नई दिल्ली: आज जब हम कंप्यूटर, मोबाइल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में जी रहे हैं, तब यह जानकर हैरानी होती है कि सदियों पहले भी इंसान ने ऐसे डिवाइस बना लिए थे. ये कई जटिल कैलकुलेशन आसानी से कर सकते थे. 17वीं सदी का एक ऐसा ही अनोखा डिवाइस अब दुनिया के सामने फिर से चर्चा में है, जिसे उस दौर का ‘सुपरकंप्यूटर’ कहा जा रहा है. यह कोई साधारण डिवाइस नहीं, बल्कि विज्ञान, कला और शिल्प का अद्भुत संगम है. खास बात यह है कि यह डिवाइस कभी जयपुर के शाही परिवार का हिस्सा था और बाद में महारानी गायत्री देवी के पास पहुंचा. अब यह ऐतिहासिक धरोहर नीलामी में जाने वाली है, जहां इसकी कीमत करोड़ों रुपए तक पहुंच सकती है. यह सिर्फ एक वस्तु नहीं, बल्कि भारत की वैज्ञानिक विरासत और समृद्ध इतिहास का जीवंत उदाहरण है.
इस तरह के डिवाइस यह साबित करते हैं कि प्राचीन और मध्यकालीन भारत में विज्ञान और खगोलशास्त्र कितने एडवांस थे. आज जिसे हम डिजिटल तकनीक कहते हैं, उसकी नींव कहीं न कहीं ऐसे ही डिवाइसों से पड़ी है. यह एस्ट्रोलैब न केवल समय बताने या दिशा निर्धारण के काम आता था, बल्कि यह आकाशीय पिंडों की स्थिति को समझने और जटिल कैलकुलेशन करने में भी सक्षम था. यही कारण है कि इसे उस दौर का ‘कंप्यूटर’ कहा जाता है. BBC की रिपोर्ट के अनुसार अब जब यह नीलामी के लिए तैयार है, तो दुनिया भर के कलेक्टर्स और इतिहास प्रेमियों की नजर इस पर टिकी हुई है. इसकी कीमत ही नहीं, बल्कि इसकी ऐतिहासिक और वैज्ञानिक अहमियत भी इसे बेहद खास बनाती है.
क्या है यह 17वीं सदी का ‘कंप्यूटर’?
- यह डिवाइस दरअसल एक ‘एस्ट्रोलैब’ है, जिसे एस्ट्रोनॉमिकल कैलकुलेशन के लिए इस्तेमाल किया जाता था. यह एक हाथ में पकड़ा जाने वाला डिवाइस है, इसमें कई परतें और घूमने वाले हिस्से होते हैं. इनकी मदद से समय, दिशा, सूरज और तारों की स्थिति का पता लगाया जाता था. उस दौर में यह नाविकों, खगोलविदों और वैज्ञानिकों के लिए बेहद जरूरी डिवाइस था. इसकी कार्यक्षमता इतनी व्यापक थी कि इसे आधुनिक मल्टी-फंक्शनल डिवाइस का प्रारंभिक रूप माना जाता है.
- यह खास एस्ट्रोलैब 17वीं सदी की शुरुआत में लाहौर में बनाया गया था, जो उस समय मुगल साम्राज्य में वैज्ञानिक डिवाइसों का प्रमुख केंद्र था. इसे कारीगर भाइयों काइम मोहम्मद और मोहम्मद मुक़ीम ने तैयार किया था, जो ‘लाहौर स्कूल’ के प्रसिद्ध निर्माता थे. इस तरह के डिवाइस बहुत कम संख्या में बनाए गए थे, और यह उनमें से एक दुर्लभ नमूना है.
- यह डिवाइस मुगल दरबार के एक उच्च अधिकारी आका अफजल के आदेश पर बनाया गया था. बाद में यह जयपुर के महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय के संग्रह का हिस्सा बना और फिर उनकी पत्नी महारानी गायत्री देवी के पास पहुंचा. वर्षों तक निजी संग्रह में रहने के बाद अब इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से नीलामी में पेश किया जा रहा है.
क्यों है यह इतना खास?
इस एस्ट्रोलैब का आकार और वजन इसे और भी अनोखा बनाते हैं. इसका वजन करीब 8 किलोग्राम है और इसकी ऊंचाई लगभग 46 सेंटीमीटर है, जो सामान्य एस्ट्रोलैब से काफी बड़ा है. इसमें 94 शहरों के नाम और उनके अक्षांश-देशांतर अंकित हैं, साथ ही 38 स्टार पॉइंटर्स भी मौजूद हैं. इसकी प्लेट्स इतनी सटीक हैं कि उनमें डिग्री को एक-तिहाई तक विभाजित किया गया है.
कितनी लग सकती है कीमत?
लंदन में होने वाली इस नीलामी में इसकी कीमत 1.5 मिलियन से 2.5 मिलियन पाउंड (करीब 15 से 25 करोड़ रुपए) के बीच रहने का अनुमान है. यह कीमत इसे दुनिया के सबसे महंगे ऐतिहासिक वैज्ञानिक डिवाइसों में शामिल कर सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी दुर्लभता और ऐतिहासिक महत्व के कारण यह नया रिकॉर्ड भी बना सकता है.
भारत की वैज्ञानिक विरासत का प्रतीक
यह एस्ट्रोलैब सिर्फ एक डिवाइस नहीं, बल्कि भारत और मुगलकालीन विज्ञान की उन्नति का प्रतीक है. यह दिखाता है कि उस दौर में भी खगोलशास्त्र और गणित कितने विकसित थे. आज जब हम तकनीक पर निर्भर हैं, तब यह डिवाइस हमें याद दिलाता है कि हमारी जड़ें कितनी गहरी और समृद्ध हैं.
एस्ट्रोलैब क्या होता है?
एस्ट्रोलैब एक प्राचीन खगोलीय डिवाइस है, जिसका उपयोग समय जानने, दिशा निर्धारित करने और तारों की स्थिति समझने के लिए किया जाता था. यह कई परतों और घूमने वाले हिस्सों से बना होता है, जो इसे बहु-कार्यात्मक बनाता है.
इसे ‘सुपरकंप्यूटर’ क्यों कहा जा रहा है?
इसे ‘सुपरकंप्यूटर’ इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि यह एक साथ कई जटिल गणनाएं कर सकता था. उस समय के हिसाब से इसकी कार्यक्षमता बेहद उन्नत थी, जो आज के कंप्यूटर की तरह बहु-उपयोगी थी.
यह नीलामी क्यों खास है?
यह नीलामी इसलिए खास है क्योंकि यह डिवाइस पहली बार सार्वजनिक रूप से सामने आ रहा है. इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, शाही जुड़ाव और दुर्लभता इसे बेहद मूल्यवान बनाती है.
