Mon. Apr 6th, 2026

‘बैक टू द बेसिक्स…’, इंडक्शन, चूल्हा और कोयले की भट्ठी, गैस की कमी के बाद कैसे खाना बना रहे हैं लोग

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बैक टू द बेसिक्स… इंडक्शन से कोयले की भट्ठी तक, LPG कैसे खाना बना रहे हैं लोग

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LPG Gas Shortage: देश भर में एलपीजी गैस की भारी किल्लत ने आम आदमी की रसोई का सुकून छीन लिया है. हालांकि, सरकार लोगों को गैस की कमी ना हो लगातार कोशिश में है. गैस की कमी की वजह से वैकल्पिक खाना पकाने के स्रोत ढूंढने में लगे हैं. लोगों ने इंडक्शन, पारंपरिक और कोयले वाला चूल्हा और इलेक्ट्रिक हीटर पर डिपेंड हो रहे हैं. वहीं, दिहाड़ी मजदूरों के लिए यह संकट दोहरी मार लेकर आया है. गैस न मिलने के कारण मजदूर अब सामूहिक रूप से लकड़ी के चूल्हों पर खाना बनाने को मजबूर हैं, तो कई कामगार काम छोड़कर वापस गांवों की ओर रुख कर रहे हैं. रेस्टोरेंट्स में भी अब पुरानी कोयले वाली भट्ठियों की वापसी हो रही है. जानिए कैसे लोग इस ऊर्जा संकट से लड़ रहे हैं.

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गैस एजेंसी के बाहर खाली सिलेंडर लेकर खड़े लोगों की तस्वीरें अब आम हो गई हैं. रसोई गैस की कमी ने न केवल खाने के स्वाद को प्रभावित किया है, बल्कि लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित किया है. महिलाएं अब खाना पकाने के लिए घंटों मशक्कत करनी पड़ रही है. इस संकट ने साबित कर दिया है कि हम ऊर्जा के एक ही स्रोत पर कितने निर्भर हो चुके हैं, जिसका विकल्प ढूंढना अब मजबूरी बन गया है.

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सोलर कुकर की भी मांग बढ़ गई. पर्यावरण उपकरणों की याद दिलाई है, वहीं दूसरी ओर गरीबी और आधुनिकता के बीच की खाई को भी उजागर किया है. संपन्न वर्ग जहां बिजली के महंगे उपकरणों से गुजारा कर रहा है. वहीं गरीब मजदूर सामूहिक चूल्हों पर एक-दूसरे की मदद कर पेट भर रहा है.

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शहरों के नामी रेस्टोरेंट्स और गली-नुक्कड़ के ढाबों का नजारा भी बदल गया है. गैस की किल्लत को देखते हुए कई होटलों में पुरानी कोयले वाली भट्ठियों की मांग बढ़ गई है. तंदूर और भट्ठियों में अब एलपीजी के बजाय लकड़ी और कोयले का इस्तेमाल हो रहा है. हालांकि इससे प्रदूषण बढ़ रहा है और खाना बनाने की प्रक्रिया धीमी हो गई है, लेकिन ग्राहकों की ऑर्डर लिस्ट पूरी करने के लिए उनके पास अब कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है.

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सबसे बुरा हाल उन दिहाड़ी मजदूरों का है जो छोटे कमरों में समूह में रहते हैं. गैस न होने के कारण ये कामगार अब फुटपाथ या खुली जगहों पर ईंटों का चूल्हा बनाकर सामूहिक रूप से खाना पका रहे हैं. समय और ईंधन की कमी के कारण कई मजदूर तो अब काम छोड़कर अपने गांवों की ओर लौटने को मजबूर हैं, क्योंकि शहर में बिना ईंधन के पेट भरना उनकी दिहाड़ी से कहीं ज्यादा महंगा पड़ रहा है. धुएं के बीच रोटी सेंकना अब उनकी नियति बन गई है.

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देश में एलपीजी गैस की अचानक आई भारी किल्लत ने आम आदमी की रसोई की रौनक छीन ली है. सिलेंडरों के लिए लंबी कतारें और सप्लाई की अनिश्चितता ने लोगों को वैकल्पिक साधनों की ओर धकेल दिया है. मिडिल क्लास घरों में बिजली से चलने वाले उपकरणों की मांग अचानक बढ़ गई है, वहीं समाज का सबसे निचला तबका यानी दिहाड़ी मजदूर एक बार फिर ‘धुएं और आग’ के पुराने दौर में लौटने को मजबूर हो गया है.

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शहरी इलाकों में इस संकट का समाधान बिजली में ढूंढा जा रहा है. इंडक्शन कुकटॉप्स की बिक्री में रिकॉर्ड उछाल आया है. इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तकनीक पर आधारित ये चूल्हे दाल, चावल और सब्जी बनाने के लिए सबसे आसान विकल्प साबित हो रहे हैं. हालांकि, इसके लिए विशेष इंडक्शन-फ्रेंडली बर्तनों की जरूरत होती है, जिसके कारण मध्यमवर्गीय परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी पड़ा है.

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इलेक्ट्रिक हॉट प्लेट्स की मांग में जबरदस्त उछाल आ गई है. ये प्लेट्स दिखने में भले ही पुराने जमाने की लगती हों, लेकिन एलपीजी की अनुपस्थिति में चाय बनाने या रोटियां सेकने के लिए ये सबसे भरोसेमंद साथी साबित हो रही हैं. जिन घरों में इंडक्शन के अनुकूल बर्तन नहीं थे, वहां इन साधारण हॉट प्लेट्स ने बड़ी राहत दी है. इसने रसोई गैस पर हमारी सदियों पुरानी पूर्ण निर्भरता को हिलाकर रख दिया है और बिजली को मुख्य विकल्प बना दिया है.

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रसोई में अब इलेक्ट्रिक राइस कुकर और माइक्रोवेव ओवन का भी खूब उपयोग में लाया जा रहा है. लोग अब राइस कुकर में केवल चावल ही नहीं, बल्कि खिचड़ी, सूप और उबली हुई सब्जियां भी बना रहे हैं. माइक्रोवेव का इस्तेमाल अब सिर्फ खाना गर्म करने के लिए नहीं, बल्कि झटपट ऑमलेट या स्टीम फूड बनाने के लिए हो रहा है. बिजली के इन छोटे उपकरणों ने शहरी आबादी को पूरी तरह भूखा रहने से बचा लिया है, हालांकि बिजली बिल बढ़ने का डर भी बना हुआ है.

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By uttu

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