लेफ्टिनेंट नरवाल: करनाल के उस घर की कहानी, जहां खुशियां एक साल पहले ही मर गईं
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पहलगाम आतंकी हमले को एक साल होने जा रहा है, लेकिन लेफ्टिनेंट विनय नरवाल के परिवार के लिए दर्द आज भी उतना ही ताजा है. हनीमून पर गए इस युवा नौसेना अधिकारी की मौत ने उनके घर की खुशियां छीन लीं थीं. पिता की यादें, पत्नी का अधूरा साथ और हर दिन बहते आंसू इस त्रासदी आज भी उस कहानी को बयां करने के लिए काफी हैं.

पहलगाम आतंकी हमले की आज पहली बरसी है.
Lieutenant Vinay Narwal & Pahalgam Terrorist Attack: करनाल के इस घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ है. दीवार में टंगी घड़ी की सुइयां तो चल रही है, लेकिन इस घर में एक साल पहले आया ठहराव अभी भी आसानी से महसूस किया जा सकता है. दीवार पर टंगी लेफ्टिनेंट विनय नरवाल की तस्वीर पर अभी भी जिसकी भी नजर जाती है, उसके आंखों से आंसू अपने आप ही बह निकलते हैं. जी हां, पहलगाम आतंकी हमले को एक साल पूरा होने वाला है, लेकिन इन 365 दिनों में ऐसा एक भी दिन नहीं बीता, जब इस घर में रहने वाले लोगों की आंखें नम न हुई हों.
लेफ्टिनेंट विनय नरवाल की उम्र उस वक्त सिर्फ 26 साल की ही थी. भारतीय नौसेना के इस युवा अधिकारी ने अपनी मेहनत से वो मुकाम हासिल किया था, जिस पर हर मां-बाप को गर्व होता है. लेकिन 22 अप्रैल 2025 का दिन इस परिवार को ऐसा जख्म दे गया, जिसे यह परिवार आज तक भूल नहीं पाया है. विनय अपनी पत्नी हिमांशी के साथ पहलगाम गए थे. दोनों की नई-नई शादी हुई थी. हनीमून के साथ जिंदगी की नई शुरुआत के लिए इन्होंने जम्मू और कश्मीर के पहलगाम को चुना था. लेकिन किसे पता था कि खुशियों का ये सफर अचानक जिंदगी भर के लिए नासूर बन जाएगा.
- बेटे को याद कर आज भी पिता की आवाज भर्रा जाती है…
आतंकियों ने लेफ्टिनेंट विनय नरवाल को बेहद करीब से गोली मारी थी. गोली लगने के साथ एक पल में सब कुछ खत्म हो गया था. उस हमले में लेफ्टिनेंट विनय नरवाल जैसे 25 अन्य पर्यटकों को आतंकियों ने अपनी गोलियों का निशान बनाया था. - विनय के पिता राजेश नरवाल जब इस घटना को याद करते हैं, तो उनकी आवाज भर्रा जाती है. वे कहते हैं कि हमारी जिंदगी उस दिन से पटरी से उतर गई है. हम कोशिश करते हैं संभलने की, लेकिन हर दिन वही दर्द फिर सामने आ खड़ा होता है. आंखों में आंसू लिए एक पिता के लगातार टूटते दिल का दर्द कोई भी आसानी से महसूस कर सकता है.
- राजेश नरवाल भरी हुई आवाज के साथ कहते हैं कि जवान बेटे को खोने का दर्द क्या होता है, ये वही समझ सकता है जिसने इसे झेला हो. छोटे-मोटे दुख तो समय के साथ कम हो जाते हैं, लेकिन ये दर्द… ये कभी नहीं जाएगा.
- राजेश नरवाल बताते हैं कि विनय ने अपने भविष्य के लिए कितने सपने देखे थे. एक डायरी में उसने अपनी पूरी जिंदगी की प्लानिंग लिख रखी थीं. क्या करना है, कहां जाना है, कैसे आगे बढ़ना है. उस डायरी के हर पन्ने में अब अधूरी ख्वाहिशें कैद होकर रह गईं हैं.
- वो कुछ याद करते हुए बताते हैं कि जब उसने पहली बार मेरी उंगली पकड़कर चलना सीखा था, उसके चेहरे की वो खुशी आज भी मेरी आंखों के सामने है.
हर कोना आज भी कराता है विनय का अहसास
एक पल के लिए उनकी आंखें चमकती हैं, फिर उसी पल वो चमक आंसुओं में बदल जाती है. विनय पहले वायुसेना में जाना चाहता था, लेकिन जब उसका चयन नौसेना में हुआ, तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था. उसने पूरे जोश के साथ अपनी जिम्मेदारियां निभाईं और देश की सेवा को अपना सबसे बड़ा धर्म माना. परिवार में अब विनय की पत्नी हिमांशी, बहन सृष्टि और माता-पिता हैं, जो हर दिन उसकी यादों के सहारे जी रहे हैं. घर का हर कोना, हर चीज विनय की मौजूदगी का एहसास आज भी कराती है.
कुछ जख्म होते हैं जो कभी नहीं भरते…
राजेश नरवाल बताते हैं कि सरकार ने इस मुश्किल समय में उनका साथ दिया, जिसके लिए वे आभारी हैं. ऑपरेशन सिंदूर के बाद उन्होंने उम्मीद जताई थी कि देश की कार्रवाई ने आतंकियों को एक कड़ा जवाब दिया है, ताकि भविष्य में कोई और परिवार इस दर्द से न गुजरे. लेकिन इन सबके बीच मां की सूनी आंखें, एक पिता का टूटा हुआ दिल और एक पत्नी का अधूरा साथ एक साथ बहुत कुछ कह जाते हैं. समय तो आगे बढ़ता रहता है, लेकिन कुछ जख्म ऐसे होते हैं जो कभी नहीं भरते. विनय नरवाल अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें, उनके सपने और उनकी मुस्कान हमेशा इस परिवार के साथ जिंदा रहेंगी.
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Anoop Kumar Mishra is associated with News18 Digital for the last 6 years and is working on the post of Assistant Editor. He writes on Health, aviation and Defence sector. He also covers development related to …और पढ़ें
