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नेहरू के वक्‍त ज‍िसकी उठी थी मांग, 60 साल बाद हुई पूरी, दशकों पुराना असंतोष खत्म!

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नॉर्थ ईस्‍ट में 1960 में नेहरू के कार्यकाल के दौरान शुरू हुई यह ‘भाषाई स्वाभिमान’ की लड़ाई अब जाकर अपने तार्किक मुकाम पर पहुंची है. CM कॉनराड संगमा ने इस अध्यादेश के जरिए उस ऐतिहासिक टीस को खत्म किया है जो दशकों से मेघालय के दिल में थी.

नेहरू के वक्‍त ज‍िसकी उठी थी मांग, 60 साल बाद हुई पूरीZoom

मेघालय में खासी गारो को मिला सम्‍मान.

नॉर्थ ईस्‍ट के लिए सरकार ने एक बड़ा दांव खेला है. मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड के. संगमा ने कहा क‍ि राज्य की दो सबसे बड़ी स्वदेशी भाषाओं खासी और गारो को आधिकारिक भाषा का दर्जा देने के अध्यादेश को मंजूरी दे दी है. यह फैसला सिर्फ प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि राज्य के दो सबसे बड़े समुदायों के आत्मसम्मान और पहचान की बड़ी जीत है. इससे दशकों पुराना असंतोष खत्‍म हो जाएगा. यह मांग देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल में भी उठी थी, लेकिन अब जाकर उनकी ड‍िमांड पूरी हुई है.

1960 के दशक में जब पंडित नेहरू का कार्यकाल अंतिम चरण में था, तब असम (जिसका मेघालय तब हिस्सा था) में ‘असम राजभाषा अधिनियम, 1960’ लागू किया गया. इसके तहत ‘असमिया’ को एकमात्र आधिकारिक भाषा घोषित कर दिया गया. खासी, गारो और जयंतिया समुदायों को लगा कि उन पर असमिया भाषा थोपी जा रही है. 1960-61 में नेहरू के सामने ही यह विरोध मुखर हुआ और यहीं से ‘हिल स्टेट मूवमेंट’ ने जोर पकड़ा. इन समुदायों की मांग थी कि उनकी भाषा और संस्कृति को दबाया न जाए.

अलग राज्य की नींव ही भाषा पर थी

1972 में जब इंदिरा गांधी के समय मेघालय एक अलग राज्य बना, तो इसका मुख्य आधार ही अपनी विशिष्ट भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को बचाना था. हालांकि, उस समय प्रशासनिक जरूरतों के लिए अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा बना दिया गया, लेकिन खासी और गारो भाषाओं को वह दर्जा नहीं मिल सका जिसकी मांग नेहरू के समय के बड़े नेता जैसे कैप्टन विलियमसन संगमा करते आ रहे थे. पिछले 60 से अधिक वर्षों से यह मांग ठंडे बस्ते में थी. बीच-बीच में कई आंदोलन हुए, लेकिन 2005 के एक्ट में भी इन्हें वह सम्मान नहीं मिला जो अब मिला है.

कैसे सधे दो बड़े समुदाय?

  1. मेघालय में लंबे समय से यह मांग उठ रही थी कि जिस राज्य की पहचान खासी और गारो समुदायों से है, वहां की सरकारी कामकाज की भाषा केवल अंग्रेजी क्यों रहे? 2005 के भाषा अधिनियम से जो असंतोष पैदा हुआ था, उसे संगमा सरकार ने ‘मेघालय राजभाषा अध्यादेश, 2026’ के जरिए जड़ से खत्म कर दिया है.
  2. इस फैसले से सरकार ने सीधे तौर पर लोगों की भावनाओं को छुआ है. अब आम नागरिक अपनी मातृभाषा में सरकारी संवाद कर सकेंगे, जिससे प्रशासन और जनता के बीच की दूरी कम होगी.
  3. मेघालय की राजनीति मुख्य रूप से खासी-जयंतिया हिल्स और गारो हिल्स के बीच बंटी रहती है. अक्सर एक समुदाय को प्राथमिकता मिलने पर दूसरा उपेक्षित महसूस करता था. दोनों भाषाओं को एक साथ आधिकारिक दर्जा देकर CM संगमा ने ‘क्षेत्रीय संतुलन’ साधा है. इससे गारो हिल्स और खासी हिल्स, दोनों क्षेत्रों में सरकार के प्रति भरोसा बढ़ा है.
  4. विधानसभा में गूंजेगी अपनी भाषा: अब विधायक विधानसभा की कार्यवाही में अपनी मातृभाषा में अपनी बात रख सकेंगे. यह उन समुदायों के लिए गर्व की बात है जो अपनी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होते देखना चाहते हैं.

क‍ितनी आबादी और क‍िस तरह का था खतरा

खासी और गारो समुदायों की लगभग 33 लाख है जो राज्य की कुल आबादी का करीब 80% है. यह फैसला उनके अस्तित्व की रक्षा जैसा है. आधिकारिक दर्जा न मिलने की वजह से इन जनजातीय भाषाओं के लुप्त होने और सांस्कृतिक पहचान मिटने का गंभीर खतरा मंडरा रहा था. दशकों से ये समुदाय उपेक्षित महसूस कर रहे थे, जिससे राज्य में भाषाई अलगाव और असंतोष की आग सुलग रही थी. अगर सरकार समय रहते यह कदम नहीं उठाती, तो नई पीढ़ी अपनी जड़ों और मातृभाषा से पूरी तरह कट जाती, जिससे भविष्य में ‘पहचान के संकट’ की स्थिति पैदा होना तय था.

केंद्र सरकार को संदेश

मुख्यमंत्री संगमा ने साफ किया है कि राज्य स्तर पर यह दर्जा मिलने से इन भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने का दावा और मजबूत होगा. सरकारी परीक्षाओं में इन भाषाओं के शामिल होने से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर और सुलभ होंगे. ‘ग्रेटर शिलांग वेस्ट मैनेजमेंट एजेंसी’ के गठन जैसे फैसलों के साथ भाषा के मुद्दे को सुलझाकर सरकार ने यह संदेश दिया है कि वह विकास और विरासत, दोनों को साथ लेकर चल रही है.

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Gyanendra Mishra

Mr. Gyanendra Kumar Mishra is associated with hindi.news18.com. working on home page. He has 20 yrs of rich experience in journalism. He Started his career with Amar Ujala then worked for ‘Hindustan Times Group…और पढ़ें

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