के पारंपरिक लोक नृत्यों में धड़कती है जो महज़ कला नहीं बल्कि सदियों पुराने इतिहास और सामुदायिक एकजुटता की कहानियाँ हैं. ग्रामीण अंचलों की रौनक बढ़ाने वाले कोलाट्टम से लेकर आदिवासियों के ऊर्जावान गुसाडी और काकतीय काल के ऐतिहासिक पेरिनी शिवतांडवम तक, यहाँ के प्रमुख लोक नृत्य आज भी राज्य की गौरवशाली विरासत और अनूठी कला संस्कृति को पूरी दुनिया में जीवंत बनाए हुए हैं.

ये लोक नृत्य इस बात का प्रमाण हैं कि तेलंगाना की कला सिर्फ देखने की चीज़ नहीं है बल्कि यह वह कला है जो यहाँ के लोगों के इतिहास और उनकी पहचान का प्रतिनिधित्व करती है. आज के आधुनिक दौर में भी, राज्य के त्योहारों और स्थानीय मेलों में इन पारंपरिक नृत्यों की गूंज यह साबित करती है कि तेलंगाना की जड़ें आज भी अपनी संस्कृति से कितनी गहराई से जुड़ी हुई हैं.

कोलाट्टम कोलाटा: इस नृत्य को ट्रेडिशनल स्टिक डांस के नाम से भी जाना जाता है. इसमें कलाकारों का एक समूह दोनों हाथों में छोटी, रंग-बिरंगी लकड़ियाँ लेकर एक गोल घेरा बनाता है. बहुत ही तेज़ गति, सटीक टाइमिंग और अद्भुत तालमेल के साथ जब ये कलाकार एक-दूसरे की लाठियों से ताल मिलाते हैं तो उससे निकलने वाली ध्वनि ही इस नृत्य का मुख्य संगीत बन जाती है. बाथुकम्मा, दशहरा और दीपावली जैसे त्योहारों पर यह नृत्य हर गाँव की जान होता है.
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पेरिनी शिवतांडवम: काकतीय राजवंश के समय विकसित हुआ पेरिनी शिवतांडवम तेलंगाना का एक ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित नृत्य रूप है. प्राचीन काल में युद्ध पर जाने से पहले योद्धा भगवान शिव के समक्ष प्रेरणा और ऊर्जा का संचार करने के लिए यह रौद्र नृत्य करते थे. ढोल और शंख की भीषण ध्वनि के साथ किया जाने वाला यह पुरुषों का नृत्य, तेलंगाना के गौरवशाली इतिहास का प्रतीक है.

डप्पू नृत्य: डप्पू नृत्य तेलंगाना के सबसे शक्तिशाली और गतिशील लोक नृत्यों में से एक है. डप्पू एक प्रकार का पारंपरिक ड्रम होता है जिसे दो मजबूत लकड़ियों से बजाया जाता है. इस नृत्य में कलाकार डप्पू की तेज़ और गूँजती हुई थाप पर पूरी ऊर्जा के साथ थिरकते हैं. यह नृत्य त्योहारों, स्वागत समारोहों और स्थानीय मेलों में दर्शकों में एक नया जोश भर देता है.

लंबाडी नृत्य: लंबाडी या बंजारा नृत्य तेलंगाना की अर्ध-खानाबदोश जनजातियों द्वारा किया जाता है. मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा किए जाने वाले इस नृत्य में वे शीशों, मोतियों और कसीदाकारी से सजे बेहद खूबसूरत और रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधान पहनती हैं. रोज़मर्रा के ग्रामीण जीवन, खेती और प्रकृति से जुड़े गीतों पर किया जाने वाला यह नृत्य अपनी सादगी और सुरीली लय के लिए जाना जाता है.

गुसाडी नृत्य: आदिलाबाद के राज गोंड आदिवासियों द्वारा दीपावली के त्योहार पर किया जाने वाला गुसाडी बेहद आकर्षक और ऊर्जावान नृत्य है. इसमें नर्तक मोर के पंखों से बना एक बड़ा मुकुट पहनते हैं और हिरण की खाल के साथ खुद को सजाते हैं. अपने हाथों में डंडे लेकर ढोल की थाप पर किया जाने वाला यह नृत्य अपनी अनूठी वेशभूषा और लोक धुनों के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है.
