गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के ऐतिहासिक निवास, ठाकुरबाड़ी जोरासांको की रसोई बंगाल के पाक इतिहास में एक अनूठा प्रयोगशाला थी. यहां केवल खाना ही नहीं बनता था बल्कि दुनियाभर के स्वादों का फ्यूजन किया था. खाने के साथ ऐसे प्रयोग होते थे कि तली जाने वाले व्यंजन को उबालकर बनाया जाता था तो उबालकर बनने वाले डिशेज को तलकर नए प्रयोग होते थे. क्या आपने कभी फूलगोभी की बरफी खाई… यकीन कीजिए ये व्यंजन टैगोर रसोई में गुरुदेव रवींद्रनाथ के जन्मदिन पर बना और इतना हिट हुआ कि बार बार बनने लगा. वैसे गुरुदेव खुद रसोई में हाथ आजमाकर नए व्यंजन बनाने में पीछे नहीं रहते थे.
सिर्फ खाना बनाने की जगह नहीं, बल्कि वैश्विक स्वादों का एक मिलन केंद्र था, जहां परंपरा और आधुनिकता का मेल देखने को मिलता था।
ठाकुरबाड़ी की रसोई सिर्फ पारंपरिक बंगाली व्यंजनों तक सीमित नहीं थी. टैगोर परिवार के सदस्य देश-विदेश की यात्राओं से नए व्यंजनों के विचार और मेन्यू कार्ड लेकर आते थे. खुद रवींद्रनाथ टैगोर भी विदेशी भोजन के शौकीन थे. वे मेन्यू कार्ड घर लाया करते थे, जिसके आधार पर रसोई में नए प्रयोग होते थे. इसका परिणाम ‘ठाकुरबाड़ी रन्ना’ के नाम से विख्यात किताब के जरिए एक समृद्ध विरासत के रूप में सामने आया, जो पूर्व और पश्चिम, मुगलई और कॉन्टिनेंटल व्यंजनों का एक अनूठा मिश्रण था.
ठाकुरबाड़ी का किचन
रसोई में अलग अलग एक्सपर्टीज वाले रसोइये काम करते थे.
– बामोन ठाकुर (बामुन ठाकुर): एक ब्राह्मण रसोइया जो पारंपरिक बंगाली व्यंजन बनाता था.
– खानसामा: मध्य-पूर्वी मुगलई व्यंजनों के एक्सपर्ट
– बाबर्ची : पश्चिमी यानि कॉन्टिनेंटल व्यंजन पकाने में माहिर.
– इनके साथ टैगोर परिवार की महिलाओं की भूमिका भी खास होती थी. जो हमेशा किचन स्टाफ के साथ मिलकर नए व्यंजनों पर प्रयोग करते थे.
टैगोर की भतीजी प्रज्ञासुंदरी देवी, जिन्होंने गोभी की बरफी बनाई. फिर टैगोर परिवार की पहली ऐसी सदस्य बनीं, जिनकी लिखी खाने के व्यंजनों की किताब प्रकाशित हुई. (FILE PHOTO)
प्रयोग करने में रवींद्रनाथ की पत्नी मृणालिनी देवी काफी आगे रहती थीं. हेमेंद्रनाथ टैगोर की बेटी और रवींद्रनाथ की भतीजी प्रज्ञा सुंदरी देवी के प्रयोग काफी हिट होते थे. बाद में उन्होंने खाने पर कॉलम लिखे और फिर ‘अमिष ओ निरामिष आहार’ जैसी किताबों से ठाकुरबाड़ी के व्यंजनों को लिपिबद्ध किया. बाद में परिवार की ही महिला पूर्णिमा देवी ने भी ‘ठाकुरबाड़ी रन्ना’ नाम से किताब लिखी. टैगोर परिवार की महिलाएं उच्च शिक्षित और साहसी थीं – कम से कम पाक कला के क्षेत्र में.
फूलगोभी की बरफी
टैगोर रसोई में कुछ चौंकाने वाले और अनोखे प्रयोग हुए. इसमें सबसे ज्यादा चर्चित व्यंजन फूलगोभी की बरफी या संदेश है. प्रज्ञा सुंदरी देवी ने टैगोर के 70वें जन्मदिन पर गोभी से बनी मिठाई बनाई. ये व्यंजन इतना पसंद किया गया कि टैगोर ने कहा कि अब यह मिठाई उनके हर जन्मदिन पर केवल प्रज्ञा देवी ही बनाएं.
जब उन्होंने ये बताया कि ये बरफी या संदेश उन्होंने फूलगोभी से बनाया है तो पहली बार में किसी ने भी उनकी बात पर विश्वास नहीं किया. क्योंकि आमतौर पर माना जाता है कि फूलगोभी से तो नमकीन सब्जी या आचार ही बन सकता है.
इस रेसिपी की जो जानकारी अब तक सामने आई है, वह ऐतिहासिक दस्तावेजों और उस किताब के विश्लेषण पर आधारित है. पारंपरिक बंगाली ‘संदेश’ तो छेना से बनता है, उसी की इस रेसिपी में नारियल, छेना और चीनी का इस्तेमाल होता है. फूलगोभी को बारीक कद्दूकस करके या उसका पेस्ट बनाकर मिलाया जाता है. इस मिश्रण को तब तक धीमी आंच पर पकाया जाता है, जब तक कि सारी नमी सूख न जाए और यह गाढ़ा न हो जाए. फिर इसे सांचे में डालकर सेट किया जाता है.
टैगोर परिवार की किचन के व्यंजनों के आधार पर कोलकाता में हर साल एक फूड फेस्टिवल होता है.
खाने के व्यंजनों की किताब लिखी
प्रज्ञासुंदरी का विवाह एक युवा लेखक लक्ष्मीनथ बेजबरुआ से हुआ, जिन्हें आधुनिक असमिया साहित्य का जनक माना जाता है. बेजबरुआ भी खाने-पीने के शौकीन थे. उन्हीं का सुझाव था कि देबी को अपने व्यंजनों को प्रकाशित करना चाहिए – जो उस समय एक बिल्कुल नया विचार था – काफी झिझक के बाद, उन्होंने अपनी नोटबुक से व्यंजनों का संग्रह निकालकर शाकाहारी व्यंजनों की एक पुस्तक प्रकाशित की. उम्मीदों के विपरीत उनका पहला संस्करण तुरंत बिक गया. फिर इसके बाद देबी ने शाकाहारी व्यंजनों के दो खंड और मांसाहारी व्यंजनों के दो खंड, असमिया व्यंजनों की एक पुस्तक और अचार और मुरब्बों के सभी प्रकारों को संकलित करने वाली एक अंतिम पुस्तक प्रकाशित की.
शोल बेगुन और माछेर शुक्तो
एक ही सब्जी और एक ही व्यंजन के दो रूप. भुने हुआ बैंगन में मछली मिलाई गई. इसी तरह कड़वी सब्जियों से बने पारंपरिक शुक्तो का वर्जन ‘माछेर शुक्तो’ भी उनकी रसोई में बनता था. मोचार पातुरी’ केले के फूल से बनाया जाता था, जो आमतौर पर इलिश मछली से बनता है. इस तरह के फ्यूजन व्यंजन की लिस्ट लंबी है, जिसने टैगोर किचन में नया स्वाद पाया.
टैगोर परिवार की एक सदस्य पूर्णिमा ठाकुर ने अपनी मां की डायरी के जरिए परिवार के व्यंजनों पर एक किताब लिखी ठाकुरबाड़ी रन्ना
टैगोर का खुद का योगदान
टैगोर ने खुद ‘सूरती मीठा केबाब’, ‘हिंदुस्तानी तुर्की केबाब’ और झींगा से बना ‘प्रॉन थर्मिडोर’ जैसे व्यंजनों को बनाने में भूमिका निभाई. रसोई में खाना बनाने और नए प्रयोगों में उनकी भी काफी दिलचस्पी थी लेकिन वो कहा करते थे कि लोग मुझको मेरे खाने के व्यंजनों नहीं बल्कि कवि के रूप में ही ज्यादा याद रखेंगे. वह खाने के अगर जबरदस्त शौकीन थे तो खाना बनाने के भी.
रवींद्रनाथ को हिलसा मछली, चितोल मछली, मूंग दाल और झींगा मलय करी पसंद थी. कबाब उनके पसंदीदा व्यंजनों में से थे. उन्हें मीठा कबाब, हिंदुस्तानी तुर्की कबाब और चिकन नोसी कबाब का स्वाद लेना बहुत पसंद था. वे सुक्तो से शुरुआत करना और मीठे पान से अंत करना पसंद करते थे. उन्होंने एक बार पत्र में लिखा था – “लोग मुझे हमेशा एक कवि के रूप में जानेंगे लेकिन कोई भी मुझे एक रसोइया के रूप में नहीं जान पाएगा.” रवींद्रनाथ अपनी युवावस्था में तरह-तरह के स्वादिष्ट भोजन खाना पसंद करते थे. बाद में उम्र बढ़ने के साथ उनका टेस्ट प्रभावित हो गया.
अनोखे पाक प्रयोग
टैगोर के भतीजे और प्रसिद्ध चित्रकार अवनींद्रनाथ टैगोर ने एक तरह से खाना पकाने की कक्षा शुरू की थी, जहां तरह-तरह के अनोखे पाक प्रयोग किए जाते थे. उनके पास राधू नाम का एक रसोइया था, जो उनका सबसे भरोसेमंद साथी था. वे खाना पकाने के पारंपरिक तरीकों को ही बदल देते थे. तलने वाली सामग्री को उबाला जाता था और तलने वाली सामग्री को पकाया जाता था. हर प्रयोग के बाद, नए व्यंजन का एक नया नाम रख दिया जाता था.
ठाकुरबाड़ी में खाना सिर्फ पकाने का तरीका ही अलग नहीं था, बल्कि परोसने का तरीका भी उतना ही अनूठा था. यहां पारंपरिक ‘चौकी-पीरी’ (छोटी चौकी और गद्दा) और ऊंचे पश्चिमी डाइनिंग टेबल-कुर्सी का एक मिश्रित रूप अपनाया गया था. मेज और कुर्सियां इस तरह की बनाई गई थीं कि बैठकर या तो पारंपरिक तरीके से खाया जा सके या पश्चिमी तरीके से. भोजन बेहतरीन चीनी मिट्टी के बर्तनों में परोसा जाता था, जिसे टैगोर परिवार विदेश यात्राओं से लाया करता था.
इंदिरा देवी
टैगोर परिवार की रसोई में सभी कुशल रसोइये नहीं थे और कुछ ही लोग व्यंजनों को अच्छे से लिख पाते थे. इंदिरा देवी कभी रसोई में नहीं गईं, लेकिन उन्हें अनोखे व्यंजनों में बहुत रुचि थी. जब भी उन्हें कोई स्वादिष्ट व्यंजन मिलता, वे रसोइये को बुलाकर नुस्खा लिख लेती थीं. बाद में पूर्णिमा टैगोर को वह नोटबुक मिली. उन्होंने उसे अपनी मां के कुछ व्यंजनों के साथ प्रकाशित किया. इस पुस्तक का नाम ‘ठाकुरबैर रन्ना’ है.
रेणुका देवी चौधरी
उस परिवार की एक और महिला रेणुका देवी चौधरी ने भी पाक कला की किताब लिखी. उनकी दो किताबें ‘राकमारी आमिश रन्ना’ और ‘राकमारी निरामिश रन्ना’ उस समय की सबसे ज़्यादा बिकने वाली किताबें थीं, और शायद आज भी हैं.
स्रोत
1. Amish O Niramish Ahar (आमिष ओ निरामिष आहार) – प्रज्ञासुंदरी देवी (यह सबसे पुरानी और आधारशिला मानी जाने वाली किताब है), प्रकाशन – वर्ष 1902. इसमें ठाकुरबाड़ी के पारंपरिक और प्रयोगात्मक व्यंजनों का संकलन है. यह पुस्तक आज भी आनंद पब्लिशर्स द्वारा बांग्ला भाषा में उपलब्ध है और कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं.
2. Thakurbarir Ranna (ठाकुरबाड़ी रन्ना) – पूर्णिमा ठाकुर (देवी). यह दूसरी अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है, जो एक अन्य स्रोत पर आधारित है. लेखिका – पूर्णिमा ठाकुर (सतींद्रनाथ टैगोर की वंशज और रवींद्रनाथ की भतीजी इंदिरा देवी चौधुरानी की डायरी को आधार बनाकर लिखा), प्रकाशन वर्ष – 1985 (इसमें 250 से अधिक व्यंजनों का संकलन है) . इंदिरा देवी खुद रसोइया नहीं थीं, लेकिन वे भोजन की बहुत अच्छी जानकार थीं. देश-विदेश में जहां भी स्वादिष्ट खाना खातीं, उसकी रेसिपी जरूर लिख लेती थीं. इसी के हवाले से आज भी कई रेस्तरां ठाकुरबाड़ी थीम वाले फूड फेस्टिवल आयोजित करते हैं.
3. द टेलीग्राफ – इस अखबार ने कई बार ठाकुरबाड़ी की रसोई पर विस्तृत रिपोर्ट छापी हैं.
4. Mint Lounge / Slurrp: इन वेबसाइटों पर भी ठाकुरबाड़ी की रसोई और व्यंजनों पर लेख प्रकाशित हुए हैं, जो इन्हीं पुस्तकों को स्रोत मानकर लिखे गए हैं.
