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Karauli Hindi News: राजस्थान के करौली जिले की शादियां अपनी अनोखी परंपराओं के लिए जानी जाती हैं. यहां विवाह समारोह में हाथी-घोड़े के साथ विशेष शाही चित्रकारी का महत्वपूर्ण स्थान होता है, जिसके बिना शादी अधूरी मानी जाती है. यह परंपरा न केवल शान और वैभव को दर्शाती है, बल्कि स्थानीय संस्कृति और विरासत को भी जीवित रखती है. पीढ़ियों से चली आ रही यह अनूठी परंपरा आज भी लोगों के दिलों में बसती है. आधुनिकता के दौर में भी करौली के लोग इस रिवाज को पूरे उत्साह के साथ निभाते हैं, जो उनकी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाता है.
करौली. बदलते दौर में जहां शादियों का स्वरूप आधुनिकता की ओर तेजी से बढ़ रहा है, वहीं राजस्थान की धार्मिक नगरी करौली आज भी अपनी विरासत और परंपराओं को मजबूती से थामे हुए है. यहां की शादियां सिर्फ रस्मों तक सीमित नहीं, बल्कि सदियों पुरानी एक खास पहचान के साथ जुड़ी हुई हैं ‘हाथी-घोड़ा’ चित्रकारी, जो आज भी करौली में हर विवाह का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है.
करौली में जैसे ही किसी घर में शादी तय होती है, तैयारियों की शुरुआत सिर्फ सजावट या बैंड-बाजे से नहीं होती, बल्कि घर के मुख्य द्वार पर पारंपरिक चित्रकारी से होती है. स्थानीय चित्रकारों द्वारा बनाए जाने वाले इन चित्रों में हाथी, घोड़े, चार सिपाही, डोली, शहनाई, ढोलक और बेल-बूटों के साथ पुराने समय की बारातों की झलक साफ दिखाई देती है. यही चित्रकारी यह संकेत भी देती है कि इस घर में शादी का उत्सव शुरू हो चुका है.
परंपरा को छोड़ना नहीं चाहते
स्थानीय जानकारों के अनुसार, यह परंपरा सिर्फ एक रिवाज नहीं बल्कि करौली की सांस्कृतिक पहचान है, जो रियासतकाल से चली आ रही है. पहले के समय में जब बारातें शाही अंदाज में निकाली जाती थीं, उसी परंपरा की छवि इन चित्रों में आज भी जीवित है. यही कारण है कि आधुनिक सजावट के बीच भी लोग इस परंपरा को छोड़ना नहीं चाहते.
नकद राशि और नारियल भेंट किया जाता
दिलचस्प बात यह है कि इस खास कला को आज भी करौली के कुछ ही चुनिंदा चित्रकार जानते हैं. यही वजह है कि शादी के मौसम में इन कलाकारों की मांग काफी बढ़ जाती है. चित्रकारी के बदले उन्हें पारंपरिक तरीके से सम्मान, तिलक लगाकर शगुन के रूप में नकद राशि और नारियल भेंट किया जाता है.
पूरी तरह जानने वाले कलाकार अब गिने-चुने ही बचे
युवा चित्रकारों का कहना है कि भले ही समय बदल गया हो, लेकिन ‘हाथी-घोड़ा’ बनाने की कला आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी सिखाई जा रही है. हालांकि इसे पूरी तरह जानने वाले कलाकार अब गिने-चुने ही बचे हैं, लेकिन इस परंपरा के प्रति लोगों की आस्था कम नहीं हुई है.
स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर शादी में यह चित्रकारी नहीं करवाई जाए, तो आयोजन अधूरा माना जाता है. यही वजह है कि नई पीढ़ी भी इस परंपरा को अपनाते हुए अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है.
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