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राजस्थान की इस खतरनाक लेकिन खूबसूरत सड़क पर दिन में भी क्यों जलानी पड़ती है लाइट? वजह जानकर रह जाएंगे हैरान

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Rajasthan Dangerous Road: राजस्थान अपनी गर्मी और तेज धूप के लिए जाना जाता है, लेकिन राज्य में एक ऐसा रास्ता भी है जहां दिन में भी वाहनों की हेडलाइट जलानी पड़ती है. अरावली की घनी पहाड़ियों और पेड़ों से घिरे इस मार्ग पर सूरज की रोशनी पूरी तरह जमीन तक नहीं पहुंच पाती, जिससे दिन के समय भी हल्का अंधेरा बना रहता है. यही कारण है कि यहां से गुजरने वाले वाहन चालक सुरक्षा के लिए हेडलाइट ऑन रखते हैं. यह सड़क प्राकृतिक सुंदरता और रहस्यमयी माहौल के कारण पर्यटकों को भी आकर्षित करती है. खासकर मानसून और सर्दियों में यहां का दृश्य बेहद रोमांचक दिखाई देता है. स्थानीय लोग इसे राजस्थान के सबसे अनोखे और खूबसूरत मार्गों में गिनते हैं.

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जब आप इस 8 किलोमीटर लंबे रास्ते से गुजरते हैं, तो हवा में मौजूद नीम के तत्व न केवल श्वसन तंत्र को फायदा पहुँचाते हैं, बल्कि हवा में मौजूद हानिकारक कीटाणुओं का भी नाश करते हैं. यह मार्ग केवल एक सड़क नहीं, बल्कि एक ‘नेचुरल सैनिटाइजर टनल’ की तरह काम करता है. यहाँ से गुजरने वाले राहगीरों को न केवल ठंडी छाँव मिलती है, बल्कि नीम की कड़वाहट से शुद्ध हुई वह हवा भी मिलती है जो चर्म रोग और संक्रमण से बचाने में सहायक मानी जाती है. यही कारण है कि इस रास्ते पर टहलना किसी ‘हेल्थ थेरेपी’ से कम नहीं लगता.

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इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि यह कॉरिडोर महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि ब्रिटिश सेना की एक सोची-समझी योजना थी. 1910 में जब शिवगंज छावनी से अंग्रेज फौजी पैदल जवाई बांध रेलवे स्टेशन तक जाते थे, तो चिलचिलाती धूप उनका रास्ता रोकती थी. इसी थकान को मिटाने के लिए अंग्रेजों ने सड़क के दोनों तरफ 960 नीम के पौधे रोपे थे, जो आज विशाल पेड़ बन चुके हैं.

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यह कॉरिडोर सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि वन्यजीवों के लिए भी सुरक्षा कवच है. कृषि मंडी गेट नंबर 2 से जवाई बांध तक फैला यह मार्ग हरियाली की एक ऐसी चादर ओढ़े हुए है, जो पक्षियों और स्थानीय वन्यजीवों को सुरक्षित आवास प्रदान करता है. 112 साल पहले लगाए गए वे 960 पौधे आज पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) की जान बन चुके हैं.

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हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि एक स्वस्थ इंसान को रोजाना 2500 लीटर ऑक्सीजन चाहिए. कोरोना काल के उस कठिन दौर ने हमें सिखाया कि ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए भागने से बेहतर है कि हम पेड़ लगाएं. पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि सुमेरपुर को 5.50 लाख पेड़ों की जरूरत है, जबकि अभी हम आधे आंकड़े पर हैं. यह नीम कॉरिडोर हमें याद दिलाता है कि पेड़ हमारे कल के लिए कितने जरूरी हैं.

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सुमेरपुर का यह मार्ग आज पर्यटन और पर्यावरण के प्रति जागरूकता का प्रतीक बन गया है. जो रास्ता कभी फौजी बूटों की टाप से गूंजता था, आज वहां पक्षियों की चहचहाहट और शुद्ध हवा का वास है. अगर आप सुकून और ताजी हवा की तलाश में हैं, तो 112 साल पुरानी इस ‘हरी विरासत’ की सैर एक बार जरूर करनी चाहिए.

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जब राजस्थान की तपती गर्मी में पारा 45 डिग्री पार कर जाता है, तब सुमेरपुर का यह नीम कॉरिडोर एक ‘नेचुरल एसी’ की तरह काम करता है. घनी छांव और नीम की तासीर के कारण यहाँ का तापमान सामान्य से 5 डिग्री सेल्सियस तक कम रहता है. राहगीरों के लिए यह मार्ग किसी जन्नत से कम नहीं है जहाँ पसीना आते ही सूख जाता है.

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अगर आप ऑक्सीजन की कीमत बाजार भाव से लगाएं, तो यह 8 किमी का रास्ता किसी खजाने से कम नहीं है. विशेषज्ञों के अनुसार, यहाँ लगे 960 पेड़ रोजाना करीब 1 लाख 92 हजार लीटर ऑक्सीजन छोड़ते हैं. ₹20 प्रति लीटर की दर से देखें तो ये पेड़ प्रतिदिन हमें ₹38 लाख 40 हजार की ‘प्राणवायु’ बिल्कुल मुफ्त दे रहे हैं.

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By uttu

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