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क्या आपने कभी सोचा है कि जोधपुर की गलियों में दौड़ने वाला एक आम स्कूटर एक दिन विदेश में शो-पीस बन जाएगा? 1986 का यह बजाज सुपर स्कूटर आज नीदरलैंड्स के एक शानदार फर्नीचर स्टोर में सजा है. इसकी कहानी सिर्फ एक वाहन की नहीं, बल्कि भारतीय विरासत और यादों के उस सफर की है, जो अब दुनिया के दूसरे कोने तक पहुंच चुका है.

हल्के हरे रंग का यह स्कूटर पहली नजर में भले ही साधारण लगे, लेकिन इसकी कहानी आपको चौंका देगी. राजस्थान का पुराना रजिस्ट्रेशन नंबर आज भी इस पर साफ दिखाई देता है, जो सीधे आपको 1986 के दौर में ले जाता है, जब यही स्कूटर सड़कों पर दौड़ता था और रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था. अब यही स्कूटर हजारों किलोमीटर का सफर तय कर एक विदेशी शोरूम में खास शो-पीस बन चुका है. एक आम सवारी से इंटरनेशनल पहचान तक का इसका सफर न सिर्फ दिलचस्प है, बल्कि यह भी दिखाता है कि जोधपुर की मिट्टी से जुड़ी चीजों की पहचान और चमक दुनिया भर में अलग ही मुकाम रखती है.

सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस हल्के हरे रंग के क्लासिक स्कूटर पर आज भी राजस्थान का ओरिजिनल रजिस्ट्रेशन नंबर (RNM 7215) साफ नजर आता है. स्टोर मालिक ने इसकी विंटेज अहमियत को समझते हुए इसे बिना किसी बदलाव के उसी असली रूप में सजा कर रखा है. यही वजह है कि यह स्कूटर वहां आने वाले हर ग्राहक का ध्यान तुरंत अपनी ओर खींच लेता है और भारतीय विरासत की अनोखी झलक पेश करता है. विदेशी जमीन पर खड़ा यह ‘राजस्थानी’ स्कूटर सिर्फ एक शो-पीस नहीं, बल्कि बीते दौर की यादों को जिंदा करने वाला प्रतीक बन गया है. इसे देखकर हर किसी को पुराने वक्त की सादगी, सफर और कहानियों का एहसास हो जाता है. मानो 1986 की वो सड़कें आज भी इसके साथ चल रही हों.

इस स्कूटर की कहानी और भी खास हो जाती है जब इसका जुड़ाव जोधपुर के सरदारपुरा निवासी बाल किशन गुप्ता, पुत्र श्री तेजपाल गुप्ता से सामने आता है. उन्होंने मार्च 1986 में इस भरोसेमंद सवारी को खरीदा था और कई सालों तक यह स्कूटर जोधपुर की सड़कों पर उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा बना रहा. समय के साथ जहां इसकी रफ्तार थमी, वहीं इसकी पहचान और भी खास हो गई. आज यही स्कूटर अपनी ‘रिटायरमेंट’ लाइफ एक विदेशी शोरूम में म्यूजियम पीस की तरह बिता रहा है. कभी आम सवारी रहा यह स्कूटर अब विरासत और यादों का ऐसा प्रतीक बन चुका है, जिसे देखने वाला हर शख्स ठहर कर उसकी कहानी जानना चाहता है.
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जोधपुर के लोगों के लिए यह स्कूटर सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि शहर की विरासत और यादों का जीता-जागता हिस्सा है. 12 मार्च 1986 को परिवहन विभाग, जोधपुर में रजिस्टर हुआ यह स्कूटर उस दौर की सादगी और भरोसे की कहानी अपने साथ लिए चलता है. भले ही आज इसकी रफ्तार थम चुकी हो, लेकिन इसकी पहचान और अहमियत जरा भी कम नहीं हुई. समय के साथ यह एक आम सवारी से बढ़कर विरासत का प्रतीक बन गया है, जो अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी अलग पहचान बना रहा है.

कहते हैं कुछ चीजें वक्त के साथ सिर्फ पुरानी नहीं होतीं, बल्कि इतिहास और यादों की पहचान बन जाती हैं. जोधपुर के सरदारपुरा की गलियों में कभी शान से दौड़ने वाला गुप्ता जी का बजाज सुपर स्कूटर आज हजारों किलोमीटर दूर यूरोप के नीदरलैंड्स के निजकैर्क शहर में एक आलीशान फर्नीचर स्टोर की शोभा बढ़ा रहा है. एक समय आम सवारी रहा यह स्कूटर अब विदेशी जमीन पर भारतीय विरासत का प्रतिनिधि बन चुका है, जहां हर नजर ठहरती है और हर कोई इसकी कहानी जानने को उत्सुक हो जाता है.
